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Wednesday, August 25, 2021

29 सूरह अन अनक़बूत

सूरह अन अनक़बूत मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 69 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. अलिफ़ लाम मीम. 
2. क्या लोग इस गुमान में हैं कि उनके सिर्फ़ यह कह देने से कि हम ईमान ले आए, उन्हें छोड़ दिया जाएगा और उनकी आज़माइश नहीं की जाएगी.
3. और बेशक हमने उन लोगों को भी आज़माया था, जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं. यक़ीनन अल्लाह आज़माइश के ज़रिये उन लोगों को भी ज़ाहिर कर देगा, जो ईमान के सच्चे और उन्हें भी जो झूठे हैं. 
4. जो लोग बुरे काम करते हैं, क्या वे इस गुमान में हैं कि वे हमसे बचकर निकल जाएंगे. वे लोग कितने बुरे फ़ैसले करते हैं.
5. जो शख़्स अल्लाह से मुलाक़ात की उम्मीद रखता है, तो बेशक अल्लाह का मुक़र्रर किया हुआ वक़्त आने वाला है. और वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
6. और जो शख़्स राहे हक़ में जद्दोजहद करता है, तो अपने फ़ायदे के लिए ही मेहनत करता है. बेशक अल्लाह तमाम आलमों से बेनियाज़ है.
7. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो हम उनकी सारी ख़तायें उनके आमालनामे से मिटा देंगे. और बेशक हम उन्हें उनके आमाल की अच्छी जज़ा देंगे.
8. और हमने इंसान को अपने वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करने का हुक्म दिया है. और अगर तेरे वालिदैन हमारे साथ किसी को शरीक बनाएं, जिसका तुझे इल्म न हो, तो उनका कहना मत मानना. तुम सबको हमारी तरफ़ ही लौटना है. हम तुम्हें उन आमाल से आगाह कर देंगे, जो तुम किया करते हो. 
9. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो हम उन्हें नेक लोगों में शामिल करेंगे. 
10. और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर ईमान लाए. फिर जब उन्हें अल्लाह की राह में कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो वे लोगों की दी हुई अज़ीयत को अल्लाह का अज़ाब समझते हैं. और अगर तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से मदद पहुंचती है, तो यक़ीनन वे कहते हैं कि हम तो तुम्हारे साथ ही हैं. क्या अल्लाह उन उन बातों से वाक़िफ़ नहीं है, जो आलम वालों के दिलों में पोशीदा हैं.
11. और अल्लाह उन लोगों को ज़रूर ज़ाहिर कर देगा, जो दिल से ईमान लाए हैं और वह उन्हें भी ज़ाहिर कर देगा, जो मुनाफ़िक़ हैं. 
12. और कुफ़्र करने वाले लोग ईमान लाने वाले लोगों से कहते हैं कि तुम हमारी राह की पैरवी करो. हम तुम्हारी ख़ताओं का बोझ उठा लेंगे. हालांकि वे लोग उनके गुनाहों का कुछ भी बोझ नहीं उठाएंगे. बेशक वे लोग झूठे हैं.
13. और यक़ीनन वे लोग अपने गुनाह के बोझ उठाएंगे और अपने बोझों के साथ अपने ऊपर लादे दूसरों के बोझ भी उठाएंगे. और क़यामत के दिन उनसे उन बोहतानों के बारे में भी पूछगछ होगी, जो वे गढ़ा करते थे.  
14. और बेशक हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम के पास भेजा, तो वे उनमें पचास बरस कम एक हज़ार बरस रहे. फिर उन्हें तूफ़ान ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. और वे ज़ालिम थे.
15. फिर हमने नूह अलैहिस्सलाम और कश्ती वालों को बचा लिया और हमने इसे तमाम आलमों के लोगों के लिए निशानी बना दिया.
16. और इब्राहीम अलैहिस्सलाम को याद करो कि जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह की इबादत करो और उससे डरो. यह तुम्हारे हक़ में बेहतर है. अगर तुम जानते हो.
17. बेशक तुम अल्लाह के सिवा बुतों को पुकारते हो और झूठी बातें गढ़ते हो. बेशक तुम अल्लाह के सिवा जिन्हें पुकारते हो, वे तुम्हें रिज़्क़ देने का कुछ भी इख़्तियार नहीं रखते. फिर तुम सिर्फ़ अल्लाह की बारगाह से रिज़्क़ तलब किया करो और उसी की इबादत करो और उसका शुक्र अदा करो. तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है.
