Tuesday, August 31, 2021

23 सूरह अल मोमिनून

सूरह अल मोमिनून मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 118 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. बेशक ईमान वाले ही कामयाब हो गए.
2. जो लोग अपनी नमाज़ों में आजिज़ी करते हैं.
3. और जो लोग बेहूदा बातों से गुरेज़ करते हैं.
4. और जो लोग ज़कात अदा करते हैं.
5. और जो लोग अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करते हैं.
6. लेकिन अपनी बीवियों और कनीज़ों के पास जाने में बेशक कोई हर्ज नहीं है. 
7. फिर जो शख़्स इनके सिवा किसी और का ख़्वाहिशमंद हुआ, तो ऐसे ही लोग हद से तजावुज़ करने वाले हैं.
8. और जो लोग अपनी अमानतों और अपने अहद का लिहाज़ रखते हैं.
9. और जो लोग अपनी नमाज़ों की हिफ़ाज़त करते हैं यानी अपने तमाम फ़राईज़ पूरे करते हैं.
10. यही लोग जन्नत के वारिस हैं.
11. ये लोग जन्नत के सबसे आला बाग़ यानी जन्नतुल फ़िरदौस के वारिस बनेंगे और उसमें हमेशा रहेंगे.
12. और बेशक हमने इंसान की इब्तिदाई तख़लीक़ गीली मिट्टी से की है.
13. फिर हमने उसे नुत्फ़ा बनाकर महफ़ूज़ जगह यानी रहम में रखा.
14. फिर हमने नुत्फ़े को जमा हुआ ख़ून बनाया. फिर हमने उसे गोश्त का लोथड़ा बनाया. फिर हमने उसे हड्डियों में तबदील कर दिया. फिर हमने हड्डियों के ढांचे पर गोश्त चढ़ाकर इंसान की तख़लीक़ की. फिर अल्लाह ने उसमें रूह डालकर उसे एक वजूद बख़्शा. फिर अल्लाह बड़ा बाबरकत बेहतरीन तख़लीक़ करने वाला है.
15. फिर बेशक तुम सबको इसके बाद एक न एक दिन मरना है.
16. फिर बेशक तुम क़यामत के दिन ज़िन्दा करके क़ब्रों से उठाए जाओगे.
17. और बेशक हमने तुम्हारे ऊपर तह ब तह सात आसमान बनाए और हम मख़लूक़ से ग़ाफ़िल नहीं हैं.
18. और हम एक अंदाज़े के मुताबिक़ आसमान से पानी बरसाते हैं. फिर उसे ज़मीन में ठहरा देते हैं. और बेशक हम उसे ले जाने पर भी क़ादिर हैं. 
19. फिर हमने उस पानी से तुम्हारे लिए खजूरों और अंगूरों के बाग़ बनाए. उनमें तुम्हारे लिए बहुत से फल व मेवे पैदा होते हैं, जिन्हें तुम खाते हो.
20. और हमने ज़ैतून का शजर उगाया, जो तूरे सीना में कसरत से उगता है. इससे तेल भी निकलता है और वह खाने वालों के लिए सालन भी है.
21. और बेशक तुम्हारे लिए चौपायों में भी इबरत का पहलू है, जो कुछ उनके पेट में है, उसमें से हम तुम्हें दूध पिलाते हैं और तुम्हारे लिए उनमें और भी बहुत से फ़ायदे हैं. और तुम उनमें से कुछ को खाते भी हो.
22. और उन चौपायों और कश्तियों पर तुम सवार भी किए जाते हो.
23. और बेशक हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! तुम अल्लाह की इबादत किया करो. उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते. 
24. तो उनकी क़ौम के कुफ़्र करने वाले सरदार कहने लगे कि ये तुम्हारे जैसे ही बशर हैं. ये तुम पर फ़ज़ीलत और बरतरी क़ायम करना चाहते हैं. और अगर अल्लाह पैग़म्बर भेजना चाहता, तो फ़रिश्तों को नाज़िल करता. हमने ऐसी बात तो पहले अपने बाप दादाओं से कभी नहीं सुनी.
25. ये शख़्स सिवाय इसके कुछ नहीं कि इन्हें जुनून हो गया है. फिर तुम लोग कुछ वक़्त तक उनके अंजाम का इंतज़ार करो.
26. नूह अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मेरी मदद फ़रमा, क्योंकि उन लोगों ने मुझे झुठला दिया है. 
27. फिर हमने नूह अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि तुम हमारी निगरानी में हमारे हुक्म के मुताबिक़ कश्ती बनाओ. फिर जब हमारे अज़ाब का हुक्म आ जाए और तनूर से पानी उबलने लगे, तो तुम कश्ती में हर क़िस्म के जानवरों में से नर व मादा के जोड़े बिठा लेना और अपने घरवालों को भी उसमें सवार कर लेना, सिवाय उन लोगों के जिन पर हमारे अज़ाब का हुक्म सादिर हो चुका है. और उन लोगों के बारे में हमसे कुछ मत कहना, जिन्होंने ज़ुल्म किया है. बेशक वे लोग ग़र्क़ होने वाले हैं.
28. फिर जब तुम अपने साथियों के साथ कश्ती पर इत्मीनान से बैठ जाओ, तो कहना कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जिसने हमें ज़ालिम क़ौम से निजात दी.
29. और दुआ अर्ज़ करो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे बाबरकत मंज़िल पर उतारना और तू बेहतरीन उतारने वाला है. 
30. बेशक इस वाक़िये में अल्लाह की क़ुदरत की बहुत सी निशानियां हैं. और बेशक हम आज़माइश लेने वाले हैं. 
31. फिर हमने उनके बाद एक और क़ौम समूद को पैदा किया.
32. और हमने उनमें भी उन्हीं में से सालेह अलैहिस्सलाम को रसूल बनाकर भेजा और उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि तुम अल्लाह की इबादत करो. उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
33. और उनकी क़ौम के भी वही सरदार, जो कुफ़्र करते थे और आख़िरत की मुलाक़ात को झुठलाते थे और हमने जिन्हें दुनियावी ज़िन्दगी में ऐशो इशरत का सामन दे रखा था, वे कहने लगे कि ये तो तुम्हारे जैसे ही बशर हैं, जो वही चीज़ें खाते हैं, जो चीज़ें तुम खाते हो और वही सब पीते हैं, जो तुम पीते हो. 
34. और अगर तुम लोगों ने अपने ही जैसे बशर की इताअत कर ली, तो बेशक तुम नुक़सान में रहोगे.
35. क्या वे सालेह अलैहिस्सलाम तुमसे वादा करता है कि जब तुम मर जाओगे और ख़ाक और बोसीदा हड्डियां हो जाओगे, तो तुम दोबारा ज़िन्दा करके क़ब्रों से निकाले जाओगे.
36. वह बिल्कुल क़यास से बईद बहुत बईद है, जो वादा तुमसे किया जाता है.
37. आख़िरत की ज़िन्दगी कुछ भी नहीं है. हमारी ज़िन्दगी तो सिर्फ़ यही दुनिया है. हमारा मरना और जीना सब यहीं है. और हम दोबारा ज़िन्दा करके नहीं उठाए जाएंगे. 
38. ये सालेह अलैहिस्सलाम ऐसे शख़्स हैं, जिन्होंने अल्लाह पर झूठा बोहतान बांधा है और हम उस पर ईमान लाने वाले नहीं हैं. 
39. सालेह अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मेरी मदद फ़रमा, क्योंकि उन लोगों ने मुझे झुठला दिया है. 
40. सालेह अलैहिस्सलाम से कहा गया कि अनक़रीब ही वे लोग नादिम होकर रह जाएंगे. 
41. फिर उन लोगों को एक ख़ौफ़नाक आवाज़ ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया और हमने उन्हें कूड़े कर्कट का ढेर बना दिया. फिर ज़ालिम क़ौम अल्लाह की रहमत से दूर व महरूम है.
42. फिर हमने उनके बाद दूसरी क़ौमों को पैदा किया.
43. कोई भी उम्मत अपने मुर्क़रर वक़्त से न आगे बढ़ सकती है और उससे पीछे हट सकती है.
44. फिर हमने लगातार बहुत से रसूल भेजे. जब भी किसी उम्मत के पास उनके रसूल आते, तो वे लोग उन्हें झुठला देते. फिर हम भी उन उम्मतों को एक दूसरे के बाद हलाक करते चले गए. और हमने उन्हें हदीसें यानी अफ़साने बना दिया. उस क़ौम पर अल्लाह की लानत है, जो ईमान नहीं लाती.
45. फिर हमने मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम को अपनी निशानियां और वाज़ेह  दलील के साथ भेजा.
46. फ़िरऔन और उसके दरबारियों के पास, तो उन लोगों ने तकब्बुर किया. और वह क़ौम बड़ी सरकश थी.
47. वे लोग कहने लगे कि क्या हम अपने ही जैसे दो आदमियों पर ईमान ले आएं. हालांकि उन दोनों की क़ौम हमें पुकारती है.
48. फिर उन लोगों ने भी मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो वे भी हलाक होने वाले लोगों में से हो गए. 
49. और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की थी, ताकि वे लोग हिदायत पाएं.
50. और हमने मरयम अलैहिस्सलाम के बेटे ईसा अलैहिस्सलाम और उनकी मां को अपनी क़ुदरत की निशानी बनाया. और हमने उन्हें एक ऐसी बुलंदी पर पनाह दी, जो एक पुरसकून जगह थी और वहां नहरें, आबशार और चश्मे थे. 
51. उनसे कहा गया कि ऐ रसूल ! पाकीज़ा चीज़ें खाओ व पियो और नेक अमल करते रहो. बेशक जो आमाल तुम करते हो, हम उन्हें ख़ूब जानते हैं.
52. और बेशक यह तुम्हारी उम्मत है, एक ही उम्मत है और मैं तुम्हारा परवरदिगार हूं. फिर मुझसे डरा करो.
53. फिर उन लोगों ने अपने दीन में इख़्तिलाफ़ करके उसे फ़िरक़ा-फ़िरक़ा कर दिया. हर फ़रीक़ जो कुछ उसके पास है, उसी में ख़ुश है
54. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उन लोगों को एक मुद्दत के लिए जहालत में ही पड़ा छोड़ दो.
55. क्या वे लोग यह गुमान करते हैं कि हम जो माल और औलाद के ज़रिये उनकी मदद कर रहे हैं. 
56. तो हम उनके लिए भलाइयों में जल्दी कर रहे हैं. ऐसा नहीं है, बल्कि उन्हें शऊर ही नहीं हैं.
57. बेशक जो लोग अपने परवरदिगार के ख़ौफ़ से लरज़ते हैं. 
58. और जो लोग अपने परवरदिगार की आयतों पर ईमान रखते हैं.
59. और जो लोग अपने परवरदिगार के साथ किसी को शरीक नहीं ठहराते.
60. और जो लोग अल्लाह की राह में उतना देते हैं, जितना वे दे सकते हैं. और फिर भी उनके दिल में ख़ौफ़ रहता है कि उन्हें अपने परवरदिगार की तरफ़ ही लौटना है.
61. यही वे लोग हैं, जो भलाई समेटने में सबक़त करते हैं और नेकी की तरफ़ आगे बढ़ जाते हैं.
62. और हम किसी को उसकी क़ूवत से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देते. और हमारे पास लोगों के आमाल की किताब है, जो हक़ बताती है और उन पर ज़ुल्म नहीं किया जाएगा. 
63. बल्कि उनके दिल इस क़ुरआन के पैग़ाम से ग़फ़लत में मुब्तिला हैं. और इसके अलावा भी उनके बहुत से बुरे आमाल हैं, जिनसे वे बाज़ नहीं आते.
64. यहां तक कि जब हम उनके ख़ुशहाल लोगों को अज़ाब में गिरफ़्तार करेंगे, तो उस वक़्त वे फ़रियाद करने लगेंगे. 
65. उनसे कहा जाएगा कि तुम आज फ़रियाद मत करो. बेशक हमारी तरफ़ से तुम्हारी कोई मदद नहीं की जाएगी. 
66. बेशक जब हमारी आयतें तुम्हारे सामने पढ़ी जाती थीं, तो तुम उलटे पांव वापस लौट जाते थे. 
67. उससे तकब्बुर करते हुए व अफ़साने कहकर बेहूदगी करते हुए.  
68. क्या उन लोगों ने अल्लाह के क़ौल पर ग़ौर नहीं किया या उनके पास कोई ऐसी चीज़ आ गई है, जो पहले उनके बाप दादा के पास नहीं आई थी.
69. या उन लोगों ने अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को नहीं पहचाना, तो इसलिए इनकार कर रहे हैं.
70. या वे लोग यह कहते हैं कि इन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को जुनून हो गया है. हरगिज़ नहीं, बल्कि वे तो उनके पास हक़ लेकर आए हैं. और उनमें से बहुत से लोग हक़ को पसंद नहीं करते.
71. और अगर हक़ उनकी ख़्वाहिशों की पैरवी करता है, तो आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके दरम्यान है, सब तबाह व बर्बाद हो जाता, बल्कि हम उनके पास वह क़ुरआन लाए हैं, जिसमें उनके लिए ज़िक्र है. और वे लोग ख़ुद ही ज़िक्र यानी नसीहत से मुंह फेर रहे हैं.
72. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या तुम उनसे कुछ उजरत चाहते हो. हरगिज़ नहीं. तुम्हारे परवरदिगार का अज्र उससे कहीं बेहतर है. और वह बेहतरीन रिज़्क़ देने वाला है.
73. और बेशक तुम उन्हें सीधे रास्ते की तरफ़ बुलाते हो.
74. और बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, वे ज़रूर सीधे रास्ते से हटे हुए हैं.
75. और अगर हम उन पर रहम करें और उनकी तकलीफ़ों को दूर कर दें, तो भी वे अपनी सरकशी पर अड़ जाएं और भटकते फिरें.
76. और बेशक हमने उन्हें अज़ाब में गिरफ़्तार कर लिया. फिर भी उन्होंने अपने परवरदिगार के लिए न आजिज़ी इख़्तियार की और न वे गिड़गिड़ाए.
77. यहां तक कि जब हमने उनके सामने एक सख़्त अज़ाब के दरवाज़े खोल दिए, तो उस वक़्त वे लोग मायूस हो गए. 
78. और वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हारे कान और आंखें और दिल बनाए. लेकिन तुम लोग बहुत कम शुक्र अदा करते हो.
79. और वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हें ज़मीन में फैला दिया और क़यामत के दिन तुम उसके हुज़ूर में जमा किए जाओगे.
80. और वह अल्लाह ही है, जो ज़िन्दगी बख़्शता है और मौत देता है. और रात दिन का आना जाना भी उसी के इख़्तियार में है. क्या फिर भी तुम नहीं समझते.  
81. बल्कि वे लोग भी उसी तरह की बातें करते हैं, जिस तरह पहले के काफ़िर किया करते थे. 
82. वे लोग कहते हैं कि जब हम मर जाएंगे और ख़ाक और बोसीदा हड्डियां हो जाएंगे, तो क्या हम दोबारा ज़िन्दा करके उठाए जाएंगे.
83. बेशक हमसे और इससे पहले हमारे बाप दादाओं से भी यही वादा किया जाता रहा है. यह हक़ीक़त नहीं है, बल्कि ये तो पहले के लोगों के अफ़साने हैं. 
84. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि यह ज़मीन और इसमें बसने वाली मख़लूक़ किसकी है? अगर तुम लोग कुछ जानते हो.
85. वे लोग फ़ौरन कह देंगे कि सबकुछ अल्लाह ही का है. तुम कह दो कि फिर तुम लोग ग़ौर क्यों नहीं करते. 
86. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि सातों आसमानों और अर्शे अज़ीम का मालिक कौन है ?
87. वे लोग फ़ौरन कह देंगे कि सबकुछ अल्लाह ही का है. तुम कह दो कि फिर तुम लोग अल्लाह से क्यों नहीं डरते ?
88. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि वह कौन है, जिसके हाथ में हर चीज़ की बादशाहत है. और वह जिसे चाहता है, पनाह देता है. और उसके अज़ाब से कोई पनाह देने वाला नहीं है. अगर तुम जानते हो.
89. वे लोग फ़ौरन कह देंगे कि सबकुछ अल्लाह ही के इख़्तियार में है. तुम कह दो कि फिर तुम किस जादू के फ़रेब में मुब्तिला हो.
90. बल्कि हम उनके पास हक़ लेकर आए हैं और बेशक वे लोग झूठे हैं.
91. अल्लाह ने किसी को अपनी औलाद नहीं बनाया है और न उसके साथ कोई और सरपरस्त है. अगर ऐसा होता, तो हर सरपरस्त अपनी-अपनी मख़लूक़ को ले जाता. फिर वे एक दूसरे पर बरतरी हासिल करने की फ़िक्र करते. अल्लाह उससे पाक है, जो कुछ वे लोग बयान करते हैं.  
92. अल्लाह ग़ैब और ज़ाहिर का जानने वाला है. वह उन सबसे आला है, जिन्हें वे लोग उसका शरीक ठहराते हैं.
93. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम अर्ज़ करो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! अगर तू मुझे वह अज़ाब दिखा दे, जिसका तूने उन लोगों से वादा किया जाता है.
94. ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मुझे ज़ालिमों की क़ौम में शामिल मत करना.
95. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और बेशक हम इस पर ज़रूर क़ादिर हैं कि हम तुम्हें वह अज़ाब दिखा दें, जिसका उन लोगों से वादा करते हैं.
96. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम बुराई को अच्छाई से दूर किया करो. हम उसे ख़ूब जानते हैं,  जो कुछ वे लोग बयान करते हैं. 
97. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम यह अर्ज़ करो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं शैतान के वसवसों से तेरी पनाह चाहता हूं.
98. ऐ मेरे परवरदिगार ! और मैं इससे भी तेरी पनाह चाहता हूं कि शैतान मेरे पास आएं.
99. यहां तक कि जब उनमें से किसी को मौत आ जाए, तो कहने लगे कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मुझे दुनिया में वापस भेज दे. 
100. ताकि मैं दुनिया में नेक अमल करूं, जिसे मैं छोड़ आया हूं. उससे कहा जाएगा कि हरगिज़ नहीं. यह वह बात है, जिसे वह कह रहा होगा. और उनके मरने के बाद आलमे बरज़ख़ है, जो उस दिन तक क़ायम रहेगा, जिस दिन वे लोग ज़िन्दा करके क़ब्रों से उठाए जाएंगे.
101. फिर जब सूर फूंका जाएगा, तो उनके दरम्यान उस दिन न रिश्ते बाक़ी रहेंगे और न वे लोग एक दूसरे का हाल पूछ सकेंगे. 
102. फिर जिन लोगों के नेकियों के पलड़े भारी होंगे, तो वही लोग कामयाबी पाएंगे.
103. और जिन लोगों के नेकियों के पलड़े हल्के होंगे, तो वही लोग हैं, जिन्होंने ख़ुद अपना नुक़सान किया. वे जहन्नुम में हमेशा रहेंगे.
104. और जहन्नुम की आग उनके चेहरों को झुलसा देगी और वे लोग उसमें दांत निकले यानी बिगड़े चेहरे के साथ पड़े होंगे.
105. उनसे कहा जाएगा कि क्या तुम्हें हमारी आयतें पढ़कर नहीं सुनाई जाती थीं, तो तुम उन्हें झुठलाया करते थे.
106. वे लोग कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हम पर हमारी बदबख़्ती ग़ालिब आ गई थी और हम गुमराह क़ौम थे.
107. ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें इससे निकाल दे. फिर अगर हम दोबारा हम ऐसा करें, तो बेशक हम ज़ालिम हैं.
108. उनसे कहा जाएगा कि अब इसी जहन्नुम में ज़िल्लत के साथ पड़े रहो और हमसे कलाम न करो.
109. बेशक हमारे बन्दों में से एक तबक़ा ऐसा भी था, जो अर्ज़ करता था कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हम ईमान ले आए हैं, तो तू हमें बख़्श दे और हम पर रहम फ़रमा. और तू बेहतरीन रहम करने वाला है. 
110. फिर तुम लोगों ने तो उन्हें मज़ाक़ बना लिया था, यहां तक कि उस मज़ाक़ ने तुम्हें हमारे ज़िक्र भी भुला दिया और तुम उनका मज़ाक़ ही उड़ाते रहे.
111. बेशक आज हमने उन्हें उनके सब्र की जज़ा दी है. बेशक वही लोग कामयाब हो गए.
112. उनसे कहा जाएगा कि तुम ज़मीन में बरसों के शुमार से कितने बरस रहे.
113. वे लोग कहेंगे कि हम एक दिन या एक दिन से भी कम ही ठहरे थे. आप शुमार करने वालों से ही दरयाफ़्त   कर लें. 
114. उनसे कहा जाएगा कि बेशक तुम ज़मीन में बहुत ही कम ठहरे. काश ! तुम जानते.
115. क्या तुमने यह गुमान कर लिया था कि हमने तुम्हें बिना मक़सद के ही पैदा किया है और यह कि तुम हमारी तरफ़ लौटाए नहीं जाओगे.
116. फिर आला तो अल्लाह ही है, जो हक़ीक़ी बादशाह है. उसके सिवा कोई माबूद नहीं. वही अर्शे अज़ीम का परवरदिगार है.
117. और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे को पुकारता है, उसके पास इस शिर्क की कोई दलील भी नहीं है, तो  उसका हिसाब उसके परवरदिगार के पास है. बेशक काफ़िर कामयाबी नहीं पाएंगे. 
118. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम अर्ज़ करो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मेरी उम्मत को बख़्श दे और रहम कर और तू बेहतरीन रहम करने वाला है.

