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Friday, September 3, 2021

20 सूरह ताहा

सूरह ताहा मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 135 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ता हा.
2. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हमने तुम पर क़ुरआन इसलिए नाज़िल नहीं किया कि तुम मशक़्क़त में मुब्तिला हो जाओ.
3. लेकिन उस शख़्स की याद दहानी के लिए नाज़िल किया है, जो अल्लाह से ख़ौफ़ रखता है.
4. यह उस अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल हुआ है, जिसने ज़मीन और बुलंद आसमानों की तख़लीक़ की है.
5. वह रहमान अर्श पर इख़्तियार व इख़्तेदार रखने वाला है.
6. जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में और जो कुछ इनके दरम्यान है और जो कुछ ज़मीन के नीचे है, सब उसी का है.
7. और अगर तुम बुलंद आवाज़ में कोई बात कहो या आहिस्ता से वह सब सुनता है. बेशक वह दिलों में पोशीदा राज़ों और ख़ुफ़िया बातों से भी ख़ूब वाक़िफ़ है.
8. अल्लाह ही है, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं. सब अच्छे नाम उसी के हैं.
9. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और क्या तुम तक मूसा अलैहिस्सलाम की ख़बर पहुंची है. 
10. जब मूसा अलैहिस्सलाम ने मदयन से वापस मिस्र आते हुए आग देखी, तो अपने घरवालों से कहने लगे कि तुम यहीं ठहरो. बेशक मैंने आग देखी है. शायद मैं उसमें से एक अंगारा तुम्हारे लिए ले आऊं या आग के पास से कोई राह पा लूं.
11. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम आग के पास आए, तो उन्हें आवाज़ आई कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम !
12. बेशक मैं ही तुम्हारा परवरदिगार हूं, तो तुम अपने जूते उतार दो. बेशक तुम तुआ की मुक़द्दस वादी में हो.
13. और हमने तुम्हें रिसालत के लिए मुंतख़िब किया है. लिहाज़ा तुम ग़ौर से सुनो, जो तुम्हें वही की जा रही है. 
14. बेशक मैं ही वह अल्लाह हूं. मेरे सिवा कोई माबूद नहीं. लिहाज़ा तुम मेरी ही इबादत किया करो और मेरी  याद में पाबंदी से नमाज़ पढ़ा करो.
15. बेशक क़यामत आने वाली है. और हम उसे पोशीदा रखना चाहते हैं, ताकि हर किसी को उस अमल की पूरी जज़ा दी दिया जाए, जिसके लिए वह कोशिश करता है. 
16. फिर तुम्हें वह शख़्स इस ख़्याल से ग़ाफ़िल न कर दे, जो ख़ुद इस पर ईमान नहीं रखता और वह अपनी ख़्वाहिश की पैरवी करता है. वरना तुम भी हलाक हो जाओगे.
17. और यह तुम्हारे दाहिने हाथ में क्या है ? ऐ मूसा अलैहिस्सलाम !
18. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह मेरा असा है. मैं इसका सहारा लेता हूं और इससे अपनी बकरियों के लिए दरख़्तों की पत्तियां झाड़ता हूं और इससे मेरे कई और काम व ज़रूरतें भी पूरी होती हैं.
19. उन्हें हुक्म दिया गया कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! इसे ज़मीन पर डाल दो. 
20. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने उस असा को ज़मीन पर डाल दिया, तो वह फ़ौरन अज़दहा बनकर इधर उधर दौड़ने लगा.
21. मूसा अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया गया कि तुम इसे पकड़ लो और ख़ौफ़ज़दा न हो. हम इसे इसकी असल सूरत में लौटा देंगे. 
22. मूसा अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया गया कि और अपने हाथों को समेट कर अपनी बग़ल में दबा लो. फिर देखो कि वह बग़ैर किसी ऐब के सफे़द होकर निकलेंगे. यह दूसरी निशानी है.
