Monday, July 12, 2021

73 सूरह अल मुज़म्मिल

सूरह अल मुज़म्मिल मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 20 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ऐ चादर ओढ़ने वाले मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !
2. तुम रात में उठो और कुछ देर इबादत करो.
3. आधी रात या इससे कुछ कम कर दो.
4. या उसे कुछ ज़्यादा कर दो और क़ुरआन को ख़ूब ठहर-ठहर कर पढ़ा करो.
5. हम अनक़रीब तुम पर एक बड़ा फ़रमान नाज़िल करेंगे. 
6. बेशक रात को उठना नफ़्स को सख़्त पामाल करता है और उस वक़्त ज़िक्र भी ख़ूब दुरुस्त होता है.
7. बेशक तुम्हारे लिए दिन में बहुत से तवील काम होते हैं.
8. और तुम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो और सबसे टूटकर उसी के हो जाओ.
9. अल्लाह ही मशरिक़ और मग़रिब का परवरदिगार है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं. तुम उसी को अपना कारसाज़ बनाओ.
10. और तुम उन बातों पर सब्र करो, जो कुछ वे काफ़िर कहते हैं. और ख़ूबसूरती के साथ उनसे किनारा कर लो.
11. और तुम हमें और झुठलाने वाले मालदारों को छोड़ दो और उन्हें थोड़ी सी मोहलत दो, ताकि उनके बुरे आमाल उन्हें इन्तिहा तक ले जाएं.
12. बेशक हमारे पास ज़ंजीरें और दोज़ख़ की भड़कती हुई आग है.
13. और गले में फंसने वाला खाना और दर्दनाक अज़ाब है.
14. जिस दिन ज़मीन और पहाड़ लरज़ने लगेंगे और पहाड़ रेत का ढेर होकर बिखर जाएंगे.
15. ऐ मक्का वालो ! बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ एक रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को तुम पर गवाह बनाकर भेजा है, जैसे फ़िरऔन की तरफ़ मूसा अलैहिस्सलाम को भेजा था. 
16. फिर फ़िरऔन ने उन रसूल की नाफ़रमानी की, तो हमने उसे बहुत सख़्त गिरफ़्त में ले लिया.
17. फिर तुम कुफ़्र करते रहोगे, तो अज़ाब के उस दिन से कैसे बचोगे, जो बच्चों को बूढ़ा कर देगा. 
18. जिस दिन आसमान शिगाफ़्ता हो जाएगा, उसका वादा पूरा होकर रहेगा.
19. बेशक यह क़ुरआन नसीहत है, फिर जो चाहे अपने परवरदिगार की राह इख़्तियार कर ले.
20. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! बेशक तुम्हारा परवरदिगार जानता है कि तुम कभी दो तिहाई रात के क़रीब और कभी आधी रात और कभी एक तिहाई रात में नमाज़ के लिए खड़े होते हो. और उन लोगों की एक जमात भी, जो तुम्हारे साथ क़याम में शरीक होती है. और अल्लाह ही रात और दिन के घटने और बढ़ने का सही का अंदाज़ा रखता है. वह जानता है कि तुम वक़्त का सही शुमार नहीं कर सकते, इसलिए उसने तुम पर इनायत की. जितना आसानी से हो सके, उतना क़ुरआन पढ़ लिया करो. वह जानता है कि तुममें से कुछ लोग बीमार भी होते हैं और कुछ अल्लाह के फ़ज़ल यानी रोज़ी की तलाश में सफ़र भी करते हैं और कुछ अल्लाह की राह में जंग करते हैं, तो जितना आसानी से हो सके तुम पढ़ लिया करो और नमाज़ पाबंदी से पढ़ो और ज़कात देते रहो. और अल्लाह को क़र्ज़े हसना दिया करो यानी अल्लाह की राह में ख़र्च किया करो और उसकी मख़लूक़ से हुस्ने सुलूक करो. और तुम जो नेक आमाल आगे भेजोगे, तो अल्लाह के हुज़ूर में उसका बड़ा अज्र पाओगे. और अल्लाह से मग़फ़िरत की दुआ मांगते रहो. बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है. 