Monday, August 30, 2021

24 सूरह अन नूर

सूरह अन नूर मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 64 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. यह एक अज़ीम सूरत है, जिसे हमने नाज़िल किया है. और हमने इसके अहकाम को फ़र्ज़ कर दिया है और हमने इसमें वाज़ेह आयतें नाज़िल की हैं, ताकि तुम ग़ौर व फ़िक्र करो.
2. बदकार औरत और बदकार मर्द की बदकारी साबित हो जाए, तो दोनों में से हर एक को सौ-सौ कोड़े मारो. और अगर तुम अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हो, तो अल्लाह का हुक्म नाफ़िज़ करने में उन पर तरस मत खाओ. और उन दोनों की सज़ा के वक़्त मोमिनों के एक तबक़े को मौजूद रहना चाहिए.
3. बदकार मर्द बदकार या मुशरिक औरत से ही निकाह करेगा और बदकार औरत भी बदकार या मुशरिक मर्द से ही निकाह करेगी. और यह बेहयाई मोमिनों पर हराम है.
4. और जो लोग पाक दामन औरतों पर तोहमत लगाएं. फिर वे चार गवाह पेश न करें, तो उन्हें अस्सी कोड़े मारो. और फिर कभी उनकी गवाही क़ुबूल न करो और ये लोग ख़ुद ही बदकार हैं.
5. लेकिन जिन लोगों ने तोहमत लगाने के बाद तौबा कर ली और अपनी इस्लाह की, तो बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
6. और जो लोग अपनी बीवियों पर तोहमत लगाते हैं और उनके पास ख़ुद के सिवा कोई गवाह नहीं होता है, तो उनकी अपनी गवाही चार गवाहों के बराबर होगी और वे लोग चार मर्तबा अल्लाह की क़सम खाकर गवाही देंगे कि बेशक वे अपने दावे में सच्चे हैं.
7. और पांचवीं मर्तबा यह कहेंगे कि उन पर अल्लाह की लानत हो. अगर वे झूठे हैं.
8. और इसी तरह यह बात उस औरत से भी सज़ा को टाल सकती है. वह चार मर्तबा अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि तोहमत लगाने वाला झूठा है.
9. और पांचवीं मर्तबा यह कहेगी कि मुझ पर अल्लाह का ग़ज़ब हो. अगर वह अपने दावे में सच्चा हो.
10. और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती, तो तोहमत लगाने वाले लोगों का बहुत ही बुरा अंजाम होता. और बेशक अल्लाह बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला बड़ा हकीम है.
11. बेशक जिन लोगों ने बोहतान बांधा था, वे भी तुम्हीं में से एक गिरोह था. तुम उसे अपने हक़ में बुरा मत समझो, बल्कि वह तुम्हारे लिए भला हो गया है. और उनमें से हर एक के लिए उतना ही गुनाह है, जितना उसने कमाया है. और उनमें से जिसने बोहतान में सबसे ज़्यादा हिस्सा लिया, उसके लिए बड़ा सख़्त अज़ाब है.
12. ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जब तुम लोगों ने उस बोहतान को सुना था, तो मोमिन मर्द और मोमिन औरतें अपनों के बारे में नेक गुमान कर लेते और कहते कि यह सरीह बोहतान है.
13. ऐसा क्यों नहीं हुआ कि वे लोग चार गवाह ले आते. फिर जब वे गवाह नहीं ला सके, तो वे लोग अल्लाह के नज़दीक बिल्कुल झूठे हैं.
14. और अगर तुम लोगों पर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती, तो जो चर्चा तुमने की थी, उसकी वजह से तुम किसी बड़े सख़्त अज़ाब में मुब्तिला हो जाते. 
15. जब तुम अपनी ज़बान से चर्चा कर रहे थे और अपने मुंह से वह बात कह रहे थे, जिसका तुम्हें ख़ुद इल्म नहीं था. और तुम उसे मामूली बात समझ रहे थे. हालांकि अल्लाह के नज़दीक वह बहुत बड़ी बात थी.
16. और ऐसा क्यों नहीं हुआ कि जब तुम लोगों ने उस बात को सुना था, तो कह देते कि हमें ऐसी बात कहने का कोई हक़ नहीं है. ऐ हमारे परवरदिगार ! तू पाक है. यह बहुत बड़ा बोहतान है.
17. अल्लाह तुम्हें नसीहत करता है कि अगर तुम मोमिन हो, तो फिर कभी ऐसी बात मत करना.
18. और अल्लाह तुम्हारे लिए आयतों को वाज़ेह तौर पर बयान करता है. और अल्लाह बड़ा साहिबे इल्म बड़ा हिकमत वाला है.
19. बेशक जो लोग यह चाहते हैं कि मोमिनों में बेहयाई फैले, तो उनके लिए दुनिया और आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब है. और अल्लाह सबकुछ जानता है और तुम नहीं जानते.
20. और अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती, तो तुम भी तबाह व बर्बाद हो जाते. और अल्लाह बड़ा शफ़क़त वाला बड़ा मेहरबान है.
21. ऐ ईमान वालो ! शैतान के नक़्शे क़दम पर चलते हुए उसकी पैरवी मत चलो. और जो शख़्स शैतान की पैरवी करता है, तो बेशक वह उसे बेहयाई और बुरी कामों का हुक्म देता है. अगर तुम पर अल्लाह का फ़ज़ल और उसकी रहमत न होती, तो तुममें से कोई भी कभी पाकबाज़ नहीं होता. लेकिन अल्लाह जिसे चाहता है, उसे पाक व पाकीज़ा बना देता है. और अल्लाह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
22. और तुममें से फ़ज़ल और दौलत वाले लोग यह क़सम न खायें कि वे रिश्तेदारों और मिस्कीनों और अल्लाह की राह में हिजरत करने वाले लोगों को कुछ नहीं देंगे. उन्हें चाहिए कि वे उनकी ख़ता मुआफ़ कर दें और उनसे दरगुज़र करें. क्या तुम यह नहीं चाहते हो कि अल्लाह तुम्हारी ख़तायें मुआफ़ करे. और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
23. बेशक जो लोग पाक दामन बेख़बर मोमिन औरतों पर तोहमत लगाते हैं, उन पर दुनिया और आख़िरत में अल्लाह की लानत है और उनके लिए बड़ा सख़्त अज़ाब है.
24. जिस दिन ख़ुद उनकी ज़बानें और उनके हाथ और पांव उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे कि वे लोग क्या करते थे.
25. उस दिन अल्लाह उन्हें उनके आमाल का पूरा-पूरा बदला देगा और वे जान लेंगे कि अल्लाह बरहक़ है और हक़ का ज़ाहिर करने वाला भी है.
26. ख़बीस औरतें ख़बीस मर्दों के लिए और ख़बीस मर्द ख़बीस औरतों के लिए मुनासिब हैं और पाक औरतें पाक मर्दों के लिए और पाक मर्द पाक औरतों के लिए मुनासिब हैं. ये पाकीज़ा लोग बुरे लोगों की तोहमतों से बरी हैं. उनके लिए मग़फ़िरत और इज़्ज़त वाला रिज़्क़ है.
27. ऐ ईमान वालो ! अपने घरों के अलावा किसी के घर में दाख़िल न होना जब तक कि उनसे इजाज़त न ले लो और उन्हें सलाम न कर लो. यह तुम्हारे लिए बेहतर है, ताकि तुम ग़ौर व फ़िक्र करो. 
28. फिर अगर तुम्हें उस घर में कोई न मिले, तो उस वक़्त तक दाख़िल न होना जब तक इजाज़त न मिल जाए. और अगर तुमसे कहा जाए कि वापस चले जाओ, तो वापस लौट जाना. यह तुम्हारे लिए पाकीज़ा बात है. और जो आमाल तुम करते हो, अल्लाह उसे ख़ूब जानता है.    
29. तुम्हारे लिए कोई हर्ज नहीं है कि तुम ऐसे मकानों में दाख़िल हो जाओ, जो ग़ैर आबाद हैं और जिनमें तुम्हारा कोई सामान रखा हुआ है. और अल्लाह उसे ख़ूब जानता है, जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम पोशीदा रखते हो.    
30. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ईमान वाले मर्दों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें. यह उनके लिए पाकीज़ा बात है. बेशक अल्लाह उन आमाल से बाख़बर है, जो वे लोग किया करते हैं.
31. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और ईमान वाली औरतों से भी कह दो कि वे भी अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी अस्मत की हिफ़ाज़त करें. और अपनी ज़ीनत का इज़हार न करें, सिवाय उसके जो ख़ुद ब ख़ुद ज़ाहिर हो जाए. और सर पर ओढ़े दुपट्टे अपने सीनों पर डाले रहा करें. अपने बनाव सिंगार को किसी पर ज़ाहिर न किया करें सिवाय अपने शौहरों के और अपने बाप दादा और अपने शौहरों के बाप दादा और अपने बेटों और अपने शौहरों के बेटों और अपने भाइयों और अपने भतीजों और अपने भांजों और मुसलमान औरतों और अपने ग़ुलामों और कनीज़ों और ग़र्ज़ न रखने वाले ख़िदमतगार मर्दों और मासूम बच्चों के. और अपने पांव ज़मीन पर इस तरह न रखें कि पांज़ेब की झंकार से सिंगार ज़ाहिर हो जाए. ऐ ईमान वालो ! और तुम सब अल्लाह की बारगाह में तौबा करो, ताकि तुम कामयाबी पाओ.       
32. और तुम अपनी क़ौम की ग़ैर शादीशुदा औरतों और अपने नेक बख़्त ग़ुलामों और कनीज़ों का निकाह करवा दिया करो. अगर वे फ़क़ीर होंगे, तो अल्लाह अपने फ़ज़ल से उन्हें ग़नी कर देगा. और अल्लाह बड़ा वुसअत वाला बड़ा साहिबे इल्म है. 
33. और जिन लोगों को निकाह का मौक़ा मयस्सर नहीं हुआ, तो उन्हें पाक दामिनी इख़्तियार करनी चाहिए, यहां तक कि अल्लाह अपने फ़ज़ल से उन्हें ग़नी कर दे. और तुम्हारे ग़ुलामों और कनीज़ों में से जो मकातिबत यानी कुछ माल कमाकर देने की शर्त पर आज़ाद होना चाहें, तो तुम उन्हें आज़ाद कर दिया करो. अगर तुम उनकी भलाई जानते हो. और तुम ख़ुद भी उन्हें उस माल में से कुछ दे दो, जो तुम्हें अल्लाह ने अता किया है. और तुम दुनियावी ज़िन्दगी का फ़ायदा हासिल करने के लिए अपनी कनीज़ों को बदकारी पर मजबूर न करो, जबकि वे पाक दामन रहना चाहती हैं. और जो उन्हें मजबूर करेगा, तो बेशक अल्लाह उनकी बेबसी के बाद उन्हें बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
34. ऐ ईमान वालो ! और बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ वाज़ेह आयतें नाज़िल की हैं और कुछ उन लोगों की मिसालें भी हैं, जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं. और यह परहेज़गारों के लिए नसीहत है.
35. अल्लाह आसमानों और ज़मीन का नूर है. उस नूर की मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमें एक रौशन चराग़ है और चराग़ एक शीशे की क़ंदील में है. और क़ंदील एक जगमगाते हुए सितारे की मानिन्द है, जिसे ज़ैतून के बाबरकत दरख़्त के तेल से रौशन किया जाए, जो न मशरिक़ की तरफ़ हो और न मग़रिब की तरफ़ हो, बल्कि बीचों बीच हो. उसका तेल ऐसा शफ़्फ़ाफ़ हो कि अगर कोई उसे छुये भी नहीं, तो ऐसा मालूम हो कि वह ख़ुद ही रौशन हो जाएगा. वह नूर पर नूर है. अल्लाह जिसे चाहता है अपने नूर तक पहुंचा देता है. और अल्लाह लोगों की हिदायत के लिए मिसालें बयान करता है. और अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है.
36. अल्लाह का यह नूर उन घरों में है, जिन्हें अल्लाह ने बुलंद करने का हुक्म दिया है, जिनमें अल्लाह का ज़िक्र किया जाता है और सुबह व शाम अल्लाह के नाम की तस्बीह की जाती है. 
37. अल्लाह के इस नूर के हामिल वे लोग हैं, जिन्हें तिजारत और ख़रीद फ़रोख़्त न अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल करती है और न नमाज़ पढ़ने से और न ज़कात अदा करने से, बल्कि वे लोग उस दिन से ख़ौफ़ रखते हैं, जिसमें  दहशत से दिल और आंखें सब उलट पलट हो जाएंगे.
38. वे लोग इसलिए इबादत करते हैं, ताकि अल्लाह उन्हें उनके आमाल की बेहतरीन जज़ा दे और अपने फ़ज़ल से उन्हें उससे भी ज़्यादा अता करे. और अल्लाह जिसे चाहता है, उसे बेहिसाब रिज़्क़ देता है.
39. और जिन लोगों ने कुफ़्र किया, उनके आमाल बंजर सहरा में सराब की मानिन्द हैं, जिसे प्यासा पानी समझता है, यहां तक कि जब वह उसके पास आता है, तो कुछ भी नहीं पाता. और इसी तरह आख़िरत में वह अल्लाह को अपने पास मौजूद पाएगा, लेकिन अल्लाह ने उसका पूरा हिसाब दुनिया में चुका दिया था. और अल्लाह बहुत जल्द हिसाब करने वाला है.
40. या काफ़िरों के आमाल उस गहरे समन्दर की तारिकियों की मानिन्द हैं, जिसे लहर ने ढक लिया हो. फिर इसके ऊपर एक और लहर हो. फिर उसके ऊपर तह दर तह बादल भी हों. ऊपर नीचे तारीकी ही तारीकी हो. अगर कोई डूबने वाला अपना हाथ बाहर निकाले, तो तारीकी की वजह से वह किसी को नज़र न आए. और जिसके लिए अल्लाह ने नूर नहीं बनाया, तो उसके लिए कहीं भी नूर नहीं है.
41. क्या तुमने नहीं देखा कि आसमानों और ज़मीन की हर शय अल्लाह ही की तस्बीह करती है. और परिन्दे भी फ़ज़ाओं में पर फैलाए हुए उसी की तस्बीह करते हैं. हर एक अपनी नमाज़ और अपनी तस्बीह का तरीक़ा जानता है. और अल्लाह उन आमाल ख़ूब वाक़िफ़ है, जो वे लोग किया करते हैं.
42. और आसमानों और ज़मीन की बादशाहत अल्लाह ही की है. और सबको अल्लाह की तरफ़ ही लौटना है.
43. क्या तुमने नहीं देखा कि अल्लाह ही बादलों को पहले आहिस्ता-आहिस्ता चलाता है. फिर उन्हें आपस में मिला देता है. फिर उन्हें तह ब तह बना देता है. फिर तुम देखते हो कि उसके दरम्यान ख़ाली जगहों से बारिश निकलकर बरसती है. और वह उसी आसमान में पहाड़ों की तरह नज़र आने वाले बादलों में से ओले बरसाता है. फिर वह जिन पर चाहता है, ओले बरसाता है. और जिसकी तरफ़ से चाहता है, उन्हें फेर देता है. ऐसा लगता है कि बादलों की बर्क़ यानी बिजली की चमक आंखों की रौशनी उचक ले जाएगी.
44. और अल्लाह ही रात और दिन को बदलता रहता है. और बेशक इसमें बसीरत वालों के लिए बड़ी इबरत है.
45. और अल्लाह ही ने हर चलने फिरने वाले जानदार की पानी से तख़लीक़ की. फिर उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो अपने पेट के बल चलते हैं. और उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो दो पांव पर चलते हैं. और उनमें से कुछ ऐसे हैं, जो चार पांवों पर चलते हैं. अल्लाह जो चाहता है, पैदा करता है. बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है.
46. यक़ीनन हमने ही वाजे़ह आयतें नाज़िल की हैं और अल्लाह जिसे चाहता है, सीधे रास्ते की हिदायत करता है.
47. और वे लोग कहते हैं कि हम अल्लाह और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए हैं और उनकी इताअत करते हैं. फिर उसके बाद उनमें से एक फ़रीक़ अल्लाह के हुक्म से मुंह फेर लेता है. और वे लोग ईमान वाले नहीं हैं.
48. और जब उन लोगों को अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ बुलाया जाता है, ताकि उनके दरम्यान फ़ैसला कर दिया जाए, तो उनमें से एक फ़रीक़ मुंह फेर लेता है.
49. और अगर वे लोग हक़ के साथ होते, तो गर्दन झुकाये रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास चले आते.
50. क्या उनके दिलों में कुफ़्र का मर्ज़ है या वह शक में मुब्तिला हैं या उन्हें ख़ौफ़ है कि अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उन पर ज़ुल्म करेंगे, बल्कि वे लोग ख़ुद ही ज़ालिम हैं.
51. ईमान वालों का क़ौल तो सिर्फ़ यही होता है कि जब उन्हें अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ बुलाया जाता है, ताकि वह उनके दरम्यान फ़ैसला कर दिया जाए, तो वे कहते हैं कि हमने हुक्म सुना और इताअत की. और वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं.
52. और जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करता है और अल्लाह से डरता है और परहेज़गारी इख़्तियार करता है, तो ऐसे ही लोग कामयाबी पाने वाले हैं. 
53. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वे लोग अल्लाह की बड़ी क़समें खाते हैं कि अगर तुम उन्हें हुक्म दो, तो वे जिहाद के लिए ज़रूर निकलेंगे. तुम कह दो कि क़समें न खाओ, बल्कि दस्तूर के मुवाफ़िक़ इताअत की दरकार है. और बेशक अल्लाह उन आमाल से बाख़बर है, जो तुम किया करते हो.
54. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह की इताअत करो और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करो. फिर तुमने इताअत से मुंह फेरा, तो जान लो कि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़िम्मे सिर्फ़ वही है, जो उन पर लाज़िम किया गया है. और तुम्हारे ज़िम्मे वह है, जो तुम पर लाज़िम किया गया है. अगर तुम उनकी इताअत करोगे, तो हिदायत हासिल करोगे. और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ अहकाम पहुंचाने तक ही है. 
55. अल्लाह ने लोगों से वादा किया है कि तुममें से जो ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, उन्हें ज़मीन में ख़िलाफ़त अता करेगा, जिस तरह उनसे पहले के लोगों ख़िलाफ़त बख़्शी थी. और उनके लिए उस दीन को ग़ालिब बनाएगा, जिसे उनके लिए पसंद किया है. और वह यक़ीनन उनके ख़ौफ़ को अमन से बदल देगा कि वे सब अल्लाह ही की इबादत करेंगे और किसी चीज़ को उसका शरीक नहीं ठहराएंगे. और इसके बाद भी कोई कुफ़्र करे, तो ऐसे ही लोग ही नाफ़रमान हैं.
56. और तुम पाबंदी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिया करो और दिल से रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करो, ताकि तुम पर रहम किया जाए.
57. और तुम यह गुमान हरगिज़ नहीं करना कि काफ़िर ज़मीन में अल्लाह को आजिज़ कर देंगे. और उनका ठिकाना दोज़ख़ है और वह बहुत बुरा ठिकाना है.
58. ऐ ईमान वालो ! तुम्हारे ग़ुलामों और कनीज़ों और नाबालिग़ लड़कों को चाहिए कि वे तीन मौक़ों पर तुम्हारे पास आने से पहले इजाज़त ले लिया करें. सुबह फ़ज्र की नमाज़ से पहले और दोपहर के वक़्त जब तुम कपड़े उतार कर आराम करते हो और रात में इशा की नमाज़ के बाद जब तुम अपनी ख़्वाबगाहों में चले जाते हो. ये तीन वक़्त तुम्हारे पर्दे के हैं. इसके बाद तुम्हारे लिए या उनके लिए कोई हर्ज नहीं है, क्योंकि बाक़ी वक़्त में वे एक दूसरे के पास आते जाते रहते हैं. इसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान करता है. और अल्लाह बड़ा साहिबे इल्म बड़ा हिकमत वाला है.
59. और जब तुम्हारे बच्चे बालिग़ हो जाएं, तो वे भी तुम्हारे पास आने के लिए उसी तरह इजाज़त लिया करें, जिस तरह उनसे पहले बालिग़ आने की इजाज़त ले लिया करते थे. इसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान करता है. और अल्लाह बड़ा साहिबे इल्म बड़ा हिकमत वाला है.
60. और वे ज़ईफ़ औरतें जिन्हें निकाह की ख़्वाहिश नहीं है, अगर वे अपने दुपट्टे सर से उतार दें, तो उसमें कोई हर्ज नहीं है, बशर्ते उनका अपना बनाव सिंगार ज़ाहिर न हो. और अगर वे इससे भी परहेज़ करें, तो उनके लिए बेहतर है. और अल्लाह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
61. अंधे पर कोई हर्ज नहीं है और न लंगड़े पर कोई हर्ज है. और न बीमार पर कोई हर्ज है और न ख़ुद तुम लोगों पर कोई हर्ज है कि अपने घरों से खाना खाओ या अपने बाप दादा के घरों से या अपनी माओं के घरों से या अपने भाइयों के घरों से या अपनी बहनों के घरों से या अपने चचाओं के घरों से या अपनी फूफियों के घरों से या अपने मामुओं के घरों से या अपनी ख़ालाओं के घरों से या उन घरों से जिनकी कुंजियां तुम्हारे हाथ में हैं या अपने दोस्तों के घरों से खाना लेने में कोई हर्ज नहीं है. तुम पर इसमें कोई हर्ज नहीं कि सब मिलकर खाओ या अलग-अलग खाओ. फिर जब तुम घरों में दाख़िल हो, तो अपने घर वालों को सलाम कहा करो. यह अल्लाह की तरफ़ से एक मुबारक पाकीज़ा दुआ है. इसी तरह अल्लाह तुम्हारे लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान करता है, ताकि तुम समझ सको.
62. ईमान वाले तो वही लोग हैं, जो अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए और जब किसी इज्तमाई काम में मसरूफ़ हों, तो उस वक़्त तक कहीं न जाएं जब तक इजाज़त न मिल जाए. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक जो लोग तुमसे हर बात में इजाज़त हासिल करते हैं, वही लोग दिल से अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखते हैं. फिर जब वे लोग किसी काम के लिए तुमसे इजाज़त मांगें, तो तुम जिसे चाहो इजाज़त दे दिया करो. और अल्लाह से उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ मांगो. बेशक अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
63. ऐ ईमान वालो ! तुम रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इस तरह मत बुलाया करो, जिस तरह तुम आपस में एक दूसरे को नाम लेकर बुलाया करते हो. अल्लाह उन लोगों को खू़ब जानता है, तुममें से जो एक दूसरे की आड़ में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास से खिसक जाते हैं. फिर जो लोग अल्लाह के हुक्म की मुख़ालिफ़त करते हैं, उन्हें इस बात से डरना चाहिए कि उन पर कोई आफ़त आन पडे़ या उन पर कोई दर्दनाक अज़ाब नाज़िल हो जाए. 
64. जान लो कि बेशक जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, सब अल्लाह ही का है. वह तुम्हारे हालात को ख़ूब जानता है. और जिस दिन लोग उसकी तरफ़ लौटाए जाएंगे, वह उन्हें उन आमाल से आगाह कर देगा, जो वे करते रहे हैं. और अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है.