23. यह इसलिए कर रहे हैं, ताकि हम तुम्हें अपनी क़ुदरत की बड़ी-बड़ी निशानियां दिखाएं.
24. फिर तुम फ़िरऔन के पास जाओ. बेशक वह बहुत सरकश हो गया है.
25. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे लिए मेरे सीने को कुशादा फ़रमा दे.
26. और रिसालत का मेरा काम मेरे लिए आसान फ़रमा दे.
27. और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे.
28. ताकि लोग मेरी बात अच्छी तरह समझ सकें. 
29. और मेरे घरवालों में से एक वज़ीर बना दे. 
30. मेरे भाई हारून को मेरा वज़ीर बना दे.
31. उसके ज़रिये मेरी पुश्त मज़बूत कर दे यानी हिम्मत बढ़ा दे. 
32. और मेरे रिसालत के काम में उसे शरीक बना दे. 
33. ताकि हम दोनों मिलकर कसरत से तेरी तस्बीह किया करें.
34. और कसरत से तेरा ज़िक्र किया करें.
35. बेशक तू हमें ख़ूब देखने वाला है.
36. अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम्हारा हर सवाल पूरा कर दिया गया है.
37. और बेशक हमने तुम पर इससे पहले भी अहसान किया था.
38. जब हमने तुम्हारी वालिदा को इल्हाम के ज़रिये वह बात बताई, जो अब तुम्हें वही की जा रही है.
39. कि तुम मूसा अलैहिस्सलाम को संदूक़ में रखकर उसे दरिया के हवाले कर दो. फिर मौजें संदूक़ को साहिल पर पहुंचा देंगी. उसे हमारा और मूसा अलैहिस्सलाम का दुश्मन उठा लेगा. और हमने तुम पर अपनी मुहब्बत का अक्स डाल दिया, ताकि तुम्हारी परवरिश हमारी निगरानी में हो.
40. और जब तुम्हारी बहन कुलसूम संदूक़ के पीछे-पीछे चली और फ़िरऔन के घरवालों से कहने लगी कि क्या मैं तुम्हें ऐसी औरत के बारे में बताऊं, जो इसकी परवरिश कर दे. फिर हमने तुम्हें तुम्हारी वालिदा के पास वापस भेज दिया, ताकि उसकी आंखें ठंडी रहें और वह ग़मगीन न हो. और तुमने एक शख़्स को क़त्ल कर दिया था. फिर हमने तुम्हें उस ग़म से भी निजात दी. और हमने तुम्हें ख़ूब आज़माया. फिर तुम कई बरस तक मदयन में रहे. फिर तुम अल्लाह के मुक़र्रर किए वक़्त पर यहां आ गए. ऐ मूसा अलैहिस्सलाम !
41. और हमने तुम्हें अपने रिसालत के काम के लिए मुंतख़िब किया है.
42. तुम अपने भाई हारून अलैहिस्सलाम के साथ हमारी निशानियां लेकर जाओ और हमारे ज़िक्र में काहिली मत करना.
43. तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ. बेशक वह बहुत सरकश हो गया है.
44. फिर तुम दोनों उससे नरमी से गुफ़्तगू करो. शायद वह नसीहत क़ुबूल करे या हमारे अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हो. 
45. मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम दोनों ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! बेशक हमें ख़ौफ़ है कि वह हम पर ज़्यादती करेगा या ज़्यादा सरकश हो जाएगा. 
46. उनसे कहा गया कि तुम ख़ौफ़ज़दा न हो. बेशक हम तुम दोनों के साथ हैं. हम सब सुनते और देखते हैं.
47. तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और कहो कि हम तेरे परवरदिगार के भेजे हुए रसूल हैं, तो तू बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे और उन्हें मज़ीद अज़ीयत न पहुंचा. बेशक हम तेरे पास तेरे परवरदिगार की तरफ़ से निशानी लेकर आए हैं. और उस शख़्स पर सलामती हो, जिसने हिदायत की पैरवी की. 