18. और अगर तुमने हक़ को झुठलाया, तो तुमसे पहले भी बहुत सी उम्मतें झुठला चुकी हैं. और रसूल की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ वाज़ेह तौर पर अहकाम पहुंचाने तक ही है.
19. क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह किस तरह मख़लूक़ को पहली मर्तबा पैदा करता है. फिर वही उसे दोबारा पैदा करेगा. बेशक अल्लाह के लिए यह बहुत आसान है.
20. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ज़मीन में चल फिर कर देखो कि अल्लाह ने किस तरह मख़लूक़ को पहली मर्तबा पैदा किया. फिर अल्लाह ही उन्हें दोबारा ज़िन्दा करके उठाएगा. बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है.
21. अल्लाह जिस पर चाहे अज़ाब नाज़िल करे और जिस पर चाहे रहम करे. और तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है.
22. और तुम अल्लाह को न ज़मीन में आजिज़ कर सकते हो और न आसमानों में. और अल्लाह के सिवा तुम्हारा न कोई कारसाज़ है और न कोई मददगार है. 
23. और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों और उससे मिलने से कुफ़्र यानी इनकार किया. वे लोग हमारी रहमत से मायूस हो गए. और उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है.
24. फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ौम का जवाब इसके सिवा कुछ नहीं था कि वे लोग आपस में कहने लगे कि इन्हें क़त्ल कर दो या इन्हें जला दो. फिर अल्लाह ने उन्हें आग से निजात दी. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए बहुत सी निशानियां हैं, जो ईमान वाली है. 
25. और इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा कि फिर तुमने अल्लाह के सिवा बुत बना लिए हैं, जिनसे तुम्हारी मुहब्बत दुनिया की ज़िन्दगी तक ही है. फिर क़यामत के दिन तुम एक दूसरे से इनकार करोगे और एक दूसरे पर लानत भेजोगे. और तुम्हारा ठिकाना दोज़ख़ है और तुम्हारा कोई मददगार भी नहीं होगा.
26. फिर लूत अलैहिस्सलाम उन पर यानी इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए और उन्होंने कहा कि मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ हिजरत करने वाला हूं. बेशक वह बड़ा ग़ालिब बड़ा हिकमत वाला है.
27. और हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को इसहाक़ अलैहिस्सलाम और याक़ूब अलैहिस्सलाम अता किए. और हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलादों को नबुवत और किताब अता की. और हमने उन्हें दुनिया में भी अच्छा अज्र दिया और बेशक वे आख़िरत में भी हमारे स्वाहिलीन बन्दों में से हैं.
28. और जब लूत अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा कि बेशक तुम बेहयाई के काम करते हो. तुमसे पहले तमाम आलम में किसी ने ऐसा नहीं किया.
29. क्या तुम लोग अपनी शहवत पूरी करने के लिए मर्दों के पास जाते हो और राहज़नी करते हो और अपनी महफ़िलों में नाशाइस्ता हरकतें करते हो, तो उनकी क़ौम का जवाब भी इसके सिवा कुछ नहीं था कि वे कहने लगे कि तुम हम पर अज़ाब ले आओ. अगर तुम सच्चे हो.
30. लूत अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! इन मुफ़सिद क़ौम के मुक़ाबले में मेरी मदद फ़रमा.
31. और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास ख़ुशख़बरी लेकर आए, तो वे यह भी कहने लगे कि बेशक हम बस्ती के बाशिन्दों को हलाक करने वाले हैं, क्योंकि बेशक इस बस्ती के बाशिन्दे ज़ालिम हैं. 
32. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक इस बस्ती में लूत अलैहिस्सलाम भी हैं. वे कहने लगे कि हम इस बस्ती के बाशिन्दों को ख़ूब जानते हैं. हम उन्हें और उनके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उनकी बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में से है.
33. और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत अलैहिस्सलाम के पास आए, तो वे उनके आने से ग़मगीन और तंग दिल हो गए. फ़रिश्तों ने कहा कि तुम न ख़ौफ़ज़दा हो और न ग़मज़दा हो. बेशक हम तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय तुम्हारी बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में से है.