Sunday, August 29, 2021

25 सूरह अल फ़ुरक़ान

सूरह अल फ़ुरक़ान मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 77 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. वह अल्लाह बड़ा ही बाबरकत है, जिसने हक़ और बातिल को समझने और फ़ैसला करने के लिए अपने महबूब बन्दे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क़ुरआन नाज़िल किया, ताकि वे तमाम आलमों के लिए अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाले पैग़म्बर बन जाएं. 
2. वह अल्लाह ही है, जिसकी आसमानों और ज़मीन पर बादशाहत है और जिसने अपने लिए न औलाद बनाई और न बादशाही में उसका कोई शरीक है. और उसने हर चीज़ की तख़लीक़ की. फिर उसे एक मुक़र्रर किए हुए मुनासिब अंदाज़े पर ठहराया.
3. और उन मुशरिकों ने अल्लाह के सिवा दूसरे सरपरस्त बना लिए हैं, जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते, बल्कि वे ख़ुद ही पैदा किए गए हैं. और वे ख़ुद अपने लिए भी न किसी नुक़सान और नफ़े का इख़्तियार रखते हैं. और न मौत और ज़िन्दगी ही उनके इख़्तियार में है. और न उन्हें किसी को दोबारा ज़िन्दा करके उठाने का ही कुछ इख़्तियार है.
4. और कुफ़्र करने वाले लोग कहने लगे कि यह क़ुरआन तो सिर्फ़ झूठ है, जिसे उन्होंने ख़ुद गढ़ लिया है और दूसरी क़ौम ने उनकी मदद की है. बेशक काफ़िर ज़ुल्म और झूठ बोलने पर उतर आए हैं. 
5. और वे लोग कहने लगे कि यह क़ुरआन तो सिर्फ़ पहले के लोगों के अफ़साने हैं, जिन्हें उन्होंने लिखवा लिया है. फिर वही अफ़साने सुबह व शाम उनके सामने पढ़े जाते हैं.
6. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि इस क़ुरआन को उस अल्लाह ने नाज़िल किया है, जो आसमानों और ज़मीन के तमाम राज़ों को ख़ूब जानता है. बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
7. और वे लोग कहने लगे कि ये कैसे रसूल हैं, जो खाना भी खाते हैं और बाज़ारों में भी चलते फिरते हैं. उनके पास कोई फ़रिश्ता नाज़िल क्यों नहीं किया गया कि वह भी उनके साथ अज़ाब से ख़बरदार करने वाला होता.
8. या उनके पास कोई ख़ज़ाना उतार दिया जाता या उनके पास कोई बाग़ ही होता, जिससे वे खाते व पीते. और ज़ालिम मोमिनों से कहते हैं कि तुम तो सिर्फ़ ऐसे शख़्स की पैरवी करते हो, जिस पर जादू कर दिया गया है.
9. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ज़रा देखो तो कि वे लोग तुम्हारे लिए कैसी मिसालें बयान करते हैं. लिहाज़ा वे लोग बहक गए हैं और अब वे हिदायत का कोई रास्ता नहीं पा सकते.
10. वह अल्लाह बड़ा बारबरकत है. अगर वह चाहे तो तुम्हारे लिए दुनिया में इससे कहीं बेहतर बाग़ बना दे, जिनके नीचे नहरें बहती हों. और तुम्हारे लिए आलीशान महल भी बना दे.
11. बल्कि उन लोगों ने क़यामत को भी झुठला दिया है. और हमने क़यामत को झुठलाने वाले लोगों के लिए दोज़ख़ की भड़कती हुई आग तैयार कर रखी है.
12. जब दोज़ख़ की आग उन्हें दूर से देखेगी, तो वे लोग उसके जोश व ख़रोश की ख़ौफ़नाक आवाज़ सुनेंगे
13. और जब उन्हें ज़ंजीरों से जकड़कर दोज़ख़ की किसी तंग जगह में डाला जाएगा, तो उस वक़्त वे लोग मौत की दुआ मांगेंगे.
14. उनसे कहा जाएगा कि आज एक मौत को नहीं, बल्कि बहुत सी मौतों की दुआ करो.
15. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि यह दोज़ख़ बेहतर है या दाइमी जन्नत, जिसका परहेज़गारों से वादा किया गया है. वे उनके आमाल की जज़ा होगी और उनकी दाइमी क़यामगाह भी होगी.
16. उनके लिए जन्नत में वे सब होगा, जो वे चाहेंगे और वे उसमें हमेशा रहेंगे. यह तुम्हारे परवरदिगार का लाज़िमी वादा है, जो क़ाबिले तलब है.
17. और जिस दिन अल्लाह उन लोगों को और उन्हें जिन्हें वे अल्लाह के सिवा पुकारते थे, सबको जमा करेगा और फ़रमाएगा कि क्या तुमने हमारे बन्दों को गुमराह किया था या वे लोग ख़ुद ही राह से भटक गए थे.
18. वे अर्ज़ करेंगे कि तेरी ज़ात पाक है. हमें यह हक़ नहीं कि तेरे सिवा किसी दूसरे को अपना सरपरस्त बनाएं. लेकिन तूने ही उन्हें और उनके बाप दादाओं को इतना दुनियावी माल व असबाब अता कर दिया, यहां तक कि वे लोग तेरे ज़िक्र को भूल गए. और वह ख़ुद ही हलाक होने वाली क़ौम थी.      
19. फिर काफ़िरों से कहा जाएगा कि लिहाज़ा तुम्हारे सरपरस्तों ने उसे झुठला दिया, जो कुछ तुम कह रहे थे. अब तुम न हमारे अज़ाब को फेरने की ताक़त रखते हो और न अपनी ही कुछ मदद कर सकते हो. और तुममें से जो भी ज़ुल्म करेगा, हम उसे बड़े सख़्त अज़ाब का ज़ायक़ा चखाएंगे.
20. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और हमने तुमसे पहले जितने भी रसूल भेजे हैं, वे सब यक़ीनन खाना खाते थे और बाज़ारों में भी चलते फिरते थे. और हमने तुम सबको एक दूसरे के लिए आज़माइश का ज़रिया बनाया है. ऐ ईमान वालो ! क्या तुम इस आज़माइश पर सब्र करोगे? और तुम्हारा परवरदिगार ख़ूब देखने वाला है.
21. और जो लोग आख़िरत में हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, वे कहते हैं कि हम पर फ़रिश्ते नाज़िल क्यों नहीं किए गए या हम अपने परवरदिगार को देख लेते. हक़ीक़त में वे लोग अपने दिलों में ख़ुद को बहुत बड़ा समझने लगे हैं और हद से बढ़कर सरकशी कर रहे हैं.
22. जिस दिन वे लोग फ़रिश्तों को देख लेंगे, तो उस दिन गुनाहगारों को कोई ख़ुशी नहीं होगी और वे कहेंगे कि काश ! कोई रोक वाली आड़ होती.
23. और हम उनके आमाल की तरफ़ मुतावज्जे होंगे. जो कुछ उन्होंने किया होगा, उसे ख़ाक का ग़ुबार बनाकर बिखेर देंगे.
24. उस दिन असहाबे जन्नत की क़यामगाह भी अच्छी होगी और ख़्वाबगाह भी उम्दा होगी. 
25. और जिस दिन आसमान फटकर बादल की तरह धुआं-धुआं हो जाएगा और फ़रिश्तों के ग़ौल के ग़ौल नाज़िल किए जाएंगे. 
26. उस दिन हक़ की बादशाहत मेहरबान अल्लाह ही की होगी और वह दिन काफ़िरों के लिए बड़ा सख़्त होगा.
27. और जिस दिन ज़ालिम अपने हाथ को काटने लगेगा और कहेगा कि काश ! रसूल के साथ मैंने भी सीधा रास्ता इख़्तियार कर लिया होता. 
28. हाय अफ़सोस ! काश मैंने फ़लां शख़्स को अपना दोस्त न बनाया होता.
29. बेशक उसने हमारे पास ज़िक्र आने के बाद मुझे बहकाया और शैतान तो इंसान को वक़्त पड़ने पर छोड़ देने वाला है.
30. और उस वक़्त रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अल्लाह की बारगाह में अर्ज़ करेंगे कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मेरी क़ौम ने इस क़ुरआन को बिल्कुल छोड़ रखा था.
31. और इसी तरह हमने हर नबी के लिए गुनाहगारों में से कुछ उनके दुश्मन क़रार दे दिए हैं और तुम्हारा परवरदिगार हिदायत करने और मदद करने के लिए काफ़ी है.
32. और कुफ़्र करने वाले लोग कहने लगे कि इन रसूल पर क़ुरआन एक ही बार नाज़िल क्यों नहीं किया गया. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हमने ऐसा इसलिए किया, ताकि तुम्हारे दिल को क़ूवत व तस्कीन बख़्शें और इसीलिए हमने इसे ठहर-ठहर कर पढ़ा है.
33. और वे काफ़िर तुम्हारे पास ऐतराज़ के सिवा कोई हक़ की मिसाल नहीं लाते. लेकिन हम तुम्हारे पास उसके जवाब में हक़ के साथ बेहतरीन और वाज़ेह बयां ले आएंगे.
34. यही वे लोग हैं, जो अपने मुंह के बल जहन्नुम की तरफ़ घसीटे जाएंगे. उनका ठिकाना बहुत बुरा है और वे सीधे रास्ते से भी बहुत ज़्यादा भटके हुए हैं.
35. और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और उनके साथ उनके भाई हारून को उनका वज़ीर बनाया.
36. फिर हमने कहा कि तुम दोनों उस क़ौम के पास जाओ, जिसने हमारी आयतों को झुठलाया है. जब वे लोग बाज़ नहीं आए, तो हमने उन्हें बुरी तरह तबाह व बर्बाद कर दिया.
37. और जब नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी हमारे रसूलों को झुठलाया, तो हमने उन्हें ग़र्क़ कर दिया और हमने उन्हें दूसरे लोगों के लिए इबरत की निशानी बना दिया. और हमने ज़ालिमों के लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है.
38. और इसी तरह हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद और सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद और कुओं वालों और उनके दरम्यान बहुत सी उम्मतों को भी तबाह व बर्बाद कर दिया.
39. और हमने उनमें से हर एक की नसीहत के लिए मिसालें बयान कीं और हमने उन सबको तबाह व बर्बाद कर दिया. 
40. और बेशक वे काफ़िर उस बस्ती की तरफ़ से गुज़रे हैं, जिस पर हमने पत्थरों की बारिश बरसाई थी. फिर क्या उन्होंने उसे नहीं देखा, बल्कि वे लोग दोबारा ज़िन्दा होकर उठने की उम्मीद नहीं रखते.
41. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और जब भी वे लोग तुम्हें देखते हैं, तो तुम्हारा मज़ाक़ उड़ाते हैं और कहते हैं कि क्या यही वे हज़रत हैं, जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है.
42. बेशक मुमकिन था कि रसूल हमें हमारे सरपरस्तों से बहका देते, अगर हम उन्हें पुकारने पर साबित क़दम न रहते. और अनक़रीब जब वे लोग अज़ाब को देख लेंगे, तो जान लेंगे कि सीधे रास्ते से कौन ज़्यादा भटका हुआ था.
43. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या तुमने उस शख़्स को देखा है, जिसने अपनी ख़्वाहिशों को अपना सरपरस्त बना रखा है. तो क्या तुम उसके वकील हो सकते हो.
44. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या तुम यह गुमान करते हो कि इन काफ़िरों में से बहुत से लोग तुम्हारी बात सुनते या समझते हैं? हरगिज़ नहीं, लेकिन वे लोग तो चौपायों की तरह हैं, बल्कि उनसे भी ज़्यादा गुमराह हैं.
45. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या तुमने अपने परवरदिगार की क़ुदरत की तरफ़ निगाह नहीं की कि वह किस तरह दोपहर तक साये को फैला देता है. और अगर वह चाहता, तो उसे एक ही जगह ठहरा देता. फिर हमने सूरज को उसकी दलील बना दिया.
46. फिर हम आहिस्ता-आहिस्ता उस साये को अपनी तरफ़ खींचकर समेट लेते हैं. 
47. और वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हारे लिए रात को पर्दा और नींद को राहत और दिन को उठने का वक़्त बनाया, ताकि तुम काम कर सको.
48. और वह अल्लाह ही है, जिसने अपनी रहमत की बारिश से पहले हवाओं को ख़ुशख़बरी बनाकर भेजा है. और हम ही आसमान से पाक पानी बरसाते हैं.
49. ताकि हम उसके ज़रिये मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा यानी बंजर ज़मीन को शादाब करें और अपनी मख़लूक़ात में से चौपायों और इंसानों को उससे सेराब करें.
50. और बेशक हमने पानी को उनके दरम्यान इस तरह फेरा यानी तक़सीम किया, ताकि लोग ग़ौर व फ़िक्र करें. फिर बहुत से लोगों ने नाशुक्री की और हर बात से कुफ़्र किया.
51. और अगर हम चाहते, तो हर बस्ती में अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर भेज देते.
52. ऐ ईमान वालो ! फिर तुम काफ़िरों का कहना मत मानो और क़ुरआन के अहकाम के ज़रिये उनसे बड़ा जिहाद करो.
53. और वह अल्लाह ही है, जिसने दो समन्दरों को आपस में मिला दिया. एक समन्दर का पानी ख़ुशगवार व मीठा है और दूसरे का पानी खारा व कड़वा है. और दोनों के दरम्यान हदे फ़सील और एक मज़बूत ओट बना दी है.
54. और वह अल्लाह ही है, जिसने पानी से बशर को पैदा किया. फिर उसे ख़ानदान और ससुराल वाला बनाया. और तुम्हारा परवरदिगार हर चीज़ पर क़ादिर है.
55. और काफ़िर अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ों को पुकारते हैं, जो न उन्हें नफ़ा पहुंचा सकती हैं और न उन्हें नुक़सान ही पहुंचा सकती हैं. और काफ़िर तो अपने परवरदिगार की नाफ़रमानी पर हमेशा शैतान का मददगार होता है.
56. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और हमने तुम्हें सिर्फ़ ख़ुशख़बरी देने वाला और अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर बनाकर भेजा है.
57. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मैं इस तुमसे कोई अज्र नहीं मांगता. लेकिन जो चाहे अपने परवरदिगार तक पहुंचने का रास्ता इख़्तियार करे.
58. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उस अल्लाह पर भरोसा करो, जो हमेशा ज़िन्दा रहने वाला है और उसे कभी मौत नहीं आएगी. और उसकी हम्दो सना की तस्बीह करते रहो और वह अपने बन्दों के गुनाहों की ख़बर रखने के लिए काफ़ी है.
59. वह अल्लाह ही है, जिसने आसमानों और ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरम्यान है, सबकी छह दिन में तख़लीक़ की. फिर वह अर्श पर जलवा फ़रोश हुआ. और वह बड़ा मेहरबान है. तुम उसके बारे में किसी ख़बीर  से दरयाफ़्त करो.
60. और जब उन काफ़िरों से कहा जाता है कि रहमान को सजदा करो, तो वे कहते हैं कि रहमान क्या है? क्या हम उसे सजदा करने लगें, जिसका तुम हमें हुक्म दे रहे हो. और इस तरह उनकी नफ़रत में मज़ीद इज़ाफ़ा हो जाता है. 
61. वह अल्लाह बड़ा ही बाबरकत है, जिसने आसमान में बुर्ज बनाए और उनमें सूरज को रौशन चराग़ और चांद को पुरनूर बनाया.
62. और वह अल्लाह ही है, जिसने रात और दिन को एक दूसरे के पीछे आने वाला बनाया. यह उनके ग़ौर व फ़िक्र करने के लिए है, जो शुक्रगुज़ारी का इरादा करें.
63. और मेहरबान अल्लाह के मुख़लिस बन्दे वे हैं, जो ज़मीन पर आहिस्ता से चलते हैं और जब जाहिल उनसे जिहालत की बात करते हैं, तो वे कहते हैं कि तुम पर सलाम हो.
64. और यही वे लोग हैं, जो अपने परवरदिगार की बारगाह में सजदे और क़याम करते हुए रातें बसर करते हैं.
65. और यही वे लोग हैं, जो अर्ज़ करते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तू हम से जहन्नुम का अज़ाब हटा दे. बेशक इसका अज़ाब बहुत सख़्त व चिमटने वाला है.
66. बेशक वह बहुत बुरा ठिकाना और बुरी जगह है.
67. और यही वे लोग हैं कि जब ख़र्च करते हैं तो न फ़िज़ूल ख़र्ची करते हैं और न कंजूसी करते हैं. और उनका ख़र्च उसके दरम्यान औसत दर्जे का रहता है.
68. और यही वे लोग हैं, जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे को नहीं पुकारते. और किसी ऐसे जानदार को क़त्ल नहीं करते, जिसे नाहक़ मारना अल्लाह ने हराम क़रार दिया है. और बदकारी नहीं करते हैं. और जो ऐसा करेगा, वह ख़ुद अपने गुनाह की सज़ा भुगतेगा.
69. क़यामत के दिन उसके लिए अज़ाब दोगुना कर दिया जाएगा और वह ज़लील व ख़्वार होकर उसमें हमेशा रहेगा.
70. सिवाय उसके, जो तौबा कर ले और ईमान ले आए और नेक अमल करता रहे, तो अल्लाह उसकी बुराइयों को अच्छाइयों में बदल देगा. और अल्लाह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
71. और जिसने तौबा कर ली और नेक अमल किए, तो बेशक उसने अल्लाह की तरफ़ सच्चे दिल से रुजू किया.
72. और यही वे लोग हैं, जो झूठी गवाही नहीं देते. और जब वे लोग किसी बेहूदा कामों के पास से गुज़रते हैं, तो बुज़ुर्गाना अंदाज़ से गुज़र जाते हैं.
73. और यही वे लोग हैं कि जब उन्हें उनके परवरदिगार की आयतें के ज़रिये नसीहत की जाती है, तो वे बहरों और अंधों की तरह नहीं गिर पड़ते, बल्कि ग़ौर व फ़िक्र करते हैं.
74. और यही वे लोग हैं, जो अर्ज़ करते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें हमारी बीवियों और औलादों की तरफ़ से आंखों की ठंडक अता कर और हमें परहेज़गारों का इमाम बना.
75. उन लोगों को उनके सब्र के बदले जन्नत में बालाख़ाने अता किए जाएंगे और वहां फ़रिश्ते उनसे दुआ सलाम करेंगे.
76. वे लोग जन्नत में हमेशा रहेंगे और वह बेहतरीन और पुरसुकून जगह है.
77. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार को तुम्हारी कोई परवाह नहीं है. अगर तुम उसकी इबादत नहीं करते. फिर तुमने उसे झुठलाया, तो अनक़रीब उसका अज़ाब भी तुम पर लाज़िम है.