48. बेशक हमारे पास अल्लाह की तरफ़ से वही भेजी गई है कि हर उस शख़्स पर अज़ाब होगा, जो हक़ को झुठलाए और उससे मुंह फेरे.
49. फ़िरऔन ने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम दोनों का परवरदिगार कौन है?
50. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि हमारा परवरदिगार वह है, जिसने हर चीज़ की तख़लीक़ की. फिर उसे हिदायत दी.
51. फ़िरऔन ने कहा कि फिर पहले की क़ौमों का क्या हुआ?
52. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि इसका इल्म मेरे परवरदिगार के पास किताब यानी लौहे महफ़ूज़ में लिखा हुआ है. मेरा परवरदिगार न बहकता है और न भूलता है.
53. वह अल्लाह ही है, जिसने ज़मीन को तुम्हारे रहने के लिए फ़र्श बनाया और उसमें तुम्हारे लिए रास्ते बनाए और आसमान से पानी बरसाया. फिर हमने उस पानी से मुख़्तलिफ़ क़िस्मों के जोड़े बनाए.
54. तुम ख़ुद भी खाओ और अपने चौपायों को भी चराओ. बेशक इसमें अक़्लमंदों के लिए अल्लाह की क़ुदरत की बहुत सी निशानियां हैं.
55. ज़मीन की इसी मिट्टी से हमने तुम्हें पैदा किया था और मरने के बाद इसी में हम तुम्हें वापस ले जाएंगे. और क़यामत के दिन इसी में से हम तुम्हें दूसरी मर्तबा निकालेंगे. 
56. और बेशक हमने फ़िरऔन को अपनी वे तमाम निशानियां दिखा दीं, जो मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम को दी गई थीं. लेकिन उसने सबको झुठलाया और मानने से इनकार कर दिया. 
57. फ़िरऔन कहने लगा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि तुम अपने जादू के ज़ोर से हमें हमारी सरज़मीन मिस्र से निकाल दो. 
58. फिर हम भी तुम्हारे सामने जादू पेश करेंगे. फिर तुम अपने और हमारे दरम्यान मुक़ाबले के लिए एक वक़्त मुक़र्रर कर लो, जिसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी न हम करें और न तुम करो. और मुक़ाबला एक साफ़ खुले मैदान में हो.
59. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि तुम्हारे वादे का वक़्त ईद का दिन है. और उस दिन चाश्त के वक़्त सब लोग जमा किए जाएंगे. 
60. फिर फ़िरऔन दरबार से लौट गया. लिहाज़ा उसने अपनी तमाम तदबीरें जमा कीं. फिर मुक़ाबले के लिए आ गया. 
61. मूसा अलैहिस्सलाम ने जादूगरों से कहा कि तुम पर अफ़सोस है. अल्लाह पर झूठे बोहतान मत बांधना, वरना वह तुम्हें अपने अज़ाब से तबाह व बर्बाद कर देगा. और बेशक वह शख़्स नाकाम हुआ, जिसने अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधे.    
62. फिर वे जादूगर अपने काम को लेकर आपस में झगड़ने लगे और सरगोशियां करने लगे.
63. वे जादूगर कहने लगे कि ये दोनों यक़ीनन जादूगर हैं, जो यह चाहते हैं कि तुम्हें अपने जादू के ज़ोर पर तुम्हारी सरज़मीन मिस्र से निकाल बाहर करें और तुम्हारे मिसाली तरीक़े यानी मज़हब को नाबूद कर दें. 
64. फिर तुम अपनी तमाम तदबीरें जमा कर लो. फिर सफ़ बांधकर मैदान में आ जाओ. और आज के दिन वही कामयाब होगा, जो ग़ालिब रहेगा. 
65. जादूगरों ने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम अपनी चीज़ें डालो या फिर हम ही पहले डालते हैं. 
66. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि नहीं, बल्कि तुम ही डालो. फिर अचानक उनकी डाली रस्सियां और उनके असा उनके जादू के असर से मूसा अलैहिस्सलाम के गुमान में ऐसे दिखने लगें, जैसे वे सब दौड़ रहे हैं. 
67. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने दिल में कुछ ख़ौफ़ महसूस किया.
68. हमने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम ख़ौफ़ज़दा मत हो. बेशक तुम ही ग़ालिब रहोगे. 
69. और तुम्हारे दाहिने हाथ में जो असा है, उसे ज़मीन पर डाल दो. वह उस फ़रेब को निगल जाएगा, जो उन्होंने बना रखा है. जो कुछ उन्होंने बना रखा वह तो जादूगर का फ़रेब है. और जादूगर जहां कहीं भी जाएगा, कामयाबी नहीं पाएगा. (फिर ऐसा ही हुआ) 
70. फिर सब जादूगर सजदे में गिर पड़े और कहने लगे कि हम मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम के परवरदिगार पर ईमान ले आए.
71. फ़िरऔन ने कहा कि तुम इन पर ईमान ले आए हो. इससे पहले कि मैं तुम्हें इजाज़त देता. बेशक वे मूसा तुम्हारे भी बड़े उस्ताद हैं, जिन्होंने तुम्हें जादू सिखाया है. मैं यक़ीनन तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और तुम्हारे दूसरी तरफ़ के पांव काट दूंगा और तुम्हें खजूर के तनों में सूली पर लटका दूंगा. और तुम ज़रूर जान लोगे कि हम में से कौन अज़ाब देने में ज़्यादा सख़्त और ज़्यादा मुद्दत तक बाक़ी रहने वाला है.
72. जादूगर कहने लगे कि हम तुझे हरगिज़ उन वाजे़ह दलीलों पर तरजीह नहीं देंगे, जो हमारे पास आ चुकी हैं. उस ख़ालिक़ की क़सम, जिसने हमें पैदा किया है. फिर तू वह कर, जो करने वाला है. बेशक तू सिर्फ़ दुनियावी ज़िन्दगी के बारे में ही फ़ैसला कर सकता है.
73. बेशक हम अपने परवरदिगार पर इसलिए ईमान लाए हैं, ताकि वह हमारी ख़तायें बख़्श दे और उसके लिए भी मुआफ़ कर दे, जिस जादूगरी के लिए तूने हमें मजबूर किया था. और अल्लाह ही बेहतरीन और हमेशा बाक़ी रहने वाला है.
74. बेशक जो शख़्स अपने परवरदिगार के पास मुजरिम बनकर आएगा, तो बिला शक उसके लिए जहन्नुम है. वह उसमें न मरेगा और न ज़िन्दा ही रहेगा यानी उसमें अज़ाब से तड़पता रहेगा.
75. और जो शख़्स उसकी बारगाह में मोमिन बनकर आएगा और उसने नेक अमल भी किए, तो उन्हीं लोगों के लिए बुलंद दर्जात हैं.
76. यानी जन्नत के सदाबहार बाग़ हैं, जिनके नीचे नहरें बहती हैं. वे लोग उनमें हमेशा रहेंगे. और यह उसकी जज़ा है, जो गुनाहों से पाक होगा. 
77. और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि हमारे बन्दों यानी बनी इस्राईल को मिस्र से रातों रात लेकर चले जाओ. फिर दरिया में अपना असा मार कर उनके लिए एक ख़ुश्क रास्ता बना लो. फिर न पकड़े जाने का ख़ौफ़ होगा और न ग़र्क़ होने की दहशत.
78. फिर फ़िरऔन ने अपने लश्कर के साथ उनका पीछा किया. फिर दरिया की मौजों ने उन्हें ढक लिया, जितना वे ढक सकती थीं.