34. बेशक हम उस बस्ती के बाशिन्दों पर आसमान से अज़ाब नाज़िल करने वाले हैं, क्योंकि वे लोग नाफ़रमानी किया करते थे.
35. और बेशक हमने उस बस्ती के वीरान मकानों को उस क़ौम के लिए एक वाज़ेह निशानी के तौर पर बरक़रार रखा है, जो अक़्ल से काम लेती है.
36. और हमने मदीन की तरफ़ उनके क़ौमी भाई शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा. फिर उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अल्लाह की इबादत किया करो और रोज़े आख़िरत के दिन की उम्मीद रखो और ज़मीन में फ़साद फैलाते मत फिरो.
37. फिर उन्होंने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, तो उन्हें ज़लज़ले के अज़ाब ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए.
38. और हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद और सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद को भी हलाक कर दिया. और उनके कुछ उजड़े हुए मकान तुम्हारे सामने हैं. और शैतान ने उनके बुरे आमाल को उन्हें आरास्ता करके दिखाया था. फिर उन्हें सीधे रास्ते पर चलने से रोक दिया था. हालांकि वे लोग सूझबूझ वाले थे.
39. और हमने क़ारून और फ़िरऔन और हामान को भी हलाक कर दिया. उनके पास मूसा अलैहिस्सलाम वाजे़ह निशानियां लेकर आए थे, तो उन्होंने ज़मीन में तकब्बुर किया और वे हद से तजावुज़ करने वाले थे.
40. फिर हमने उनके गुनाहों के सबब उन्हें गिरफ़्त में ले लिया. उनमें से कुछ लोगों पर पत्थर वाली आंधी चलाई और कुछ लोगों को एक सख़्त चीख़ ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया और कुछ लोगों को ज़मीन में धंसा दिया और कुछ लोगों को ग़र्क कर दिया. और हरगिज़ ऐसा नहीं था कि अल्लाह उन पर ज़ुल्म करे, बल्कि उन लोगों ने ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म किया.  
41. जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे सरपरस्त बना रखे हैं, उनकी मिसाल उस मकड़ी जैसी है जो अपने लिए जाले का घर बनाती. और बेशक तमाम घरों से ज़्यादा कमज़ोर मकड़ी का घर होता है. काश ! वे लोग जानते.
42. बेशक अल्लाह उन लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ हैं, जो उसके सिवा दूसरों को पुकारते हैं. और वह बड़ा ग़ालिब बड़ा हिकमत वाला है.
43. और हम ये मिसालें लोगों को समझाने के लिए बयान करते हैं. और इन्हें आलिमों के सिवा कोई नहीं समझता.
44. अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन की हिकमत के साथ तख़लीक़ की है. बेशक मोमिनों के लिए इसमें बड़ी निशानी है.
45. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है. और अल्लाह उन कामों को जानता है, जिन्हें तुम अंजाम देते हो.
46. और ऐ ईमान वालो ! अहले किताब से झगड़ा मत किया करो. अगर बात करो, तो अच्छे तरीक़े से करो. लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया है, उनसे कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताबें तुम पर नाज़िल हुई हैं, हम उन सब पर ईमान लाए हैं और हमारा और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फ़रमाबरदार हैं.
47. और उसी तरह हमने तुम पर किताब यानी क़ुरआन नाज़िल किया है. हमने पहले जिन लोगों को किताबें अता की थीं, वे इस पर ईमान ले आए. और अहले मक्का में से भी कुछ लोग इस पर ईमान लाए हैं. और हमारी आयतों से काफ़िरों के सिवा कोई इनकार नहीं करता.
48. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुमने इससे पहले कोई किताब नहीं पढ़ी थी और न अपने हाथ से तुमने कुछ लिखा था. अगर ऐसा होता, तो झूठे लोग शक में मुब्तिला हो जाते.
49. बल्कि वे क़ुरआन की वाज़ेह आयतें हैं, जो उन लोगों के दिलों में महफ़ूज़ हैं, जिन्हें इल्म अता किया गया है. और हमारी आयतों से ज़ालिमों के सिवा कोई इनकार नहीं करता.. 
50. और काफ़िर कहते हैं कि उन पर यानी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परवरदिगार की तरफ़ से निशानियां नाज़िल क्यों नहीं की गईं. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनसे कह दो कि निशानियां तो सिर्फ़ अल्लाह ही के पास हैं और मैं तो सिर्फ़ सरीह अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर हूं. 