Sunday, July 11, 2021

74 सूरह अल मुदस्सिर

सूरह अल मुदस्सिर मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 56 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ऐ चादर ओढ़ने वाले महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !
2. उठो और लोगों को अज़ाब से ख़बरदार करो.
3. और अपने परवरदिगार की बड़ाई बयान करो.
4. और अपने लिबास को पाक रखो.
5. और नापाकी से दूर रहो. 
6. और इस नीयत से अहसान न करो कि तुम्हें उससे ज़्यादा की चाह हो.
7. और अपने परवरदिगार के लिए सब्र किया करो.
8. और जब दोबारा सूर फूंका जाएगा.
9. तो वह दिन बहुत सख़्त होगा,
10. काफ़िरों के लिए आसान नहीं होगा.
11. तुम हमें और उसे छोड़ दो, जिसे हमने अकेला पैदा किया,
12. और हमने उसे बहुत सा माल दिया.
13. और उसके सामने हाज़िर रहने वाले बेटे दिए,
14. और हमने उसे ऐशो इशरत में ख़ूब कुशादगी दी. 
15. फिर भी वह चाहता है कि हम उसे और ज़्यादा दें.
16. ऐसा हरगिज़ नहीं होगा. बेशक वह हमारी आयतों का दुश्मन रहा है.
17. हम उसे सऊद पर चढ़ाएंगे. यानी सख़्त अज़ाब देंगे.
18. बेशक उसने सोचा और तजवीज़ की,
19. फिर उस पर अल्लाह की मार. उसने कैसी तजवीज़ की.
20. फिर उस पर अल्लाह मार. उसने कैसी तजवीज़ की. 
21. फिर उसने देखा.
22. फिर उसने त्योरी चढ़ाई और मुंह बना लिया.
23. फिर उसने हक़ से पीठ फेर ली और तकब्बुर किया.
24. फिर वह कहने लगा कि यह क़ुरआन जादू के सिवा कुछ नहीं है, जो पहले के जादूगरों से नक़ल होता चला आ रहा है.
25. यह क़ुरआन बशर के कलाम के सिवा और कुछ नहीं है.
26. हम अनक़रीब उसे सक़र में डाल देंगे.
27. और क्या तुम जानते हो कि सक़र क्या है?
28. वह ऐसी आग है, जो न बाक़ी रखती है और न छोड़ती है. 
29. और जिस्म की खाल को जलाकर स्याह कर देती है.
30. उस पर उन्नीस फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं.
31. और हमने दोज़ख़ का निगेहबान फ़रिश्तों को बनाया है और उनका यह शुमार भी कुफ़्र करने वालों की आज़माइश के लिए है, ताकि अहले किताब यक़ीन कर लें कि क़ुरआन और नबुवते मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हक़ है, क्योंकि उनकी किताब में भी दोज़ख़ के फ़रिश्तों की तादाद उन्नीस ही बयान