Saturday, August 28, 2021

26 सूरह अश शुअरा

सूरह अश शुअरा मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 287 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ता सीन मीम.
2. ये वाज़ेह किताब की आयतें हैं.
3. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! शायद तुम इस ग़म में ख़ुद को हलाक कर लोगे कि वे लोग ईमान क्यों नहीं लाते.
4. अगर हम चाहें, तो उन लोगों पर आसमान से कोई ऐसी निशानी नाज़िल कर दें कि फिर उनकी गर्दनें उसके सामने झुक जाएं. 
5. और जब उनके पास मेहरबान अल्लाह की तरफ़ से कोई ज़िक्र आता है, तो वे लोग उससे मुंह फेर लेते हैं.
6. फिर बेशक उन्होंने हक़ को झुठला दिया. फिर अनक़रीब ही वे लोग उसकी हक़ीक़त जान लेंगे, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे.
7. क्या उन लोगों ने ज़मीन की तरफ़ नहीं देखा कि हमने उसमें हर क़िस्म की कितनी ही उम्दा चीजे़ं उगाई हैं. 
8. बेशक इसमें अल्लाह की क़ुदरत बड़ी निशानी है, लेकिन उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं.
9. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
10. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उस वक़्त को याद करो कि जब तुम्हारे परवरदिगार ने मूसा अलैहिस्सलाम को आवाज़ दी कि तुम ज़ालिमों की क़ौम के पास जाओ. 
11. यह क़ौमे फ़िरऔन है. क्या वे लोग अल्लाह के अज़ाब से नहीं डरते.
12. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मुझे ख़ौफ़ है कि वे लोग मुझे झुठला देंगे.
13. और ऐसे में मेरा दम घुटने लगता है और मेरी ज़बान में भी रवानगी नहीं है. इसलिए हारून के पास पैग़ाम भेज दे कि वह मेरा साथ दे.
14. और उनका मुझ पर एक शख़्स को क़त्ल करने का इल्ज़ाम भी है. इसलिए मुझे ख़ौफ़ है कि वे मुझे क़त्ल कर देंगे. 
15. उनसे कहा गया कि फिर तुम दोनों हमारी निशानियां लेकर जाओ. बेशक हम तुम्हारे साथ सब सुन रहे हैं. 
16. फिर तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और उससे कहो कि हम तमाम आलमों के परवरदिगार के भेजे हुए रसूल हैं. 
17. कि तू बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे. 
18. फ़िरऔन ने कहा कि क्या हमने बचपन में तुम्हारी परवरिश नहीं की थी और क्या तुमने अपनी उम्र के कई बरस हमारे साथ नहीं गुज़ारे. 
19. और तुमने अपना वह काम कर दिया, ख़ैर जो तुमने किया. और तुम नाशुक्रे लोगों में से हो.
20. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैंने उस वक़्त वह काम किया था, जब मैं राह से अनजान था. 
21. फिर जब मैं तुमसे ख़ौफ़ज़दा हुआ, तो तुम्हारी पहुंच से निकल गया. फिर मेरे परवरदिगार ने मुझे नबुवत  अता की और मुझे भी रसूलों में शामिल कर लिया. 
22. और यह भी कोई नेअमत है, जिसका तुम मुझ पर अहसान जता रहे हो कि तुमने मेरी पूरी क़ौम बनी इस्राईल को ग़ुलाम बना रखा है.
23. फ़िरऔन ने कहा कि तमाम आलमों का परवरदिगार क्या शय है.
24. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि आसमानों और ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरम्यिान है, वह सबका परवरदिगार है. अगर तुम यक़ीन करने वाले हो. 
25. फ़िरऔन ने अपने इर्द गिर्द बैठे लोगों से कहा कि क्या तुम सुन नहीं रहे हो.
26. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि वही अल्लाह है, जो तुम्हारा परवरदिगार और तुम्हारे बाप दादाओं का भी परवरदिगार है.
27. फ़िरऔन ने कहा कि ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारा ये रसूल, जो तुम्हारे पास भेजा गया है ज़रूर दीवाना है.
28. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मग़रिब और मशरिक़ और जो कुछ इनके दरम्यान है, वह सबका परवरदिगार है. अगर तुम समझते हो.
29. फ़िरऔन ने कहा कि अगर तुमने मेरे सिवा किसी और को अपना सरपरस्त माबूद बनाया, तो मैं ज़रूर तुम्हें गिरफ़्तार करके क़ैदियों में शामिल करूंगा.
30. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगरचे मैं तुम्हारे सामने कोई वाजे़ह चीज़ बतौर मौजिज़ा भी ले आऊं. 
31. फ़िरऔन ने कहा कि तुम उसे पेश करो. अगर तुम सच्चे हो.
32. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया. फिर वह अचानक एक सरीह अज़दहा बन गया.
33. और जब मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना हाथ गिरेबान में डालकर बाहर निकाला, तो वह देखने वालों के लिए चमकदार सफ़ेद हो गया.
34. फ़िरऔन ने अपने इर्द गिर्द बैठे दरबारियों से कहा कि बेशक ये बड़ा जादूगर है.
35. यह चाहता है कि अपने जादू के ज़ोर से तुम्हें तुम्हारी सरज़मीन मिस्र से बाहर निकाल दे. फिर इसके बारे में तुम लोग क्या मशवरा देते हो.
36. दरबारियों ने कहा कि अभी इन्हें और इनके भाई हारून अलैहिस्सलाम को कुछ वक़्त की मोहलत दो और तमाम शहरों में जादूगरों को बुलाने के लिए हरकारे भेजो.
37. वे हरकारे तमाम बड़े माहिर जादूगरों को तुम्हारे पास लेकर आएं.
38. फिर एक दिन मुक़र्रर वक़्त पर सब जादूगर जमा किए गए.
39. और लोगों में मुनादी करा दी गई कि तुम सबको इस मौक़े पर जमा होना है.
40. ताकि हम जादूगरों की पैरवी करें, अगर वे मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम पर ग़ालिब आ गए.
41. फिर जब सब जादूगर आ गए, तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा कि अगर हम ग़ालिब आ गए, तो हमें क्या कोई उजरत मिलेगी.
42. फ़िरऔन ने कहा कि हां, बेशक तुम उसी वक़्त मेरे मुक़र्रिबों में शामिल हो जाओगे.
43. मूसा अलैहिस्सलाम ने जादूगरों से कहा कि तुम जो कुछ फेंकना चाहते हो, फेंक दो.
44. फिर जादूगरों ने अपनी रस्सियां और अपने असा ज़मीन पर डाल दिए और कहने लगे कि फ़िरऔन की इज़्ज़त की क़सम ! बेशक हम ही ग़ालिब रहेंगे.
45. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया, तो वह फ़ौरन अज़दहा बनकर उन चीज़ों को निगलने लगा, जिसे जादूगरों ने बनाया था.
46. यह नज़ारा देखते ही सब जादूगर मूसा अलैहिस्सलाम के सामने सजदे में गिर पडे़.
47. और कहने लगे कि हम तमाम आलमों के परवरदिगार पर ईमान ले आए.
48. जो मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम का परवरदिगार है.
49. फ़िरऔन ने कहा कि तुम इन पर ईमान ले आए इससे पहले कि मैं तुम्हें इजाज़त देता. बेशक ये मूसा अलैहिस्सलाम ही तुम्हारे सबसे बड़े उस्ताद हैं, जिन्होंने तुम्हें जादू सिखाया है. तुम जल्द ही अपना अंजाम जान लोगे. मैं ज़रूर तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और तुम्हारे दूसरी तरफ़ के पांव कटवा दूंगा और तुम सबको सूली पर चढ़वा दूंगा.
50. जादूगरों ने कहा कि कोई हर्ज नहीं है. बेशक हमें अपने परवरदिगार की तरफ़ ही लौटना है.
51. बेशक हमें उम्मीद है कि हमारा परवरदिगार हमारी ख़तायें बख़्श देगा. इसलिए कि अब हम ही सबसे पहले ईमान लाए हैं.
52. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि तुम मेरे बन्दों को लेकर रातों रात यहां से निकल जाओ. बेशक तुम्हारा पीछा किया जाएगा.
53. तब फ़िरऔन ने लश्कर जमा करने के लिए मुख़्तलिफ़ शहरों में हरकारे रवाना कर दिए.
54. फ़िरऔन ने कहा कि बेशक मूसा अलैहिस्सलाम के साथ ये बनी इसराइल थोड़ी सी जमात है.
55. और बेशक वे लोग मुझे सख़्त ग़ुस्सा दिला रहे हैं.
56. और बेशक हम बड़ी व मुस्तैद जमात हैं.
57. फिर हमने उन्हें मिस्र के बाग़ों और चश्मों से निकालकर बाहर कर दिया.
58. और ख़ज़ानों और उम्दा क़यामगाहों से भी निकाल दिया.  
59. हमने ऐसा ही किया और बनी इस्राईल को उस सरज़मीन का वारिस बना दिया. 
60. फिर सूरज निकलते ही फ़िरऔन के लोगों ने उनका पीछा किया.
61. फिर जब दोनों जमातें इतनी क़रीब हुईं कि एक दूसरे को देखने लगीं, तो मूसा अलैहिस्सलाम के साथी कहने लगे कि बेशक अब हम पकड़े जाएंगे. 
62. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि हरगिज़ नहीं. बेशक मेरा परवरदिगार मेरे साथ है. वह मुझे राह दिखा देगा.
63. फिर हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि अपना असा दरिया पर मारो. फिर दरिया बीच में से फट गया. और हर हिस्सा एक बड़े पहाड़ की तरह नज़र आने लगा.
64. और हमने दूसरों यानी फ़िरऔन के साथियों को उस जगह के क़रीब कर दिया.
65. और हमने मूसा अलैहिस्लाम और उनके साथियों को निजात दी.
66. फिर हमने दूसरों यानी फ़िरऔन और उसके साथियों को ग़र्क़ कर दिया.
67. बेशक इसमें अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
68. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
69. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उन लोगों से इब्राहीम अलैहिस्सलाम का क़िस्सा बयान करो. 
70. जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मुंह बोले वालिद यानी अपनी परवरिश करने वाले अपने चाचा आज़र और अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग किसे पुकारते हो.
71.  वे लोग कहने लगे कि हम बुतों को पुकारते हैं और उन्हीं के लिए जमे रहने वाले हैं.
72. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या वे बुत तुम्हें सुनते हैं, जब तुम उन्हें पुकारते हो. 
73. या वे तम्हें कुछ नफ़ा पहुंचाते हैं या नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
74. वे लोग कहने लगे कि मालूम नहीं, बल्कि हमने अपने बाप दादाओं को ऐसा ही करते हुए पाया है.
75. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या तुमने कभी उन्हें देखा है, जिन्हें तुम पुकारते हो. 
76. या तुम और तुम्हारे पिछले बाप दादाओं ने देखा है. 
77. फिर बेशक सब बुत मेरे दुश्मन हैं, सिवाय तमाम आलमों के परवरदिगार के, जो मेरा माबूद है. 
78. उसी अल्लाह ने मुझे पैदा किया और वही मुझे हिदायत देता है.
79. और अल्लाह ही मुझे खाना खिलाता है और पानी पिलाता है.
80. और जब मैं बीमार होता हूं, तो अल्लाह ही मुझे शिफ़ा देता है.
81. और वह अल्लाह ही है, जो मुझे मौत देगा. फिर उसके बाद मुझे दोबारा ज़िन्दगी बख़्शेगा.
82. और वह अल्लाह ही है, जिससे मैं उम्मीद रखता हूं कि वह जज़ा के दिन मेरी ख़ताओं को बख़्श देगा.
83. ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे इल्म और हिकमत अता फ़रमा और मुझे स्वालिहीन में शामिल कर दे.
84. और बाद में आने वाली नस्लों में मेरा ज़िक्रे ख़ैर क़ायम रख. 
85. और मुझे भी नेअमतों वाली जन्नत के वारिसों में से बना दे.
86. और मेरी परवरिश करने वाले मेरे चाचा आज़र को बख़्श दे. बेशक वह गुमराहों में से है.
87. और मुझे उस दिन रुसवा न करना, जिस दिन लोग क़ब्रों से उठाए जाएंगे.
88. जिस दिन न माल ही कुछ नफ़ा देगा और न औलाद ही कुछ काम आएगी.
89. लेकिन जो पाक दिल लेकर अल्लाह की बारगाह में आएगा, वही फ़ायदे में रहेगा.
90. और उस दिन जन्नत परहेज़गारों के क़रीब कर दी जाएगी.
91. और जहन्नुम गुमराहों के सामने ज़ाहिर कर दी जाएगी.
92. और जहन्नुम वालों से कहा जाएगा कि वे कहां हैं, जिन्हें तुम पुकारते थे.
93. अल्लाह के सिवा. क्या वे तुम्हारी कुछ मदद कर सकते हैं या वे ख़ुद अपनी मदद कर सकते हैं.
94. फिर वे सरपरस्त और गुमराह लोग दोज़ख़ में औंधे मुंह डाल दिए जाएंगे.
95. और इबलीस के सारे लश्कर भी दोज़ख़ में डाले जाएंगे.
96. और वे सब लोग दोज़ख़ में आपस में झगड़ते हुए अपने सरपस्तों से कहेंगे. 
97. अल्लाह की क़सम ! बेशक हम सरीह गुमराही में मुब्तिला थे.
98. जब हम तुम्हें तमाम आलमों के परवरदिगार के बराबर ठहराते थे.
99. और हमें उन गुनाहगारों के सिवा किसी ने गुमराह किया नहीं किया. 
100. तो अब हमारी शफ़ाअत करने वाला कोई नहीं है.
101. और न कोई गर्म जोश दोस्त है.
102. फिर काश ! हमें दुनिया में दोबारा लौटने का मौक़ा मिल जाता, तो हम भी मोमिन हो जाते. 
103. बेशक इब्राहीम अलैहिस्सलाम के इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
104. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
105. नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था.
106. जब उनके क़ौमी भाई नूह अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते. 
107. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
108. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
109. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
110. लिहाज़ा तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो. 
111. वे लोग कहने लगे कि क्या हम तुम पर ईमान ले आएं, जबकि तुम्हारी पैरवी पस्त तबक़े के लोग ही कर रहे हैं. 
112. नूह अलैहिस्सलाम ने कहा कि मुझे इसका इल्म नहीं की कि वे लोग पहले क्या करते थे. 
113. उन लोगों का हिसाब तो मेरे परवरदिगार के ज़िम्मे है. काश ! तुम्हें इसका शऊर होता.
114. और मैं मोमिनों को ख़ुद से दूर नहीं करूंगा. 
115. मैं तो सिर्फ़ वाज़ेह तौर पर अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर हूं.
116. वे लोग कहने लगे कि ऐ नूह अलैहिस्सलाम ! अगर तुम बाज़ नहीं आए, तो ज़रूर संगसार कर दिए जाओगे.
117. नूह अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मेरी क़ौम ने मुझे झुठला दिया है.
118. फिर तू मेरे और उनके दरम्यान फ़ैसला कर दे और मुझे और मेरे मोमिन साथियों को निजात दे दे. 
119. फिर हमने कश्ती में सवार नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथियों को निजात दी.
120. फिर उसके बाद हमने बाक़ी लोगों को ग़र्क़ कर दिया.
121. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
122. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
123. हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद ने भी रसूलों को झुठलाया था.
124. जब उनके क़ौमी भाई हूद अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
125. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
126. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
127. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है.
128. क्या तुम ऊंची जगह पर फ़ज़ूल में बुलंद निशानियां यानी यादगारें तामीर करते हो.
129. और तुम बड़े शानदार महल तामीर करते हो, गोया तुम हमेशा यहीं रहोगे.
130. और जब तुम किसी को गिरफ़्त में लेते हो, तो गिरफ़्तार करते वक़्त जबर बन जाते हो. 
131. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
132. और उस अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हारी उन चीज़ों से मदद की, जिन्हें तुम ख़ूब जानते हो.
133. उसने तुम्हारी चौपायों और औलाद से मदद की.
134. और बाग़ों और चश्मों से भी मदद की. 
135. बेशक मैं तुम्हारे लिए एक बड़े सख़्त दिन के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हूं.
136. वे लोग कहने लगे कि हमारे हक़ में सब बराबर है, अगरचे तुम नसीहत करो या नसीहत करने वालों में से न हो.
137. यह डराना-धमकाना, तो बस पहले के लोगों की आदत है.
138. और हम पर कोई अज़ाब नहीं किया जाएगा.
139. फिर उन लोगों ने हूद अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो हमने भी उन्हें हलाक कर दिया. बेशक इस क़िस्से में बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे. 
140. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
141. सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद ने भी रसूलों को झुठलाया था.
142. जब उनके क़ौमी भाई सालेह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
143. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
144. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
145. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है.
146. क्या तुम यहां की नेअमतों में अमन व इत्मीनान से छोड़ दिए जाओगे.
147. बाग़ों और चश्मों में. 
148. और खेतियों और खजूरों में, जिनके ख़ोशे नर्म व नाज़ुक होते हैं.
149. और तुम ख़ुशी-ख़ुशी पहाड़ों को तराशकर घर बनाते हो.
150. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
151. और हद से तजावुज़ करने वाले लोगों का कहना मत मानो.
152. जो लोग ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं और इस्लाह नहीं करते.
153. वे लोग कहने लगे कि तुम उन लोगों में से हो, जिन पर जादू कर दिया गया है.
154. तुम तो सिर्फ़ हमारे ही जैसे बशर हो. फिर तुम कोई निशानी ले आओ. अगर तुम सच्चे हो. 
155. सालेह अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह ऊंटनी है. एक दिन पानी पीने की इसकी बारी है और एक दिन तुम्हारे लिए मुक़र्रर है. 
156. और बुराई के इरादे से इसे हाथ मत लगाना, वरना एक बड़े सख़्त दिन का अज़ाब तुम्हें अपनी गिरफ़्त में ले लेगा.
157. फिर उन लोगों ने उस ऊंटनी की कूंचें काट दीं. फिर वे ख़ुद पर नादिम हुए.
158. फिर उन्हें अज़ाब ने गिरफ़्त में ले लिया. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
159. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
160. लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था. 
161. जब उनके क़ौमी भाई लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
162. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं. 
163. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
164. और मै तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
165. क्या तुम लोग तमाम आलम वालों में से सिर्फ़ मर्दों ही के पास अपनी शहवत पूरी करने के लिए जाते हो.
166. और अपनी बीवियों को छोड़ देते हो, जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे लिए पैदा की हैं, बल्कि तुम हद से गुज़र जाने वाली क़ौम हो.
167. उन लोगों ने कहा कि ऐ लूत अलैहिस्सलाम ! अगर तुम बाज़ नहीं आए, तो तुम ज़रूर शहर बदर कर किए जाने वालों में से हो जाओगे.
168. लूत अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक मैं तुम्हारी हरकतों से बेज़ार हूं.
169. उन्होंने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मुझे और मेरे घरवालों को उससे निजात दे, जो कुछ वे लोग कर रहे हैं. 
170. फिर हमने लूत अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों को निजात दी.
171. सिवाय उनकी ज़ईफ़ बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में थी.
172. फिर हमने उन लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया.
173. और हमने उन लोगों पर पत्थरों की बारिश की. फिर वह उन लोगों पर बहुत बुरी बारिश थी, जिन्हें ख़बरदार किया गया था. 
174. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान वाले नहीं थे.
175. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
176. जंगल में रहने वालों यानी शुएब अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था.
177. जब शुऐब अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते.
178. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
179. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
180. मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
181. और तुम नाप तौल में पैमाना पूरा भरा करो और लोगों को नुक़सान पहुंचाने वाले न बनो.
182. और वज़न को सही तराज़ू से ठीक से तौलो.
183. और लोगों को उनकी चीज़ें कम करके न दिया करो और ज़मीन में फ़साद अंगेज़ी करते न फिरो.
184. और उस अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और तुमसे पहले की उम्मतों को पैदा किया है.
185. वे लोग कहने लगे कि तुम उन लोगों में से हो, जिन पर जादू कर दिया गया है.
186. तुम तो सिर्फ़ हमारे ही जैसे बशर हो और हम गुमान करते हैं कि तुम झूठे लोगों में से हो. 
187. फिर तुम हमारे ऊपर आसमान का एक टुकड़ा नाज़िल कर दो. अगर तुम सच्चे हो.
188. और शुएब अलैहिस्सलाम ने कहा कि मेरा परवरदिगार उन आमाल से ख़ूब वाक़िफ़ है, जो तुम किया करते हो.
189. फिर उन लोगों ने शुएब अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो उन्हें सायेबान यानी बादलों वाले दिन के अज़ाब ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. बेशक वे बड़े सख़्त दिन का अज़ाब था.
190. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
191. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
192. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और बेशक यह क़़ुरआन तमाम आलमों के परवरदिगार ने नाज़िल किया है.
193. जिसे रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम लेकर आए हैं. 
194. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! यह क़ुरआन तुम्हारे क़ल्बे अनवार पर नाज़िल हुआ है, ताकि तुम लोगों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो. 
195. यह वाज़ेह अरबी ज़बान में नाज़िल हुआ है.
196. और बेशक इसका ज़िक्र ज़बूर और पहले की दीगर आसमानी किताबों व सहीफ़ों में भी किया गया है.
197. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या उनके लिए क़ुरआन की सदाक़त और तुम्हारी नबुवत की यह निशानी काफ़ी नहीं है कि इसे बनी इस्राईल के उलेमा भी जानते हैं.
198. और अगर हम इस क़़ुरआन को ग़ैर अरबी लोगों में से किसी पर नाज़िल कर देते.
199. और वह इसे उन लोगों के सामने पढ़ता, तब भी ये लोग उस पर ईमान लाने वाले नहीं थे.
200. इस तरह हमने इस इनकार को गुनाहगारों के दिलों में दाख़िल कर दिया.
201. वे लोग ईमान नहीं लाने वाले नहीं हैं, जब तक कि दर्दनाक अज़ाब को न देख लें.
202. फिर वह अज़ाब अचानक उन पर नाज़िल हो जाएगा और उन्हें इसका शऊर भी नहीं होगा.
203. फिर वे लोग कहेंगे कि क्या हमें कुछ मोहलत मिल सकती है.
204. तो क्या वे लोग हमारे अज़ाब को जल्दी तलब कर रहे हैं.
205. तो क्या तुमने देखा किया कि अगर हम उन्हें बरसों फ़ायदा पहुंचाते रहें.
206. फिर उनके पास वह अज़ाब आ जाए, जिनका उनसे वादा किया जा रहा है. 
207. तो क्या वे चीज़ें उनके कुछ काम आएंगी, जिनसे वे लोग फ़ायदा उठा रहे थे. 
208. और हमने किसी बस्ती को उस वक़्त तक हलाक नहीं किया, जब तक उसके बाशिन्दों के पास ख़बरदार करने वाला कोई पैग़म्बर नहीं भेजा.
209. और यह भी नसीहत के लिए किया और हम ज़ुल्म करने वाले हैं.
210. और शैतान इस क़़ुरआन को लेकर नाज़िल नहीं हुए. 
211. और न यह उनके लिए मुनासिब था और वे इसकी ताक़त रखते थे.
212. बेशक शैतान इस कलाम को सुनने से महरूम कर दिए गए.
213. ऐ मेरे बन्दो ! फिर तुम अल्लाह के साथ किसी दूसरे सरपरस्त को मत पुकारना, वरना तुम भी अज़ाब में मुब्तिला लोगों में से हो जाओगे.
214. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम अपने क़रीबी रिश्तेदारों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो. 
215. और तुम अपने शफ़क़त के बाज़ू उन मोमिनों के लिए बिछा दो, जो लोग तुम्हारी पैरवी करते हैं.   
216. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर अगर वे लोग तुम्हारी नाफ़रमानी करें, तो तुम उनसे कह दो कि बेशक मैं उससे बेज़ार हूं, जो कुछ तुम करते हो. 
217. और तुम ग़ालिब व मेहरबान अल्लाह पर भरोसा करो. 
218. वह अल्लाह तुम्हें देखता है, जब तुम तहज्जुद की नमाज़ के लिए खड़े होते हो.
219. और अल्लाह सजदे के दरम्यान तुम्हारा उठना बैठना भी देखता है. 
220. बेशक वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
221. क्या हम तुम्हें बताएं कि शैतान किस पर उतरते हैं.
222. वे झूठे और गुनाहगार लोगों पर उतरते  हैं.
223. जो सुनी सुनाई बातें उनके कानों में डाल देते हैं और उनमें से बहुत से झूठे होते हैं.
224. और शायरों की पैरवी बहके हुए लोग ही किया करते हैं. 
225. क्या तुमने नहीं देखा कि शायर ख़्यालों की वादियों में भटकते फिरते हैं. 
226. और शायर ऐसी बातें कहते हैं, जो वे ख़ुद नहीं करते नहीं.
227. सिवाय उन शायरों के, जो ईमान लाए और नेक अमल करते रहे और कसरत से अल्लाह का ज़िक्र करते रहे. और जब उन पर ज़ुल्म हुआ, तो सिर्फ़ ज़बान से ही बदला लिया. और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया, तो वे अनक़रीब ही जान लेंगे कि वे किस जगह लौटाए जाएंगे. 