79. और फ़िरऔन ने अपनी क़ौम को गुमराह कर दिया और उन्हें हिदायत नहीं दी.
80. ऐ बनी इस्राईल ! बेशक हमने तुम्हें तुम्हारे दुश्मन से निजात दी और हमने तुमसे कोहे तूर की दाहिने तरफ़ आने का वादा किया और हमने तुम पर मन और सलवा नाज़िल किया.
81. और तुमसे कहा गया कि तुम पाक़ीज़ा चीज़ों में से खाओ व पियो, जो रिज़्क़ हमने तुम्हें अता किया है. और उसमें सरकशी न करो, वरना तुम पर हमारा ग़ज़ब नाज़िल हो जाएगा. और जिस पर हमारा ग़ज़ब वाजिब हुआ, तो वह वाक़ई हालाक हो गया. 
82. और बेशक हम बड़े बख़्शने वाले हैं उस शख़्स को, जो तौबा करे और ईमान लाए और नेक अमल करे. फिर हिदायत पर क़ायम रहे.
83. और जब मूसा अलैहिस्सलाम कुछ लोगों को लेकर चले और ख़ुद आगे बढ़ आए, तो हमने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुमने अपनी क़ौम से आगे चलने में जल्दी क्यों की.
84. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि वे लोग भी मेरे पीछे आ रहे हैं और मैंने तेरी बारगाह में पहुंचने में जल्दी इसलिए की, ताकि तू मुझसे राज़ी हो जाए.
85. उनसे कहा गया कि बेशक हमने तुम्हारे आने के बाद तुम्हारी क़ौम को फ़ितने में मुब्तिला कर दिया है और सामरी ने उन्हें गुमराह कर दिया.
86. फिर मूसा अलैहिस्सलाम अपनी क़ौम की तरफ़ ग़ज़बनाक और अफ़सोस करते हुए लौट गए और कहने लगे कि ऐ मेरी क़ौम ! क्या तुम्हारे परवरदिगार ने तुमसे एक अच्छा वादा नहीं किया था. क्या तुम पर वादा पूरा होने में तवील मुद्दत गुज़र गई थी. क्या तुमने यह चाहा कि तुम पर तुम्हारे परवरदिगार का ग़ज़ब वाजिब हो जाए ? फिर तुमने मेरे वादे की ख़िलाफ़वर्ज़ी की. 
87. वे लोग कहने लगे कि हमने अपने इख़्तियार से आपके वादे की ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं की, लेकिन हुआ यूं कि मिस्र से निकलते वक़्त फ़िरऔन की क़ौम के ज़ेवर के जो बोझ हम पर लादे गए थे, तो हमने उन्हें आग में डाल दिया. फिर उसी तरह सामरी ने भी अपने ज़ेवर आग में डाल दिए.
88. फिर सामरी ने उन लोगों के लिए उन गले हुए जे़वरात से एक बछड़े का मुजस्समा बनाया, जिसकी आवाज़ भी बछड़े जैसी थी. कुछ लोग कहने लगे कि यह तुम्हारा सरपरस्त है और मूसा अलैहिस्सलाम का भी सरपरस्त है, लेकिन वे भूल गए. 
89. फिर क्या वे इतना भी नहीं देखते कि वह बछड़ा उन्हें किसी बात का जवाब भी नहीं दे सकता और न वह उनके किसी नुक़सान और नफ़े का इख़्तियार रखता है.
90. और बेशक हारून अलैहिस्सलाम ने उन्हें इससे पहले कह दिया था कि ऐ मेरी क़ौम ! तुम इस बछड़े के ज़रिये फ़ितने में मुब्तिला हो गए हो. और बेशक तम्हारा परवरदिगार मेहरबान अल्लाह है. फिर तुम मेरी पैरवी करो और मेरा कहना मानो.
91. वे लोग कहने लगे कि हम तो इसी बछड़े को पुकारने पर ही जमे रहेंगे जब तक मूसा अलैहिस्सलाम हमारे पास वापस नहीं आ जाते. 
92. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ हारून अलैहिस्सलाम ! तुम्हें किस चीज़ ने रोके रखा जब तुमने देखा कि ये लोग गुमराह हो रहे हैं.
93. तुमने मेरी पैरवी क्यों नहीं की? क्या तुमने मेरे हुक्म की नाफ़रमानी की?
94. हारून अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी मां के बेटे ! आप न मेरी दाढ़ी पकड़ें और न मेरे सर के बाल. मैं सख़्ती करने से डरता था कि आप यह न कहें कि तुमने बनी इस्राईल के दरम्यान तफ़रक़ा डाल दिया. और मेरे क़ौल का इंतज़ार नहीं किया.
95. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ सामरी ! तेरा क्या मामला है?
96. वह कहने लगा कि मैंने दो चीज़ें देखीं, जो उन लोगों ने नहीं देखी थीं. इसलिए मैंने फ़रिश्ते के क़दमों के निशान की एक मुट्ठी ख़ाक उठा ली. फिर उसे बछड़े के मुजस्समे पर डाल दिया, तो वह बोलने लगा. और मेरे नफ़्स ने मुझे यही सुझाया. 
97. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि फिर तू यहां से चला जा. बेशक तेरे लिए ज़िन्दगी में यह सज़ा है कि तू हर किसी से यही कहता फिरेगा कि मुझे मत छूना और बेशक आख़िरत में भी तेरे लिए अज़ाब का वादा है, जिसकी हरगिज़ ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं होगी. और तू अपने इस मनगढ़ंत सरपरस्त की तरफ़ देख, जिसे पुकारने पर तू जमकर बैठा रहा. हम ज़रूर उसे जला देंगे. फिर हम ज़रूर उसकी राख दरिया में बिखेर देंगे.
98. ऐ लोगो ! तुम्हारा माबूद सिर्फ़ वही अल्लाह है, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं. वह हर चीज़ को अपने इल्म के अहाते में लिए हुए है. 
99. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! इसी तरह हम तुम्हारे सामने उन क़ौमों के वाक़ियात बयान करते हैं, जो पहले गुज़र चुकी हैं और बेशक हमने तुम्हें अपनी बारगाह से ज़िक्र यानी क़ुरआन अता किया है. 
100. जो उससे मुंह फेरेगा, तो बेशक वह क़यामत के दिन सख़्त बोझ उठाएगा.
101. वे लोग उस अज़ाब में हमेशा रहेंगे. और उनके लिए क़यामत के दिन बहुत बुरा बोझ होगा. 
102. जिस दिन सूर फूंका जाएगा और उस दिन हम गुनाहगारों को इस तरह जमा करेंगे कि दहशत से उनके जिस्म और आंखें नीली हो जाएंगी.
103. वे लोग आपस में आहिस्ता-आहिस्ता बातें कर रहे होंगे कि हम दुनिया में मुश्किल से दस दिन ही ठहरे होंगे.
104. हम ख़ूब जानते हैं कि जो कुछ वे लोग कहेंगे, जबकि उनमें सबसे होशियार शख़्स कहेगा कि तुम तो एक दिन के सिवा दुनिया में ठहरे ही नहीं हो.
105. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुमसे वे लोग पहाड़ों के बारे में सवाल करते हैं. फिर तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार क़यामत के दिन उन्हें बिल्कुल रेज़ा-रेज़ा करके उड़ा देगा. 
106. और ज़मीन को एक साफ़ मैदान बना देगा. 
107. जिसमें तुम न कोई बस्ती देखोगे और न कोई बुलंदी.
108. उस दिन लोग पुकारने वाले के पीछे इस तरह दौड़ पड़ेंगे कि उसमें कुछ भी कजी नहीं होगी और मेहरबान अल्लाह के जलाल से सब आवाज़ें पस्त हो जाएंगी. फिर तुम हल्की सी आहट के सिवा कुछ नहीं सुनोगे.