की गई है. और ईमान वालों का ईमान मज़ीद बढ़ जाए. अहले किताब और मोमिन किसी तरह का शक न करें. जिन लोगों के दिल में निफ़ाक़ का मर्ज़ है, वे और काफ़िर ये कहें कि इनकी तादाद की मिसाल से अल्लाह की क्या मुराद है? इसी तरह अल्लाह जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसे चाहता है हिदायत देता है. और तुम्हारे परवरदिगार के लश्करों को उसके सिवा कोई नहीं जानता. और दोज़ख़ का यह बयान बशर की नसीहत के लिए ही है.
32. हां, क़सम है चांद की, जिसका घटना बढ़ना और ग़ायब हो जाना गवाह है. 
33. और क़सम है रात की, जब वह रुख़सत होने लगे.
34. और क़सम है सुबह की, जब वह रौशन हो जाए.
35. बेशक यह दोज़ख़ बहुत बड़ी आफ़तों में से एक है.
36. यह लोगों को डराने वाली है.
37. उसके लिए जो तुममें से नेकी में आगे बढ़ना चाहे या गुनाहों में मुब्तिला होकर पीछे रहना चाहे.
38. हर शख़्स उन आमाल के बदले में गिरवी है, जो उसने कमा रखे हैं.
39. सिवाय दायीं तरफ़ वालों के,
40. वे जन्नत के बाग़ों में होंगे और आपस में पूछ रहे होंगे.
41. गुनाहगारों के बारे में 
42. और कहेंगे कि तुम्हें क्या चीज़ दोज़ख़ में ले आई?
43. वे जवाब देंगे कि हम नमाज़ पढ़ने वालों में से नहीं थे,
44. और हम मिस्कीनों यानी ग़रीबों और मोहताजों को खाना नहीं खिलाते थे,
45. और हम बेहूदा मशग़ले करने वालों के साथ मिलकर बेहूदा मशग़लों में मुब्तिला रहते थे,
46. और हम जज़ा और सज़ा के दिन को झुठलाया करते थे,
47. यहां तक कि हम पर जिस का आना यक़ीनी था वह मौत आ गई.
48. फिर उस वक़्त शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत भी उन्हें कोई नफ़ा नहीं देगी.
49. फिर उन्हें क्या हुआ है कि वे नसीहत से मुंह फेरे हुए हैं.
50. गोया वे बिदके हुए वहशी गधे हैं,
51. जो शेर से डरकर भागते हैं.
52. बल्कि उनमें से हर शख़्स यह चाहता है कि उसे खुले हुए आसमानी सहीफ़ें दिए जाएं.
53. ऐसा हरगिज़ नहीं होगा. हक़ीक़त यह है कि उन्हें आख़िरत का ख़ौफ़ ही नहीं है.
54. जान लो कि बेशक यह क़ुरआन नसीहत है.
55. फिर जो चाहे इसे याद रखे.
56. और ये लोग उसे तब तक याद नहीं रख सकते, जब तक अल्लाह न चाहे. अल्लाह ही तक़वे का मुस्तहक़ है और वही मग़फ़िरत का मालिक है. 