Friday, August 27, 2021

27 सूरह अन नम्ल

सूरह अन नम्ल मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 93 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ता सीन. ये क़ुरआन और रौशन किताब की आयतें हैं.
2. जो उन ईमान वालों के लिए सरापा हिदायत और ख़ुशख़बरी है.
3. जो लोग पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं और ज़कात देते हैं. और यही वे लोग हैं, जो आख़िरत पर भी यक़ीन रखते हैं.
4. बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, हमने उनके बुरे आमाल उनकी नज़र में आरास्ता कर दिए हैं. फिर वे लोग भटकते फिरते हैं.
5. यही वे लोग हैं जिनके लिए बड़ा अज़ाब है और यही लोग आख़िरत में सबसे ज़्यादा नुक़सान उठाने वाले हैं.
6. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और बेशक तुम्हें यह क़ुरआन बडे़ हकीम और बड़े इल्म वाले अल्लाह की बारगाह से अता किया जा रहा है.
7. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! वह वाक़िया याद करो कि जब मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी बीवी से कहा कि मैंने आग देखी है. अनक़रीब मैं वहां से कोई ख़बर या एक सुलगता हुआ अंगारा ले आऊंगा, ताकि तुम कुछ गर्मी महसूस कर सको.
8. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम उस आग के पास पहुंचे, तो उन्हें आवाज़ आई कि बाबरकत है वह, जो आग में नुमाया है और वह भी, जो इसके क़रीब है और अल्लाह की ज़ात पाक है, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है.
9. ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! बेशक मैं ही अल्लाह हूं, जो ग़ालिब और हिकमत वाला है.
10. ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! और अपना असा ज़मीन पर डाल दो. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे देखा कि वह अज़दहे की तरह लहरा रहा है, तो वे पीठ फेरकर तेज़ी से चल दिए और पीछे मुड़कर भी नहीं देखा. हमने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! ख़ौफ़ज़दा न हो. हमारी बारगाह में रसूल ख़ौफ़ज़दा नहीं होते.
11. लेकिन जिसने ज़ुल्म किया. फिर उसने बुराई के बाद उसे अच्छाई से बदल दिया, तो बेशक हम बड़े बख़्शने वाले बड़े मेहरबान हैं. 
12. और अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो, तो वह बग़ैर किसी ऐब के सफ़ेद होकर निकलेगा. ये अल्लाह की निशानियों में से हैं. इन्हें लेकर तुम फ़िरऔन और उसकी क़ौम के पास जाओ. बेशक वह नाफ़रमान क़ौम है.
13. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम उनके पास हमारी वाज़ेह निशानियां लेकर आए, तो वे लोग कहने लगे कि यह सरीह जादू है.
14. और उन्होंने तकब्बुर की वजह से इनकार कर दिया. और उनके दिल इन निशानियों पर यक़ीन कर चुके थे. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! देखो कि मुफ़सिदों का क्या अंजाम हुआ. 
15. और बेशक हमने दाऊद अलैहिस्सलाम और सुलेमान अलैहिस्सलाम को इल्म अता किया. और दोनों ने ख़ुश होकर कहा कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जिसने हमें अपने बहुत से मोमिन बन्दों पर फ़ज़ीलत बख़्शी है.
16. और सुलेमान अलैहिस्सलाम, दाऊद अलैहिस्स्मा के वारिस बने और उन्होंने कहा कि ऐ लोगो ! हमें परिन्दों की बोली भी सिखाई गई है और हमें हर चीज़ अता की गई है, बेशक यह अल्लाह का वाज़ेह फ़ज़ल है. 
17. और सुलेमान अलैहिस्सलाम के लिए उनके लश्कर जिन्न और इंसान और परिन्दे सब जमा किए गए थे. फिर वे सब उनकी ख़िदमत में रहते थे. 
18. यहां तक कि जब वे लश्कर एक दिन चींटियों के मैदान में आ गए, तो एक चींटी कहने लगी कि ऐ चींटियो ! अपने घरों में चली जाओ, कहीं ऐसा न हो कि सुलेमान अलैहिस्सलाम और उनके लश्कर तुम्हें कुचल डालें और उन्हें इसका शऊर भी न हो.
19. फिर सुलेमान अलैहिस्सलाम चींटी की बात सुनकर मुस्कुराये और हंसने लगे. और अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे तौफ़ीक़ अता फ़रमा कि जो नेअमतें तूने मुझे और मेरे वालिदैन को इनायत की हैं, मैं उनका शुक्रगुज़ार रहूं और मैं ऐसे नेक काम करूं, जिसे तू पसंद करे. और मुझे तू अपनी रहमत से अपने स्वालिहीन बन्दों में शामिल कर ले. 
20. और सुलेमान अलैहिस्सलाम ने परिन्दों के लश्कर का जायज़ा लिया, तो कहने लगे कि क्या बात है कि मैं हुदहुद को नहीं देखता. क्या वाक़ई वह ग़ायब है.
21. अगर ऐसा है, तो मैं उसे सख़्त सज़ा दूंगा या उसे ज़िबह ही करवा दूंगा. या वह अपने बेक़सूर होने की कोई वाज़ेह दलील पेश करे.
22. फिर थोड़ी ही देर बाद हुदहुद हाज़िर हुआ और उसने सुलेमान अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि मुझे एक ऐसी बात मालूम हुई है, जो शायद अब तक आपको मालूम नहीं है. और मैं आपके पास मुल्क सबा से एक यक़ीनी ख़बर लेकर आया हूं.
23. बेशक मैंने एक औरत बिलक़ीस को देखा है, जो वहां के बाशिन्दों पर हुकूमत करती है और उसे हर चीज़ अता की गई है और उसके पास एक बहुत बड़ा तख़्त है.
24. मैंने मलिका बिलक़ीस और उसकी क़ौम को अल्लाह के सिवा सूरज को सजदा करते हुए पाया है. और शैतान ने उनके बुरे आमाल उनकी नज़र में आरास्ता कर दिए हैं और उन्हें तौहीद के रास्ते से रोक दिया है, इसलिए वे लोग हिदायत नहीं पाते. 
25. क्योंकि वे लोग अल्लाह को सजदा नहीं करते, जो आसमानों और ज़मीन की पोशीदा बातों को ज़ाहिर कर देता है. और वह उससे ख़ूब वाक़िफ़ है, जो कुछ तुम पोशीदा रखते हो और जो कुछ ज़ाहिर करते हो.
26. अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं. वही अर्शे अज़ीम का मालिक है.
27. सुलेमान अलैहिस्सलाम ने हुदहुद से कहा कि हम अभी देखते हैं कि क्या तू सच कह रहा है या तू झूठ बोलने वालों में से है.
28. सुलेमान अलैहिस्सलाम ने हुदहुद से कहा कि मेरा यह ख़त लेकर जा और इसे उन लोगों के सामने डाल दे. फिर उनके पास से जाना हट जाना. फिर देखते रहना कि वे लोग क्या जवाब देते हैं.
29. मलिका बिलक़ीस कहने लगी कि ऐ मेरे दरबारियो ! बेशक मेरे पास एक करीम ख़त डाला गया है.
30. बेशक वह ख़त सुलेमान अलैहिस्सलाम की तरफ़ से है. बेशक वह अल्लाह के नाम से शुरू किया गया, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है.
31. और मज़मून यह है कि तुम लोग मेरे सामने सरकशी न करो और मुसलमान यानी फ़रमाबरदार बनकर मेरे पास आओ. 
32. मलिका बिलक़ीस कहने लगी कि ऐ मेरे दरबारियो ! तुम मुझे इस मामले में मशवरा दो. मैं तब तक कोई फ़ैसला नहीं करती, जब तक तुम मेरे पास हाज़िर होकर माक़ूल मशवरा न दो.
33. उन दरबारियों ने कहा कि हम बड़े क़ूवत वाले और सख़्त जंगजू हैं. और हर काम का हुक्म आपके इख़्तियार में है. आप ख़ुद ही ग़ौर कर लें कि आपको क्या हुक्म देना है. 
34. मलिका बिलक़ीस ने कहा कि बेशक बादशाह जब किसी बस्ती में दाख़िल हो जाते हैं, तो उसे तबाह व बर्बाद कर देते हैं और वहां के मुअज़्ज़िज़ बाशिन्दों को ज़लील व ख़्वार करते हैं. और वे लोग भी ऐसा ही करेंगे.
35. और बेशक मैं उनके पास कुछ तोहफ़े भेजकर देखती हूं कि क़ासिद क्या जवाब लेकर वापस लौटते हैं. 
36. फिर जब क़ासिद सुलेमान अलैहिस्सलाम के पास आया, तो उन्होंने कहा कि क्या तुम लोग माल व दौलत से मेरी मदद करना चाहते हो. फिर अल्लाह ने जो कुछ मुझे अता किया है, वह उस दौलत से कहीं बेहतर है, जो उसने तुम्हें बख़्शी है. बल्कि तुम लोग ही अपने तोहफ़े से ख़ुश होते हो.
37. तुम उन्हीं लोगों के पास लौट जाओ. हम यक़ीनन ऐसे लश्करों के साथ उन पर हमला करने के लिए आएंगे, जिनसे मुक़ाबला करने की उनकी ताक़त नहीं होगी. और हम ज़रूर उन्हें वहां से ज़लील व ख़्वार करके निकाल देंगे.
38. सुलेमान अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरे दरबारियो ! तुममें से कौन ऐसा है, जो मलिका का तख़्त मेरे पास लेकर आए, इससे पहले कि वे लोग मुसलमान यानी फ़रमाबरदार बनकर मेरे पास आएं.
39. एक ताक़तवर जिन्न ने कहा कि आप अपनी जगह से उठें, इससे पहले ही मैं तख़्त आपके पास ले आऊंगा. और बेशक मैं क़ूवत वाला और अमानतदार हूं.
40. फिर आसमानी किताब के इल्म वाले एक शख़्स आसिफ़ बिन बरख़िया ने कहा कि मैं पलक झपकने से पहले ही तख़्त को आपके सामने हाज़िर कर सकता हूं. फिर जब सुलेमान अलैहिस्सलाम ने उसे अपने पास रखा हुआ देखा, तो कहने लगे कि यह मेरे परवरदिगार का फ़ज़ल है, ताकि मुझे आज़माये कि मैं उसका शुक्र करता हूं या नाशुक्री करता हूं. और जो अल्लाह का शुक्र अदा करता है, तो वह अपनी ही भलाई के लिए शुक्र अदा करता है और जो नाशुक्री करता है, तो बेशक मेरा परवरदिगार बेनियाज़ और बड़ा करम करने वाला है.
41. सुलेमान अलैहिस्सलाम ने कहा कि मलिका बिलक़ीस के इम्तिहान के लिए उसके तख़्त में कुछ तबदीली कर दो, ताकि हम देखें कि वह समझ जाती है या उन लोगों में से है जो राह नहीं पाते. 
42. फिर जब मलिका बिलक़ीस, सुलेमान अलैहिस्सलाम के पास आई, तो उससे दरयाफ़्त किया गया कि तुम्हारा तख़्त भी ऐसा ही है. वह कहने लगी कि गोया यह वही है और हमें इससे पहले ही आपकी नबुवत का इल्म हो गया था. और हम आपके मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हो चुके हैं.
43. और उसने मलिका बिलक़ीस को ईमान लाने से रोक दिया था, जिसे वह अल्लाह के सिवा पुकारती थी. बेशक वह काफ़िरों की क़ौम में से थी.
44. मलिका बिलक़ीस से कहा गया कि तुम महल में दाख़िल हो जाओ. उसने महल में शीशे के फ़र्श को देखा, तो उसे गहरा पानी समझा और उसने अपने पायचें उठाकर अपनी दोनों पिंडलियां खोल दीं. सुलेमान अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह शीशे जड़ा हुआ महल है. मलिका ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मैंने अपनी जान पर ज़ुल्म किया और अब मैं सुलेमान अलैहिस्सलाम के हाथ पर अल्लाह की मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हो गई हूं, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है.