109. उस दिन किसी की सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आएगी, सिवाय उसके जिसे मेहरबान अल्लाह ने इजाज़त दी हो और जिसकी बात उसे पसंद आए. 
110. वह सब जानता है, जो कुछ उन लोगों के आगे है और जो कुछ उनके पीछे है. और वे लोग अपने इल्म से उसके इल्म का अहाता नहीं कर सकते.
111. और सबके चेहरे हमेशा रहने वाले अल्लाह के हुज़ूर में झुक जाएंगे. और बेशक वह नाकाम होगा, जिसने ज़ुल्म का बोझ उठाया. 
112. और जो शख़्स नेक अमल करता रहा और वह मोमिन भी है, तो उसे न किसी ज़ुल्म का ख़ौफ़ होगा और न किसी नुक़सान का.
113. और इसी तरह हमने क़ुरआन को अरबी ज़बान में नाज़िल किया है. और हमने इसमें अज़ाब से ख़बरदार करने की बातें बार-बार मुख़्तलिफ़ तरीक़े से बयान की हैं, ताकि वे लोग परहेज़गार बन जाएं या उनमें ज़िक्र का जज़्बा पैदा हो जाए.
114. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर अल्लाह आला मर्तबा है. वही हक़ीक़ी बादशाह है. और तुम क़ुरआन पढ़ने में जल्दी न किया करो, इससे पहले कि उसकी वही तुम पर पूरी नाज़िल कर दी जाए. और तुम दुआ मांगा करो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा कर दे. 
115. और हमने इससे बहुत पहले आदम अलैहिस्सलाम को एक हुक्म दिया था, लेकिन वह भूल गए. और हमने उनमें नाफ़रमानी का इरादा नहीं पाया. 
116. और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करो, तो सबने सजदा किया, सिवाय इबलीस के. उसने इनकार कर दिया. 
117. फिर हमने कहा कि ऐ आदम अलैहिस्सलाम ! बेशक यह शैतान तुम्हारा और तुम्हारी बीवी हव्वा का दुश्मन है. फिर कहीं यह तुम्हें जन्नत से न निकलवा दे. फिर तुम मशक़्क़त में मुब्तिला हो जाओगे.
118. बेशक तुम्हारे लिए इस जन्नत में राहत है कि तुम न भूखे रहोगे और न बरहना. 
119. और बेशक यहां तुम्हें न प्यास लगेगी और न धूप की तपिश होगी.
120. फिर शैतान ने उनके दिल में वसवसा डाल दिया और कहने लगा कि ऐ आदम अलैहिस्सलाम ! क्या मैं तम्हें ऐसी दाइमी ज़िन्दगी बसर करने का शजर और बादशाहत का राज़ बताऊं, जिसे न ज़वाल आएगा और न फ़ना होगी. 
121. फिर आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा दोनों ने उस दरख़्त का फल खा लिया, तो उन पर उनकी शर्मगाहें ज़ाहिर हो गईं और दोनों जन्नत के दरख़्त के पत्तों से अपने जिस्म को ढकने लगे. और आदम अलैहिस्सलाम ने अपने परवरदिगार के हुक्म की ख़िलाफ़वर्ज़ी की, तो उन्होंने राह नहीं पाई. यानी वे जन्नत में दाइमी ज़िन्दगी न पा सके.
122. फिर उनके परवरदिगार ने उन्हें अपनी क़ुर्बत और नबुवत  के लिए मुंतख़िब कर लिया. फिर उन पर तवज्जो दी और उनकी तौबा क़ुबूल की और उन्हें हिदायत दी.  
123. उन्हें हुक्म दिया कि तुम सब यहां से नीचे उतर जाओ. तुम में से कुछ लोग कुछ लोगों के दुश्मन होंगे. फिर इसके बाद हमारी तरफ़ से तुम्हारे पास कोई हिदायत आए, तो जो हमारी हिदायत की पैरवी करेगा, तो वह न दुनिया में गुमराह होगा और न आख़िरत में बदनसीब होगा. 