Saturday, July 10, 2021

75 सूरह अल क़आमह

सूरह अल क़आमह मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 40 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. क़सम है क़यामत के दिन की.
2. और क़सम है बुराइयों पर मलामत करने वाली नफ़्स की.
3. क्या इंसान यह गुमान करता है कि हम उसकी हड्डियों को जमा नहीं करेंगे, जो उसके मरने के बाद रेज़ा-रेज़ा हो जाएंगी.
4. बेशक हम इस पर क़ादिर हैं कि उसकी उंगलियों के पोर-पोर को दुरुस्त कर दें.
5. लेकिन इंसान चाहता है कि वह अपनी आगे की ज़िन्दगी में भी गुनाह करता रहे.
6. वह पूछता है कि क़यामत का दिन कब आएगा?
7. फिर जब आंखें चौंधिया जाएंगी,
8. और चांद अपनी रौशनी खो देगा.
9. और सूरज और चांद बेनूर करके जमा किए जाएंगे.
10. उस दिन इंसान कहेगा कि भागकर कहां जाऊं.
11. जान लो कि अब कहीं पनाह नहीं है.
12. उस दिन तुम्हारे परवरदिगार के पास ही पनाह है.
13. उस दिन इंसान को उन आमाल से आगाह कर दिया जाएगा, जो उसने आगे भेजे थे और पीछे छोड़े थे.
14. बल्कि इंसान ख़ुद अपने आमाल को देखने वाला है.
15. और चाहे वह ख़ुद कितनी ही माज़रत करे.
16. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम क़ुरआन को याद करने की जल्दी में अपनी ज़बान को हरकत न दिया करो.
17. बेशक उसे तुम्हारे दिल में जमा करना और तुम्हारी ज़बान से पढ़वाना हमारे ज़िम्मे है.
18. फिर जब हम उसे जिब्रईल अलैहिस्सलाम की ज़बानी पढ़ें, तो तुम क़ुरआन की पैरवी किया करो. 
19. फिर बेशक उसकी वज़ाहत करना भी हमारे ही ज़िम्मे है.
20. ऐ काफ़िरो ! जान लो कि हक़ीक़त में तुम जल्दी मिलने वाली दुनिया से मुहब्बत करते हो,
21. और तुम आख़िरत को छोड़े बैठे हो.
22. उस दिन बहुत से चेहरे शादाब होंगे.
23. उन्हें अपने परवरदिगार का दीदार होगा.
24. और उस दिन बहुत से चेहरों पर मायूसी होगी.
25. वे गुमान कर रहे होंगे कि उन पर मुसीबत आने वाली है, जो उनकी कमर तोड़ देगी.
26. जान लो कि जब जान गले तक पहुंच जाएगी,
27. और कहा जाएगा कि अब झाड़ फूंक करने वाला कौन है.
28. और मरने वाला गुमान करेगा कि अब जुदाई का वक़्त है,
29. और दर्द की वजह से पिंडली से पिंडली लिपट जाएगी.
30. उस दिन तुम्हें अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटना है.
31. फिर उसने न अल्लाह के कलाम की तसदीक़ की और न नमाज़ पढ़ी.
32. और उसने हक़ को झुठलाया और नाफ़रमानी की.
33. फिर वह अपने घरवालों के पास इतराता हुआ चल दिया.
34. तुम्हारे लिए मौत के वक़्त तबाही है. फिर क़ब्र में भी तबाही है.
35. फिर तुम्हारे लिए क़यामत के दिन तबाही है. फिर दोज़ख़ में भी तबाही है.
36. क्या इंसान यह गुमान करता है कि उसे बिना हिसाब किताब के यूं ही छोड़ दिया जाएगा.
37. क्या वह अपनी इब्तिदा में एक नुत्फ़ा नहीं था, जिसे टपकाया जाता है.
38. फिर वह वजूद में आया, फिर वह पैदा हुआ. फिर उसे दुरुस्त किया.  
39. फिर उसी नुत्फ़े के ज़रिये उसकी दो क़िस्में मर्द और औरत बनाईं.
40. तो क्या अल्लाह इस पर क़ादिर नहीं कि वह मुर्दों को दोबारा ज़िन्दा कर दे.