45. और बेशक हमने क़ौमे समूद के पास उनके क़ौमी भाई सालेह अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा कि तुम लोग अल्लाह की इबादत करो, तो उस वक़्त वे लोग दो फ़रीक़ बनकर आपस में झगड़ने लगे.
46. सालेह अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! तुम लोग अच्छाई से पहले बुराई में क्यों जल्दी क्यों कर रहे हो. तुम अल्लाह से बख़्शीश तलब क्यों नहीं करते, ताकि तुम पर रहम किया जाए.
47. वे लोग कहने लगे कि हमें तुमसे भी नहूसत पहुंची है और तुम्हारे साथियों से भी बदशगुनी ही पाई है. सालेह अलैहिस्सलाम ने कहा कि तुम्हारी नहूसत का सबब अल्लाह के पास है, बल्कि तुम फ़ितने में मुब्तिला क़ौम हो. 
48. और शहर में नौ सरदार थे, जो ज़मीन में फसाद फैलाते रहते थे. और अपनी इस्लाह नहीं करते थे. 
49. वे सरदार कहने लगे कि तुम आपस में अल्लाह की क़सम खाकर अहद करो कि हम ज़रूर रात को सालेह अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों पर क़ातिलाना हमला करेंगे. फिर उनके वारिसों से कह देंगे कि हम उनकी हलाकत के मौक़े पर मौजूद नहीं थे. और बेशक हम सच्चे हैं. 
50. और उन लोगों ने मकर किया और हमने भी एक ख़ुफ़िया तदबीर की और उन्हें इसका शऊर भी नहीं था.
51. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर तुम देखो कि उनके मकर का क्या अंजाम हुआ. बेशक हमने उन्हें और उनकी सारी क़ौम को तबाह व बर्बाद कर दिया. 
52. फिर ये उनके घर हैं, जो उनके ज़ुल्म की वजह से वीरान पड़े हैं. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए बड़ी निशानी है, जो इल्म रखती है. 
53. और हमने उन लोगों को निजात दी, जो ईमान लाए और परहेज़गार रहे.
54. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम लूत अलैहिस्सलाम को याद करो कि जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि क्या तुम बेहयाई पर उतर आए हो. और तुम देखते भी हो. 
55. क्या तुम अपनी शहवत पूरी करने के लिए औरतों को छोड़कर मर्दों के पास जाते हो, बल्कि तुम जाहिल क़ौम हो.
56. फिर लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम का जवाब इसके सिवा कुछ नहीं था कि वे लोग कहने लगे कि लूत अलैहिस्सलाम के घरवालों को अपनी बस्ती सदूम से निकाल दो. बेशक वे बड़े पाकबाज़ बनते हैं.
57. फिर हमने लूत अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों को निजात दी, सिवाय उनकी बीवी के. हमने उसे पीछे रह जाने वालों में से मुक़र्रर कर दिया था.
58. और हमने उन लोगों पर पत्थरों की बारिश बरसाई. फिर वह उन लोगों पर बहुत बुरी बारिश थी, जिन्हें ख़बरदार किया गया था. 
59. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं और उसके बरगुज़ीदा बन्दों पर सलाम हो. क्या अल्लाह बेहतर है या वे बातिल सरपरस्त, जिन्हें वे लोग अल्लाह का शरीक ठहराते हैं.
60. भला वह कौन है, जिसने आसमान और ज़मीन की तख़लीक़ की और तुम्हारे लिए आसमान से पानी बरसाया. फिर हमने उस पानी से ख़ुशनुमा बाग़ उगाए. तुम्हारे लिए यह मुमकिन नहीं था कि तुम उनके दरख़्तों को उगा सकते. क्या अल्लाह के साथ कोई और भी सरपरस्त है, बल्कि वे क़ौम ख़ुद ही सीधे रास्ते से हट रही है.
61. भला वह कौन है, जिसने ज़मीन को लोगों के ठहरने की जगह बनाया और उसके दरम्यान नहरें जारी कीं और उसके लिए भारी पहाड़ बनाए. और खारे और मीठे पानी के दो समन्दरों के दरम्यान हदे फ़ासिल बनाई. क्या अल्लाह के साथ कोई और भी सरपरस्त है, बल्कि उनमें से बहुत से लोग नहीं जानते. 
62. भला वह कौन है, जो बेकस की दुआ क़ुबूल करता है और उसकी तकलीफ़ दूर करता है, जब वह उसे पुकारे. और तुम्हें ज़मीन में अपना ख़लीफ़ा बनाता है. क्या अल्लाह के साथ कोई और भी सरपरस्त है? तुम लोग बहुत ही कम ग़ौर व फ़िक्र करते हो.
63. भला वह कौन है, जो तुम्हें ख़़ुशकी और तरी यानी ज़मीन और समन्दर की तारीकियों में राह दिखाता है और जो हवाओं को अपनी रहमत से बारिश से पहले ख़ुशख़बरी बनाकर भेजता है. क्या अल्लाह के साथ कोई और भी सरपरस्त है? अल्लाह उनसे आला है, जिन्हें वे लोग उसका शरीक ठहराते हैं.
64. भला वह कौन है, जो मख़लूक़ को पहली बार पैदा करता है. फिर उसे दोबारा ज़िन्दा करेगा और जो तुम्हें आसमान और ज़मीन से रिज़्क़ देता है. क्या अल्लाह के साथ कोई और भी सरपरस्त  है? ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उन मुशरिकों से कह दो कि अपनी दलील पेश करो, अगर तुम सच्चे हो.
65. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि जो लोग आसमानों और ज़मीन में हैं, उनमें से कोई भी गै़ब का इल्म नहीं जानता सिवाय अल्लाह के और न य उन्हें इसका शऊर है कि वे लोग कब दोबारा ज़िन्दा करके क़ब्रों से उठाए जाएंगे.
66. बल्कि आख़िरत के बारे में उनका इल्म ख़त्म हो गया है. लेकिन वे लोग इससे मुताल्लिक़ शक में मुब्तिला हैं, बल्कि वे लोग इस इल्म के अंधे हैं.
67. और कुफ़्र करने वाले लोग कहने लगे कि क्या जब हम और हमारे बाप दादा मरकर ख़ाक हो जाएंगे, तो क्या हम दोबारा ज़िन्दा होकर क़ब्रों से निकाले जाएंगे.
68. दर हक़ीक़त इसका वादा हमसे भी किया गया और इससे पहले हमारे बाप दादाओं से भी किया गया था. यह पहले के लोगों के अफ़सानों के सिवा कुछ नहीं. 
69. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ज़मीन में चल फिर कर देखो कि गुनाहगारों का क्या अंजाम हुआ.
70. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनकी बातों पर ग़मज़दा न हुआ करो और उनके मकर व फ़रेब की वजह से तंगदिल न होना.
71. और वे काफ़िर सवाल करते हैं कि क़यामत का वादा कब पूरा होगा. अगर तुम सच्चे हो.
72. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि शायद उस अज़ाब का कुछ हिस्सा तुम्हारे क़रीब ही आ गया हो, जिसे तुम लोग बहुत जल्द तलब कर रहे हो. 
73. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार लोगों पर बड़ा फ़ज़ल करने वाला है, लेकिन बहुत से लोग उसका शुक्र अदा नहीं करते.
74. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार उससे ख़ूब वाक़िफ़ है, जो कुछ उनके दिलों में पोशीदा है और जो कुछ वे लोग ज़ाहिर करते हैं.
75. और आसमानों और ज़मीन में कोई भी पोशीदा चीज़ नहीं है, जो वाज़ेह किताब यानी लौहे महफ़ूज़ में दर्ज न हो.
76. बेशक यह क़ुरआन बनी इस्राईल के सामने उन बातों की हक़ीक़त बयान करता है, जिनमें वे लोग इख़्तिलाफ़ किया करते हैं.
77. और बेशक यह कु़रआन ईमान वालों के लिए हिदायत और रहमत है.
78. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक तुम्हारा परवरदिगार अपने हुक्म से उनके दरम्यान फ़ैसला कर देगा और वह बड़ा ग़ालिब बड़ा साहिबे इल्म है. 
79. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर तुम अल्लाह पर भरोसा करो. बेशक तुम सरीह हक़ पर क़ायम व फ़ाईज़ हो.
80. बेशक न तुम मुर्दों को सुना सकते हो और न बहरों को अपनी आवाज़ सुना सकते हो, जब वे पीठ फेरकर चले जाएं.
81. और न तुम अंधों को उनकी गुमराही से बचाकर हिदायत दे सकते हो. तुम तो सिर्फ़ उन्हीं लोगों को सुना सकते हो, जो हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं. इसलिए वही लोग मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हैं.
82. और जब उन लोगों पर अज़ाब का वादा पूरा होने का वक़्त आएगा, तो हम उनके लिए ज़मीन से एक जानवर निकालेंगे, जो उनसे गुफ़्तगू करेगा, क्योंकि वे लोग हमारी आयतों पर यक़ीन नहीं करते थे.
83. और जिस दिन हम हर उम्मत में से उन लोगों के एक-एक फ़ौज को जमा करेंगे, जो हमारी आयतों को झुठलाया करते थे. फिर वे जमातबंदी के लिए रोक दिए जाएंगे.
84. यहां तक कि जब वे सब अल्लाह के हुज़ूर में पेश किए जाएंगे और उनसे कहा जाएगा कि क्या तुम बग़ैर इल्म के हमारी आयतों को झुठलाते थे. भला तुम क्या करते थे?   
85. और उन पर हमारा अज़ाब का वादा पूरा हो गया, क्योंकि वे लोग ज़ुल्म करते थे. फिर वे लोग कुछ बोल भी नहीं सके.
86. क्या उन्होंने नहीं देखा कि हमने रात को इसलिए बनाया, ताकि वे लोग इसमें आराम करें और दिन को रौशन बनाया कि वे काम करें. बेशक इसमें उन लोगों के लिए बहुत सी निशानियां हैं, जो ईमान रखते हैं. 
87. और जिस दिन सूर फूंका जाएगा, तो आसमानों और ज़मीन के सब लोग दहल जाएंगे, लेकिन जिन्हें अल्लाह चाहेगा, वे ख़ौफ़ज़दा नहीं होंगे. और सब लोग आजिज़ होकर उसकी बारगाह में हाज़िर होंगे.
88. ऐ इंसान ! और तू पहाड़ों को देखेगा, तो गुमान करेगा कि जमे हुए हैं, लेकिन वे बादलों की तरह उड़े-उडे़ फिरेंगे. यह भी अल्लाह की कारीगरी है, जिसने हर चीज़ को मज़बूत बनाया है. बेशक अल्लाह उन आमाल से ख़ूब वाक़िफ़ है, जो तुम किया करते हो.
89. जो लोग उस दिन अच्छाई लेकर आएंगे, उनके लिए बेहतर भलाई होगी और वे लोग उस दिन घबराहट से अमान में होंगे.
90. और जो लोग बुराई लेकर आएंगे, उनके मुंह दोज़ख़ की आग में औंधे डाले जाएंगे. उनसे कहा जाएगा कि तुम्हें उसी की जज़ा दी जाएगी, जो कुछ तुम किया करते थे.
91. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मुझे तो सिर्फ़ यही हुक्म दिया गया है कि मैं इस शहर मक्का के मालिक की इबादत करूं, जिसने उसे इज़्ज़त व हुरमत वाला बनाया है और हर चीज़ उसी की है और मुझे यह हुक्म भी दिया गया कि मैं उसके मुसलमान यानी फ़रमाबरदार बन्दों में से रहूं.
92. और यह कि मैं क़ुरआन की तिलावत करूं. फिर जिसने हिदायत क़ुबूल की, तो उसने अपने भले के लिए ही सीधा रास्ता इख़्तियार किया. और जो गुमराह हुआ, तो तुम कह दो कि मैं तो सिर्फ़ अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर हूं.
93. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम कह दो कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. वह अनक़रीब तुम्हें अपनी क़ुदरत की निशानियां दिखाएगा, तो तुम उन्हें पहचान लोगे. तुम्हारा परवरदिगार उन आमाल से ग़ाफ़िल नहीं, जो तुम किया करते हो.