51. क्या उन लोगों के लिए यह निशानी काफ़ी नहीं कि हमने तुम पर किताब यानी क़ुरआन नाज़िल किया है, जो उनके सामने पढ़ा जाता है. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए रहमत और ज़िक्र है, जो ईमान वाली है..
52. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरम्यान गवाही के लिए अल्लाह ही काफ़ी है. वह सब जानता है, जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है. और जिन लोगों ने बातिल को माना और अल्लाह से कुफ़्र यानी इनकार किया, वही नुक़सान उठाने वाले हैं.
53. और वे लोग तुमसे अज़ाब के लिए जल्दी कर रहे हैं. अगर अज़ाब का वक़्त मुक़र्रर नहीं होता, तो उन पर अज़ाब आ चुका होता. और वह उन पर अचानक आएगा और उन्हें इसका शऊर भी नहीं होगा.
54. वे लोग तुमसे अज़ाब के लिए जल्दी करते हैं और बेशक जहन्नुम काफ़िरों को घेरने वाली है.
55. जिस दिन अज़ाब उन्हें ऊपर और नीचे से ढक लेगा और उनसे कहा जाएगा कि अब उसका ज़ायक़ा चखो, जो कुछ तुम किया करते थे.
56. ऐ हमारे बन्दो ! अगर तुम ईमान लाए हो, तो बेशक हमारी ज़मीन वसीह है. फिर तुम हमारी ही इबादत किया करो.
57. हर शख़्स मौत का ज़ायक़ा चखने वाला है. फिर तुम्हें हमारी तरफ़ ही लौटना है.
58. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो उन्हें हम जन्नत के ऊंचे महलों में जगह देंगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं. वे हमेशा उनमें रहेंगे. यह नेक अमल करने वालों का बहुत ही अच्छा अज्र है. 
59. यही वे लोग हैं, जिन्होंने सब्र किया और वे अपने परवरदिगार पर भरोसा करते हैं.
60. और बहुत से जानवर अपना रिज़्क़ उठाये नहीं फिरते. अल्लाह उन्हें भी रिज़्क़ देता है और तुम्हें भी. और वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
61. और अगर तुम उनसे दरयाफ़्त करो कि आसमानों और ज़मीन की किसने तख़लीक़ की है और चांद और सूरज को किसने काम में लगाया है, तो वे कह देंगे कि अल्लाह ने. फिर वे लोग कहां भटक रहे हैं?
62. अल्लाह ही अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है. बेशक अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है.
63. और अगर तुम उनसे दरयाफ़्त करो कि किसने आसमान से पानी बरसाया. फिर उसके ज़रिये मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा यानी बंजर ज़मीन को शादाब किया, तो वे कह देंगे कि अल्लाह ने. तुम कह दो कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, बल्कि उनमें से बहुत से लोग नहीं समझते.
64. और यह दुनिया की ज़िन्दगी खेल और तमाशे के सिवा कुछ नहीं है. और बेशक आख़िरत का घर ही असली ज़िन्दगी है. काश ! वे लोग जानते. 
65. फिर जब वे लोग कश्ती में सवार होते हैं, तो अल्लाह को पुकारते हैं और उसकी ख़ालिस इबादत करने लगते हैं. फिर जब वह उन्हें ख़ुश्की में पहुंचा कर निजात दे देता है, तो वे फ़ौरन शिर्क करने लगते हैं.
66. ताकि उस नेअमत की नाशुक्री करें, जो हमने उन्हें अता की है. और वे फ़ायदा उठाते रहें. फिर वे अनक़रीब ही अपना अंजाम जान लेंगे.
67. क्या उन्होंने नहीं देखा कि बेशक हमने हरम को अमन की जगह बनाया. और उसके आसपास के लोग उचक लिए जाते हैं, तो क्या वे लोग फिर भी बातिल पर यक़ीन रखते हैं और अल्लाह की नेअमतों की नाशुक्री करते हैं.
68. और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है, जो अल्लाह के बारे में झूठ बोहतान बांधे या जब हक़ उसके पास आए, तो उसे झुठला दे. क्या काफ़िरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है?
69. और जो लोग हमारी राह में जिहाद करते हैं, तो हम यक़ीनन उन्हें अपनी राह दिखा देते हैं. और बेशक अल्लाह मोहसिनों के साथ है.