Friday, July 9, 2021

76 सूरह अद दहर या अल इंसान

सूरह अद दहर मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 31 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान और निहायत रहम वाला है
1. बेशक इंसान पर ज़माने का एक ऐसा वक़्त भी गुज़रा है, जब वह कोई क़ाबिले ज़िक्र चीज़ ही नहीं था.
2. बेशक हमने इंसान को मख़लूत नुत्फ़े से पैदा किया, ताकि उसकी आज़माइश लें. फिर हमने उसे सुनने और देखने वाला बनाया है.
3. बेशक हमने उसे हक़ और बातिल में फ़र्क़ करने की समझ के साथ राह दिखा दी. अब चाहे वह शुक्रगुज़ार हो जाए या कुफ़्र करके नाशुक्रा बन जाए.
4. बेशक हमने काफ़िरों के लिए ज़ंजीरें, तौक़ और दोज़ख़ की दहकती हुई आग तैयार कर रखी है.
5. बेशक नेक लोग पाकीज़ा शर्बत के ऐसे जाम पिएंगे, जिसमें काफ़ूर मिली हुई होगी.
6. काफ़ूर जन्नत का एक चश्मा है, जिससे अल्लाह के मक़र्रिब बन्दे पिएंगे और इसे जहां चाहेंगे, बहा ले जाएंगे.
7. यही वे लोग हैं, जो अपनी नज़रें यानी मन्नतें पूरी करते हैं और सख़्ती वाले दिन से ख़ौफ़ज़दा रहते हैं, जिसका क़हर ख़ूब बरपा होने वाला है.
8. और वे अल्लाह की मुहब्बत में अपना खाना मिस्कीनों, यतीमों और क़ैदियों को खिला देते हैं.
9. बेशक वे लोग कहते हैं कि हम तो सिर्फ़ अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए तुम्हें खाना खिला रहे हैं. हम तुमसे न बदला चाहते हैं और न शुक्रगुज़ारी के तलबगार हैं.
10. बेशक हमें अपने परवरदिगार से उस दिन का ख़ौफ़ रहता है, जब चेहरे बुरी तरह बिगड़ जाएंगे.
11. फिर अल्लाह उन्हें उस दिन के शर से बचा लेगा और उन्हें ताज़गी और ख़ुशी अता करेगा.
12. और उनके सब्र के बदले उन्हें जन्नत के बाग़ और रेशमी लिबास अता करेगा.
13. वे लोग उसमें तख़्तों पर तकिये लगाए बैठे होंगे, वहां न सूरज की तपिश होगी और न शिद्दत की ठंड.
14. और उन पर घने दरख़्तों के साये होंगे और मेवों के गुच्छे उनके क़रीब लट रहे होंगे.
15. और ख़ादिम उनके गिर्द चांदी के साग़र और शीशे के प्याले लिए फिरते होंगे.
16. और शीशे भी चांदी के होंगे, जिन्हें उन ख़ादिमों ने हर एक की तलब के मुताबिक़ ठीक अंदाज़े से भरा होगा. 
17 और उन्हें वहां पाकीज़ा शर्बत के ऐसे जाम पिलाए जाएंगे, जिनमें ज़ंजबील का पानी मिला होगा.
18. ज़ंजबील जन्नत में एक चश्मा है, जिसका नाम सलसबील रखा गया है.
19. और उनके अतराफ़ हमेशा नौजवान रहने वाले लड़के चक्कर लगाते होंगे. जब तुम उन्हें देखोगे, तो गुमान करोगे कि वे बिखरे हुए मोती हैं.
20. और जब तुम निगाह उठाओगे, तो तुम्हें वहां बेशुमार नेअमतें और बड़ी अज़ीमुश्शान सल्तनत नज़र आएगी. 
21. वे लोग बारीक और गाढ़े रेशम का सब्ज़ लिबास पहने हुए होंगे और उन्हें चांदी के कंगन पहनाए जाएंगे और उनका परवरदिगार उन्हें शराबे तहूरा यानी पाकीज़ा शर्बत पिलाएगा.
22. बेशक यह तुम्हारे उन आमाल की जज़ा होगी, जिन्हें अल्लाह ने क़ुबूल किया. 
23. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक हमने तुम पर क़ुरआन को थोड़ा-थोड़ा करके नाज़िल किया है.
24. फिर तुम अपने परवरदिगार के हुक्म की ख़ातिर सब्र करते रहो और उनमें से किसी गुनाहगार और नाशुक्रे का कहना नहीं मानना.
25. और तुम सुबह और शाम अपने परवरदिगार के नाम का ज़िक्र करते रहो.
26. और रात में कुछ वक़्त उसकी बारगाह में सजदा करो और रात के बाक़ी तवील हिस्से में उसकी तस्बीह किया करो.
27. बेशक दुनिया के तलबगार लोग जल्दी मिलने वाले फ़ायदे को पसंद करते हैं और एक सख़्त दिन की याद को अपने पीछे छोड़ देते हैं. 
28. हमने उन्हें पैदा किया और उनके जोड़-जोड़ मज़बूत बनाए और हम जब चाहें उनके बदले उन जैसे ही लोग ले आएं.
29. बेशक यह क़ुरआन नसीहत है, इसलिए जो चाहे अपने परवरदिगार तक पहुंचने की राह इख़्तियार कर ले.
30. और तुम कुछ भी नहीं चाह सकते, सिवाय उसके जो अल्लाह चाहे. बेशक अल्लाह बड़ा साहिबे इल्म और बड़ा हिकमत वाला है.
31. वह जिसे चाहता है, अपनी रहमत में दाख़िल कर लेता है. और उसने ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है.