124. और जो हमारे ज़िक्र से मुंह फेरेगा, तो बेशक उसके लिए दुनियावी ज़िन्दगी तंग हो जाएगी और क़यामत के दिन हम उसे अंधा करके उठाएंगे.
125. वह कहेगा कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तूने मुझे आज अंधा क्यों उठाया. हालांकि दुनिया में मैं आंखों वाला था. 
126. उससे कहा जाएगा कि इसी तरह जब दुनिया में तेरे पास हमारी निशानियां आई थीं, तो तूने उन्हें झुठला दिया था. और आज इसी तरह तू भी झुठला दिया जाएगा.
127. और इसी तरह हम उस शख़्स को सज़ा देते हैं, जो सरकशी में हद से बढ़ जाता है और अपने परवरदिगार की आयतों पर ईमान नहीं लाता. और बेशक आख़िरत का अज़ाब बड़ा सख़्त और हमेशा रहने वाला है.
128. तो क्या उन लोगों को इस बात ने हिदायत नहीं दी कि हमने उनसे पहले कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया, जिनके घरों में अब वे लोग चलते फिरते हैं. बेशक इसमें अक़्लमंदों के लिए अल्लाह की क़ुदरत की बहुत सी निशानियां हैं.
129. और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक बात पहले से तय न होती और अज़ाब का वक़्त मुक़र्रर न  होता, तो उन पर अज़ाब ज़रूर आ जाता. 
130. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर तुम उस पर सब्र करो, जो कुछ वे काफ़िर कहते हैं. और सूरज के तुलूअ होने से पहले यानी फ़ज्र की नमाज़ में और सूरज के ग़ुरूब होने से पहले यानी अस्र की नमाज़ में अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह किया करो. और रात के इब्तियाई लम्हों में भी यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ों में भी तस्बीह किया करो और दिन के किनारों यानी ज़ुहर की नमाज़ में भी तस्बीह किया करो, ताकि तुम राज़ी हो जाओ.
131. और तुम दुनियावी ज़िन्दगी में ऐशो आराम की उन चीज़ों की तरफ़ हैरत से मत देखो, जो हमने उन काफ़िरों में से कुछ लोगों को दी हैं ताकि हम उनके ज़रिये उनमें फ़ितना पैदा कर दें. और तुम्हारे परवरदिगार का रिज़्क़ उससे कहीं बेहतर और हमेशा बाक़ी रहने वाला है. 
132. और तुम अपने घरवालों को नमाज़ का हुक्म दो और तुम ख़ुद भी उसके पाबंद रहो. हम तुमसे रिज़्क़ तलब नहीं करते, बल्कि हम तो ख़ुद तुम्हें रिज़्क़ देते हैं और बेहतर अंजाम परहेज़गारी का ही है.
133. और काफ़िर कहते हैं कि ये रसूल हमारे पास अपने परवरदिगार की तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं लाते. क्या उनके पास उनकी बातों की वाज़ेह निशानी क़ुरआन नहीं आ गया है, जिसका ज़िक्र पहले के आसमानी सहीफ़ों में मौजूद है. 
134. और अगर हम उन लोगों को इससे पहले ही किसी अज़ाब के ज़रिये हलाक कर देते, तो वे ज़रूर कहते कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तूने हमारे पास किसी रसूल को क्यों नहीं भेजा कि हम तेरी आयतों की पैरवी कर लेते इससे पहले कि हम ज़लील व ख़्वार होते. 
135. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि हर शख़्स मुंतज़िर है. इसलिए तुम इंतज़ार करते रहो. फिर तुम अनक़रीब जान लोगे कि कौन सीधे रास्ते पर चलने वाले हैं और कौन हिदायत याफ़्ता हैं.