Thursday, July 8, 2021

77 सूरह अल मुरसलात

सूरह अल मुरसलात मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 50 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. क़सम है उन ख़ुशगवार हवाओं की, जो पहले हौले-हौले चलती हैं,
2. फिर क़सम है उन हवाओं की, जो तेज़ झोंकों से चलती हैं,
3. और क़सम है उन हवाओं की, जो बादलों को उड़ाये-उड़ाये फिरती हैं,
4. और क़सम है उन हवाओं की, जो उन्हें जुदा-जुदा कर देती हैं. 
5. फिर क़सम है, उन फ़रिश्तों की, जो वही लाते हैं,
6. जो वही पैग़ाम देने या ख़बरदार करने के लिए होती है.
7. बेशक जिसका तुमसे वादा किया जाता है, वह क़यामत वाक़े होकर रहेगी.
8. फिर जब सितारे बुझा दिए जाएंगे.
9. और जब आसमान शिगाफ़्ता हो जाएंगे.
10. और जब पहाड़ रेज़ा-रेज़ा करके उड़ाए जाएंगे.
11. और जब सब रसूल मुक़र्रर वक़्त पर अपनी-अपनी उम्मतों की गवाही के लिए जमा होंगे. 
12. भला किस दिन के लिए इसे टाला गया.
13. फ़ैसले के दिन के लिए.
14. और क्या तुम जानते हो कि फ़ैसले का दिन क्या है?
15. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
16. क्या हमने पहले के झुठलाने वाले लोगों को हलाक नहीं कर दिया था?
17. फिर हम उनके बाद के लोगों को भी उनके पीछे भेज देंगे.
18. हम गुनाहगारों के साथ ऐसा ही सुलूक किया करते हैं.
19. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
20. क्या हमने तुम्हें हक़ीर पानी से पैदा नहीं किया.
21. फिर हमने उसे एक महफ़ूज़ जगह रखा.
22. एक मुक़र्रर वक़्त तक.
23. फिर हमने उसका एक अंदाज़ा मुक़र्रर किया. फिर हम क्या ख़ूब अंदाज़ा मुक़र्रर करने वाले हैं.
24. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
25. क्या हमने ज़मीन को समेट लेने वाली नहीं बनाया,
26. ज़िन्दा को और मुर्दों को समेटने वाली. 
27. और हमने उसमें बुलंद और मज़बूत पहाड़ रख दिए और हमने तुम्हें चश्मों के ज़रिये ठंडा व मीठा पानी पिलाया.
28. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
29. अब तुम उस अज़ाब की तरफ़ चलो, जिसे तुम झुठलाया करते थे.
30. तुम दोज़ख़ के धुयें के साये की तरफ़ चलो, जिसके तीन हिस्से हैं,
31. जो न ठंडा साया है और न आग की तपिश से बचाने वाला है.
32. बेशक वह दोज़ख़ बुलंद महलों की तरह आग के बड़े-बड़े शोले और चिंगारियां उड़ाती है.
33. गोया वे शोले ज़र्द रंग के ऊंट हैं.
34. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
35. उस दिन लोग होंठ तक नहीं हिला सकेंगे.
36. और न उन्हें इजाज़त दी जाएगी कि वे माज़रत कर सकें.
37. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
38. ये फ़ैसले का दिन है, जिसमें हम तुम्हें और तुमसे पहले के लोगों को जमा करेंगे.
39. फिर अगर तुम्हारे पास अज़ाब से बचने की कोई चाल है, तो चल लो.
40. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
41. बेशक परहेज़गार ठंडी छांव और चश्मों में सुकून से होंगे.
42. और फल और मेवे जिसकी वे ख़्वाहिश करेंगे, उनके लिए मौजूद होंगे.
43. उनसे कहा जाएगा कि तुम ख़ूब मज़े से खाओ और पियो. उन आमाल के बदले जो तुम किया करते थे.
44. बेशक हम नेक लोगों को ऐसा ही सिला दिया करते हैं. 
45. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
46. ऐ मुनकिरो ! तुम कुछ वक़्त खा लो और फ़ायदा उठा लो. बेशक तुम गुनाहगार हो.
47. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है. 
48. और जब उनसे कहा जाता है कि तुम अल्लाह की बारगाह में झुको, तो वे नहीं झुकते.
49. उस दिन झुठलाने वाले लोगों के लिए तबाही है.
50. फिर वे लोग इस क़ुरआन के बाद अब किस हदीस पर ईमान लाएंगे? यानी किस बात पर ईमान लाएंगे.

Wednesday, July 7, 2021

78 सूरह अन नबा

सूरह अन नबा मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 40 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ये लोग आपस में किस चीज़ के बारे में सवाल कर रहे हैं?
2. क्या उस बड़ी ख़बर के बारे में पूछ रहे हैं. 
3. जिसके बारे में वे लोग इख़्तिलाफ़ करते हैं
4. देखो कि वे अनक़रीब उसकी हक़ीक़त जान लेंगे.
5. फिर देखो कि वे अनक़रीब उसकी हक़ीक़त जान लेंगे.
6. क्या हमने ज़मीन को क़याम की जगह नहीं बनाया.
7. और हमने पहाड़ों को उसकी मेख़ें बनाया. यानी उन्हें उभार कर खड़ा किया.
8. और हमने तुम्हें जोड़ों में पैदा किया,
9. और हमने तुम्हारी नींद को आराम देने वाला बनाया.
10. और हमने रात को लिबास बनाया. यानी रात की तारीकी सब चीज़ों को ढक देती है.
11. और हमने दिन को रोज़ी तलाशने का वक़्त क़रार दिया.
12. और हमने तुम्हारे ऊपर तबक़ दर तबक़ सात मज़बूत आसमान बनाए.
13. और हमने सूरज को चमकता हुआ रौशन चिराग़ बनाया.
14. और हमने बादलों से मूसलाधार पानी बरसाया,
15. ताकि हम उसके ज़रिये ज़मीन से अनाज और सब्ज़ियां उगाएं.
16. और घने बाग़ उगाएं.
17. बेशक फ़ैसले का दिन एक मुक़र्रर वक़्त है.
18. जिस दिन सूर फूंका जाएगा, तो तुम लोग फ़ौज दर फ़ौज अल्लाह के हुज़ूर में पेश होने के लिए चले आओगे. 
19. और तमाम आसमान खोल दिए जाएंगे, तो उनमें दरवाज़े ही दरवाज़े बन जाएंगे.
20. और पहाड़ चलाए जाएंगे, तो वे सराब जैसे हो जाएंगे. यानी पहाड़ गर्द व गु़बार बनाकर उड़ाए जाएंगे.   
21. बेशक जहन्नुम ताक में है.
22. वह सरकशों का ठिकाना है.
23. वे लोग उसमें मुद्दतें गुज़ारेंगे.
24. वे उसमें न ठंडक का ज़ायक़ा चखेंगे और न पीने का.
25. उसमें खौलते हुए गरम पानी और पीप के सिवा पीने को कुछ न मिलेगा.
26. ये उनके बुरे आमाल का बदला है.
27. बेशक वे लोग आख़िरत के हिसाब की उम्मीद नहीं रखते थे.
28. और वे लोग हमारी आयतों को झुठलाया करते थे.
29. और हमने हर चीज़ को लिखकर महफ़ूज़ कर लिया है.
30. ऐ मुनकिरो ! अब तुम अपने बुरे अपने आमाल का ज़ायक़ा चखो. हम तुम पर अज़ाब को बढ़ाते जाएंगे.
31. बेशक परहेज़गारों के लिए कामयाबी है.
32. उनके लिए जन्नत के बाग़ और अंगूर होंगे
33. और हमउम्र बीवियां होंगी
34. और शर्बत के छलकते हुए जाम होंगे. 
35. वहां ये लोग न कोई बेहूदा बात सुनेंगे और न झूठी बातें होंगी.
36. ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से जज़ा है, जो तुम्हारे आमाल के हिसाब से अता की जाएगी. 
37. वह आसमानों और ज़मीन और जो कुछ इनके दोनों के दरम्यान है, सबका परवरदिगार है. वह बड़ा मेहरबान है, लेकिन क़यामत के दिन उसके जलाल का ये आलम होगा कि उसके सामने बात करने की किसी की हिम्मत नहीं होगी.
38. जिस दिन रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम और फ़रिश्ते क़तार दर क़तार हाज़िर होंगे, उस दिन कोई लब कुशाई नहीं कर सकेगा. सिवाय उसके, जिसे मेहरबान अल्लाह बोलने की इजाज़त दे और जिसने ज़िन्दगी में परहेज़गारी इख़्तियार की हो और सही बात कही हो. 
39. यह दिन बरहक़ है. फिर जो शख़्स चाहे अपने परवरदिगार के पास ठिकाना बना ले.
40. बेशक हमने तुम्हें अनक़रीब आने वाले अज़ाब से ख़बरदार कर दिया है. जिस दिन हर आदमी अपने उन आमाल को देखेगा, जो उसने पहले भेजे होंगे. और काफ़िर कहेगा- काश ! मैं ख़ाक हो जाता.

Tuesday, July 6, 2021

79 सूरह अन नाज़ियात

सूरह अन नाज़ियात मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 46 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. क़सम है उन फ़रिश्तों की, जो सख़्ती से रूह खींच लेते हैं.  
2. और क़सम है उन फरिश्तों की, जो आसानी से रूह निकालते हैं. 
3. और क़सम है उन फ़रिश्तों की, जो आसमान और ज़मीन के दरम्यान फिरते रहते हैं.
4. फिर क़सम है उन फ़रिश्तों की, जो तेज़ी से सबक़त करते हैं. यानी लपक कर एक दूसरे से आगे बढ़ जाते हैं.
5. फिर क़सम है उन फ़रिश्तों की, जो मुख़्तलिफ़ कामों की तदबीर करते हैं.
6. जिस दिन ज़लज़ला आएगा और हर चीज़ हिलने लगेगी.
7. फिर उसके बाद एक और ज़लज़ला आएगा.
8. उस दिन लोगों के दिल ख़ौफ़ की वजह से ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहे होंगे.
9. उनकी आंखें ख़ौफ़ से झुकी होंगी.
10. काफ़िर कहते हैं कि क्या हम पहले वाली हालत में लौटा दिए जाएंगे?
11. क्या जब हम बोसीदा हड्डियां हो जाएंगे, तब भी ज़िन्दा कर दिए जाएंगे? 
12. वे कहते हैं कि यह लौटना तो उस वक़्त बड़ा नुक़सानदेह होगा.
13. फिर बेशक वह एक ख़ौफ़नाक सख़्त आवाज़ होगी,
14. फिर वे सब लोग मैदाने हश्र में जमा होंगे.
15. क्या तुम्हें मूसा अलैहिस्सलाम की ख़बर मिली ?
16. जब उनके परवरदिगार ने उन्हें तूवा की मुक़द्दस वादी में आवाज़ दी थी.
17. और उन्हें हुक्म दिया कि फ़िरऔन के पास जाओ, वह सरकश हो गया है.
18. फिर उससे कहो कि क्या तू पाकीज़गी इख़्तियार करना चाहता है.
19. और क्या मैं तेरे परवरदिगार की तरफ़ से तेरी रहनुमाई करूं, ताकि तुझे उससे कुछ ख़ौफ़ हो.
20. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे बड़ी निशानी दिखाई.
21. तो उसने झुठला दिया और नाफ़रमानी की.
22. फिर वह लौट गया और तदबीर करने लगा.
23. फिर उसने लोगों को जमा किया और बुलंद आवाज़ में चीख़ा.
24. फिर वह कहने लगा कि मैं तुम्हारा सबसे आला परवरदिगार हूं.
25. फिर अल्लाह ने उसे आख़िरत और दुनिया के अज़ाब में गिरफ़्तार कर लिया.
26. बेशक इस वाक़िये में उस शख़्स के लिए इबरत है, जो अल्लाह से ख़ौफ़ रखता है.
27. क्या तुम्हें पैदा करना ज़्यादा मुश्किल है या आसमान की तख़लीक़ करना. अल्लाह ही ने उसे बनाया है.
28. अल्लाह ने आसमानी छत को ख़ूब बुलंद किया. फिर उसे संवारा.
29. और अल्लाह ही ने आसमानी ख़ला की रात को तारीक बनाया और दिन को धूप से रौशन किया.
30. और अल्लाह ही ने उसके बाद ज़मीन को बिछाया.
31. अल्लाह ही ने ज़मीन में से पानी निकाला और चारा उगाया.
32. और अल्लाह ही ने पहाड़ों को उसमें रख दिया.
33. ये सब तुम्हारे और तुम्हारे चौपायों के फ़ायदे के लिए किया.
34. फिर जब बड़ी मुसीबत आएगी. यानी क़यामत आएगी.
35. उस दिन इंसान अपनी हर कोशिश और अमल को याद करेगा.
36. और देखने वालों के सामने जहन्नुम ज़ाहिर कर दी जाएगी.
37. फिर जिस शख़्स ने सरकशी की होगी.
38. और दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह दी होगी,
39. तो बेशक जहन्नुम ही उसका ठिकाना होगा.
40. और जो शख़्स अपने परवरदिगार के सामने खड़ा होने से डरता रहा और ख़ुद को बेजा ख़्वाहिशों से रोकता रहा,
41. तो बेशक जन्नत ही उसका ठिकाना होगा.
42. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! लोग तुमसे सवाल करते हैं कि क़यामत कब बरपा होगी? 
43. तो तुम क़यामत के ज़िक्र से किस फ़िक्र में मुब्तिला हो गए.
44. उसकी इंतिहा तो सिर्फ़ तुम्हारा परवरदिगार ही जानता है.
45. बेशक तुम सिर्फ़ उस शख़्स को ख़बरदार करने वाले हो, जो उससे ख़ौफ़ज़दा है.
46. गोया जिस दिन लोग उसे देख लेंगे, तो गुमान करेंगे कि वे दुनिया में बस एक शाम या उसकी एक सुबह के सिवा ठहरे ही नहीं थे.