Thursday, August 26, 2021

28 सूरह अल क़सस

सूरह अल क़सस मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 88 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ता सीन मीम. 
2. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ये रौशन किताब की आयतें हैं.
3. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हम तुम्हारे सामने मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन का कुछ वाक़िया हक़ के साथ बयान करते हैं, उस क़ौम के लिए, जो ईमान वाली है.
4. बेशक फ़िरऔन ज़मीन में सरकश व मुतकब्बिर हो गया था और उसने अपने मुल्क के बाशिन्दों को मुख़्तलिफ़ फ़िरक़ों में तक़सीम कर दिया था. उसने उनमें से एक फ़िरक़े बनी इसराईल को बहुत कमज़ोर कर दिया था. वह उनके बेटों को ज़िबह करवा देता और उनकी औरतों को ज़िन्दा छोड़ देता था. बेशक वह भी मुफ़सिदों में से था.
5. और हम यह चाहते थे कि जो लोग ज़मीन में कमज़ोर कर दिए गए हैं उन पर अहसान करें और उन्हें इमाम यानी पेशवा बनाएं और उन्हें मुल्क का वारिस बना दें. 
6. और उन्हें ज़मीन में हुकूमत अता करें और फ़िरऔन और हामान और उनके लश्करों को वे इंक़लाब दिखाएं, जिससे वे डरते थे.
7. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम की मां को इल्हाम किया कि तुम उस बच्चे को दूध पिलाओ. फिर जब तुम्हें उसके बारे में कोई ख़ौफ़ महसूस हो, तो उसे दरिया में छोड़ देना और तुम न ख़ौफ़ज़दा होना और न ग़मज़दा होना. बेशक हम उन्हें फिर तुम्हारे पास पहुंचा देंगे और उन्हें अपने रसूलों में शामिल करेंगे. 
8. फिर फ़िरऔन के लोगों ने उन्हें दरिया में से उठा लिया. इसलिए कि वे उनके दुश्मन और ग़म की वजह बनें. बेशक फ़िरऔन और हामान के लश्कर ख़तावार थे. 
9. और फ़िरऔन की बीवी आसिया ने कहा कि यह बच्चा मेरी और तुम्हारी आंखों के लिए ठंडक है. इसे क़त्ल मत करो. शायद यह हमें नफ़ा पहुंचाए या हम इसे बेटा ही बना लें. और उन्हें हक़ीक़त का शऊर नहीं था. 
10. और मूसा अलैहिस्सलाम की मां का दिल बेचैन हो गया. क़रीब था कि बेक़रारी की वजह से वे इस राज़ को ज़ाहिर कर देतीं, अगर हम उनके दिल को तसल्ली न देते, ताकि वे अल्लाह के वादे पर यक़ीन रखने वालों में से रहें. 
11. और मूसा अलैहिस्सलाम की मां ने उनकी बहन कुलसूम से कहा कि तुम उनके बच्चे के पीछे जाओ. फिर वह उन्हें दूर से देखती रही. और उन्हें हक़ीक़त का कोई शऊर नहीं था.
12. और हमने पहले ही से मूसा अलैहिस्सलाम पर दाइयों का दूध पिलाना हराम कर दिया था. इसलिए उनकी बहन कुलसूम ने कहा कि क्या मैं तुम्हें ऐसे घरवालों के बारे में बताऊं, जो तुम्हारे लिए इस बच्चे की परवरिश कर देंगे और वे इसके ख़ैरख़्वाह भी होंगे. 
13. फिर हमने मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी मां के पास वापस पहुंचा दिया, ताकि उनकी आंखें ठंडी रहें और वे ग़मगीन न हों. और उन्हें यक़ीन हो जाए कि अल्लाह का वादा बरहक़ है, लेकिन बहुत से लोग नहीं जानते. 
14. और जब मूसा अलैहिस्सलाम अपनी जवानी को पहुंचे और भरपूर तवाना हो गए, तो हमने उन्हें हिकमत और इल्म से नवाज़ा. और हम मोहसिनों को इसी तरह जज़ा दिया करते हैं.
15. और मूसा अलैहिस्सलाम उस वक़्त मिस्र शहर में दाख़िल हुए, जब वहां के बाशिन्दे नींद में ग़ाफ़िल थे. फिर उन्होंने देखा कि दो शख़्स आपस में लड़ रहे हैं, जिनमें एक उनकी क़ौम बनी इसराईल का है और दूसरा उनके दुश्मनों यानी क़ौमे फ़िरऔन में से है. फिर उनकी क़ौम के शख़्स ने उनसे उस शख़्स के ख़िलाफ़ मदद मांगी, जो उनके दुश्मनों में से था. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे मारा, तो उसकी मौत हो गई. और मूसा अलैहिस्सलाम कहने लगे कि यह शैतान का काम था. बेशक वह दुश्मन और सरीह गुमराह करने वाला है.
16. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मैंने अपनी जान पर ज़़ुल्म किया है. फिर तू मुझे बख़्श दे. बेशक तू बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
17. उन्होंने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तूने मुझ पर अहसान किया है. अब मैं हरगिज़ गुनाहगारों की मदद नहीं करूंगा.
18. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने इस शहर में ख़ौफ़ज़दा होकर इस इंतज़ार में रात गुज़ारी कि सुबह क्या होगा. फिर अचानक वही शख़्स जिसने कल उनसे मदद मांगी थी, फिर उनसे फ़रियाद कर रहा है. मूसा अलैहिस्सलाम ने उससे कहा कि बेशक तू सरीह गुमराही में मुब्तिला है.
19. फिर जब उन्होंने उसे पकड़ने का इरादा किया, जो उन दोनों का दुश्मन है, तो उसने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! क्या तुम मुझे भी उसी तरह क़त्ल करना चाहते हो, जिस तरह तुमने कल एक शख़्स को क़त्ल कर दिया था. तुम सिर्फ़ यही चाहते हो कि ज़मीन में सरकश बन जाओ और यह नहीं चाहते कि तुम इस्लाह करने वालों में से बनो.
20. और शहर के आख़िरी किनारे से एक शख़्स दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! क़ौमे फ़िरऔन के सरदार तुम्हारे बारे में मशवरा कर रहे हैं कि तुम्हें क़त्ल कर दें, इसलिए तुम यहां से चले जाओ. बेशक मैं तुम्हारे ख़ैरख़्वाहों में से हूं. 
21. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ख़ौफ़ज़दा होकर अल्लाह की मदद का इंतज़ार करते हुए वहां से निकल गए. उन्होंने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे ज़ालिमों की क़ौम से निजात दे.
22. और जब उन्होंने मदयन की तरफ़ रुख़ किया, तो कहने लगे कि उम्मीद है कि मेरा परवरदिगार मुझे सीधा रास्ता दिखाएगा.
23. और जब वे मदयन में पानी के कुओं के पास पहुंचे, तो देखा कि वहां जमा लोगों की एक उम्मत अपने जानवरों को पानी पिला रही है. और उनसे अलग दो लड़कियां अपनी बकरियों को रोके हुए खड़ी हैं. मूसा अलैहिस्सलाम ने पूछा कि तुम इस हाल में क्यों खड़ी हो? वे कहने लगीं कि हम अपनी बकरियों को तब तक पानी नहीं पिला सकतीं, जब तक सब चरवाहे अपने जानवरों को पानी पिलाकर वापस चले न जाएं. हमारे वालिद बहुत ज़ईफ़ हैं.
24. फिर उन्होंने उन दोनों बकरियों को पानी पिला दिया. फिर वे छांव की तरफ़ लौट गए. फिर उन्होंने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मैं तेरी तरफ़ से नाज़िल हर भलाई का फ़कीर हूं.
25. फिर कुछ वक़्त बाद उनमें से एक लड़की शर्माती हुई मूसा अलैहिस्सलाम के पास आकर कहने लगी कि बेशक मेरे वालिद तुम्हें बुला रहे हैं, ताकि तुम्हें उसकी जज़ा दें, जो तुमने हमारी बकरियों को पानी पिलाया है. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम उनके वालिद शुऐब अलैहिस्सलाम के पास आए और उनसे सारा क़िस्सा बयान किया, तो उन्होंने कहा कि कुछ ख़ौफ़ मत करो, तुमने ज़ालिमों की क़ौम से निजात पा ली.
26. उनमें से एक लड़की ने कहा कि ऐ मेरे अब्बा ! इन्हें मुलाज़िम रख लें. बेशक आप जिन्हें भी मुलाज़िम रखेंगे, उनमें से बेहतरीन वह होगा, जो ताक़तवर व अमानतदार हो.
27. शुऐब अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैं चाहता हूं कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक के साथ तुम्हारा इस महर पर निकाह कर दूं कि तुम आठ बरस तक मेरे पास उजरत पर काम करो. फिर अगर तुमने दस बरस पूरे कर दिए, तो तुम्हारा अहसान होगा और मैं तुम पर मशक़्क़त डालना नहीं चाहता. इंशा अल्लाह तुम मुझे स्वालिहीन में से पाओगे.
28. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मेरे और आपके दरम्यान यह अहद तय हो गया. दोनों मुद्दतों में से मैं जो भी पूरी कर दूं, यानी मुझे इसका इख़्तियार है. फिर मुझ पर जबर नहीं होगा. और जो कुछ हम कर रहे हैं, अल्लाह उसका निगेहबान है. 
29. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी दस बरस की मुद्दत पूरी कल ली और अपनी बीवी को लेकर चले, तो कोहे तूर की तरफ़ आग दिखाई दी. उन्होंने अपनी बीवी से कहा कि तुम यहीं ठहरो. बेशक मैंने आग देखी है. मुमकिन है कि मैं वहां से कोई ख़बर लाऊं या आग का कोई अंगारा ही ले आऊं, ताकि तुम गर्मी महसूस कर सको. 
30. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम वहां पहुंचे, तो तूर की वादी के दायें किनारे की मुबारक जगह में एक शजर से आवाज़ आई कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! बेशक मैं ही अल्लाह हूं और तमाम आलमों का परवरदिगार हूं.
31. और यह कि तुम अपना असा ज़मीन पर डाल दो. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे देखा कि वह ख़ूब लहरा रहा है गोया वह अज़दहा हो, तो वे पीठ फेरकर तेज़ी से चल दिए और पीछे मुड़कर भी नहीं देखा. फिर आवाज़ आई कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! सामने आओ और ख़ौफ़ज़दा न हो. बेशक तुम अमान पाने वालों में से हो.
32. अपना हाथ अपने गिरेबान में डालो, वह बग़ैर किसी ऐब के सफ़ेद होकर निकलेगा. और अपने बाजू़ अपने सीने की तरफ़ समेट लो, ताकि ख़ौफ़ जाता रहे. फिर ये दो दलीलें हैं, जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से फ़िरऔन और उसके दरबारियों के पास भेजी जा रही हैं. बेशक वह नाफ़रमान क़ौम है. 
33. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मैंने उनमें से एक शख़्स को क़त्ल कर दिया था, तो मैं ख़ौफ़ज़दा हूं कि वे मुझे क़त्ल कर देंगे. 
34. और मेरा भाई हारून ज़बान में मुझसे ज़्यादा फ़सीह है, तो तू उसे मेरे साथ मेरा मददगार बनाकर भेज दे, ताकि वह मेरी तसदीक़ कर सके. मैं इस बात से ख़ौफ़ज़दा हूं कि वे लोग मुझे झुठला देंगे.
35. हमने फ़रमाया कि हम तुम्हारे भाई के साथ तुम्हारे बाज़ू मज़बूत कर देंगे. और तुम दोनों को ग़लबा अता करेंगे. फिर हमारी निशानियों की वजह से फ़िरऔन के लोग तुम तक नहीं पहुंच सकेंगे. तुम दोनों और तुम्हारी पैरवी करने वाले ग़ालिब रहेंगे.
36. फिर जब मूसा अलैहिस्सलाम हमारी वाज़ेह निशानियां लेकर फ़िरऔन के पास आए, तो वे लोग कहने लगे कि यह तो मनगढ़ंत जादू है. और हमने पहले ये बातें अपने बाप दादाओं से कभी नहीं सुनीं.
37. और मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मेरा परवरदिगार उससे ख़ूब वाक़िफ़ है, जो उसकी बारगाह से हिदायत लेकर आया है और वह उसे भी जानता है, जिसके लिए आख़िरत का बेहतरीन घर है. बेशक ज़ालिम कभी कामयाब नहीं होंगे.
38. और यह सुनकर फ़िरऔन ने कहा कि ऐ मेरे दरबारियो ! मैं तुम्हारे लिए अपने सिवा कोई दूसरा सरपरस्त नहीं जानता. ऐ हामान ! तुम मेरे लिए मिट्टी की ईंटें पकवाओ. फिर मेरे लिए एक बुलंद महल बनवाओ, ताकि मैं उस पर चढ़कर मूसा अलैहिस्सलाम के माबूद को पा सकूं यानी देख लूं. और बेशक मैं उसे झूठ बोलने वालों में गुमान करता हूं.
39. और फ़िरऔन और उसके लश्कर ने ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर और सरकशी की. और उन्होंने यह गुमान किया कि वे हमारी तरफ़ नहीं लौटाए जाएंगे.
40. फिर हमने फ़िरऔन और उसके लश्कर को गिरफ़्त में लेकर दरिया में ग़र्क़ कर दिया. फिर ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ज़रा देखो कि ज़ालिमों का कैसा बुरा अंजाम हुआ.
41. और हमने उन्हें दोज़ख़ियों का इमाम यानी पेशवा बना दिया कि वे लोगों को दोज़ख़ की तरफ़ बुलाते हैं. और क़यामत के दिन उन्हें किसी तरह की कोई मदद नहीं दी जाएगी.
42. और हमने दुनिया में भी उनके पीछे लानत लगा दी और क़यामत के दिन भी वे बदहाल लोगों में शामिल होंगे. 
43. और हमने पहले की बहुत सी उम्मतों को हलाक करने के बाद मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की, जो लोगों के लिए बसीरत और हिदायत और रहमत थी, ताकि वे ग़ौर व फ़िक्र करें.
44. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और जिस वक़्त हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास अपना रिसालत का हुक्म भेजा था, तो तुम कोहे तूर के मग़रिबी जानिब मौजूद नहीं थे और न तुम उनकी गवाही देने वालों में से थे.
45. लेकिन हमने मूसा अलैहिस्सलाम के बाद बहुत सी क़ौमें पैदा कीं. फिर उन पर एक तवील ज़माना गुज़र गया. और न तुम मूसा अलैहिस्सलाम और शुऐब अलैहिस्सलाम की तरह मदयन में रहने वालों में से थे कि तुम उन्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाते. लेकिन हम ही रसूल बनाकर भेजने वाले हैं.
46. और न तुम उस वक़्त कोहे तूर के किनारे पर मौजूद थे, जब हमने मूसा अलैहिस्सलाम को आवाज़ दी थी. लेकिन यह तुम्हारे परवरदिगार की ख़ास रहमत है कि तुम्हें वही के ज़रिये ये तमाम वाक़ियात बताए जा रहे हैं. इसलिए कि तुम उस क़ौम को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो, जिसके पास तुमसे पहले कोई पैग़म्बर नहीं आया, ताकि वे लोग ग़ौर व फ़िक्र करें.
47. और अगर हम उनके पास कोई रसूल नहीं भेजते, तो जब उनके हाथों हुए बुरे आमाल की वजह से उन पर कोई मुसीबत आती, तो वे कहते कि ऐ हमारे परवरदिगार ! तूने हमारे पास कोई रसूल क्यों नहीं भेजा कि हम तेरी आयतों की पैरवी करते और हम मोमिनों में से हो जाते. 
48. फिर जब हमारी बारगाह से हक़ उनके पास पहुंचा, तो वे कहने लगे कि जैसी निशानियां मूसा अलैहिस्सलाम को अता हुई थीं, वैसी निशानियां इन रसूल यानी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को क्यों नहीं दी गईं. क्या उन्होंने उन निशानियों से इनकार नहीं किया था, जो इससे पहले मूसा अलैहिस्सलाम को अता की गई थीं. वे कहने लगे कि ये दोनों यानी क़ुरआन और तौरात जादू हैं, जो एक दूसरे की ताईद करते हैं. बेशक हम सबसे कुफ़्र करते हैं. यानी सबसे इनकार करते हैं. 
49. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह की बारगाह से एक ऐसी किताब ले आओ, जो इन दोनों से ज़्यादा हिदायत वाली हो. मैं भी उसकी पैरवी करूंगा. अगर तुम सच्चे हो.  
50. फिर अगर वे लोग तुम्हारा कहना न मानें, तो जान लेना कि वे सिर्फ़ अपनी ख़्वाहिशों की पैरवी करते हैं. और उससे ज़्यादा गुमराह कौन हो सकता है, जो अल्लाह की हिदायत को छोड़कर अपनी ख़्वाहिशों की पैरवी करे. बेशक अल्लाह ज़ालिमों की क़ौम को हिदायत नहीं देता. 
51. और दरहक़ीक़त हम मुसलसल उन्हें अपने क़ौल यानी अहकाम भेजते रहे, ताकि वे लोग ग़ौर व फ़िक्र करें.
52. जिन लोगों को हमने इससे पहले किताब अता की थी, वे इस क़़ुरआन पर भी ईमान रखते हैं.
53. और जब उनके सामने क़ुरआन पढ़ा जाता है, तो वे कहते हैं कि हम इस पर ईमान लाए. बेशक यह हमारे परवरदिगार की तरफ़ से हक़ है. हम तो पहले ही से इसके मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हो चुके थे.
54. यही वे लोग हैं, जिन्हें दोगुना अज्र दिया जाएगा. इसलिए कि उन्होंने सब्र किया और बुराई को अच्छाई से दूर करते हैं. और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है, उसमें से अल्लाह की राह में ख़र्च करते हैं.
55. और जब वे लोग कोई बेहूदा बात सुनते हैं, तो उससे किनारा कर लेते हैं और कहते हैं कि हमारे लिए हमारे आमाल और तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल. तुम पर सलाम हो. हम जाहिलों से उलझना नहीं चाहते.
56. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक तुम जिसे चाहो, उसे ख़ुद हिदायत नहीं दे सकते. लेकिन अल्लाह जिसे चाहता है, तुम्हारे ज़रिये हिदायत देता है. और वह हिदायत पाने वाले लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ है.
57. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और मक्का के काफ़िर तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ हिदायत यानी हक़ की पैरवी करें, तो हम अपनी ज़मीन से उचक लिए जाएंगे. क्या हमने उन्हें अमन वाले हरम यानी मक्का शहर में नहीं बसाया, जहां हमारी तरफ़ से रिज़्क़ के तौर पर हर क़िस्म के फल व मेवे पहुंचाए जाते हैं. लेकिन बहुत से लोग नहीं जानते.
58. और हमने कितनी ही बस्तियां हलाक कर दीं, जो अपनी ख़ुशहाली पर इतराने लगी थीं. देखो कि ये उनके उजड़े हुए घर हैं, जो उनके बाद फिर कभी आबाद नहीं हुए, सिवाय कुछ घरों के. और हम ही उनके वारिस हैं.
59. और तुम्हारा परवरदिगार किसी भी बस्ती को उस वक़्त तक हलाक नहीं करता, जब तक उनकी किसी बड़ी बस्ती में अपना कोई रसूल न भेज दे, जो उनके सामने हमारी पढ़े. और हम बस्तियों को तब तक हलाक नहीं करते, जब तक वहां के बाशिन्दे ज़ालिम न हों.
60. और जो कुछ तुम लोगों को अता किया गया है, वह तो दुनियावी ज़िन्दगी का थोड़ा सा सामान और उसकी आराइश है. और जो कुछ अल्लाह के पास है, वह उससे कहीं बेहतर और दाइमी है. क्या फिर भी तुम नहीं समझते.
61. फिर क्या वह शख़्स जिससे हमने कोई अच्छा वादा किया हो, फिर वह उसे पाने वाला हो, क्या वह उस शख़्स की तरह हो सकता है, जिसे हमने दुनियावी ज़िन्दगी का सामान दिया है. फिर वे लोग क़यामत के दिन अज़ाब के लिए हमारे सामने हाज़िर किए जाएंगे.
62. और जिस दिन अल्लाह मुशरिकों को पुकार कर उनसे फ़रमाएगा कि हमारे वे कहां हैं, जिन्हें तुम हमारा शरीक गुमान करते थे.
63. जिन पर अज़ाब का फ़रमान साबित हो चुका है, वे लोग कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार ! यही वे लोग हैं जिन्हें हमने गुमराह किया था. हमने उन्हें उसी तरह गुमराह किया, जिस तरह हम ख़ुद गुमराह हुए थे. हम उनसे बेज़ार हैं और तेरी तरफ़ मुतावज्जे होते हैं. और वे लोग हमें नहीं पुकारते थे. 
64. और उनसे कहा जाएगा कि तुम अपने मनगढ़ंत शरीकों को बुलाओ. वे लोग उन्हें बुलाएंगे, तो शरीक उन्हें जवाब तक नहीं देंगे और वे लोग अज़ाब को देख लेंगे. काश ! वे लोग हिदायत पा चुके होते.
65. और जिस दिन अल्लाह उन लोगों से पुकार कर उनसे फ़रमाएगा कि तुमने रसूलों को क्या जवाब दिया था.
66. तो उस दिन उनसे कोई जवाब नहीं दिया जाएगा. फिर वे एक दूसरे से सवाल भी नहीं सकेंगे.
67. फिर जिसने तौबा कर ली और ईमान ले आया और नेक अमल करता रहा, तो यक़ीनन वह कामयाबी पाने वालों में से होगा.
68. और तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है, पैदा करता है और जिसे चाहता है मुंतख़िब करता है. और उन्हें इसका कोई इख़्तियार नहीं है. और अल्लाह उनसे पाक और आला है, जिन्हें वे लोग उसका शरीक ठहराते हैं.
69. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !  और तुम्हारा परवरदिगार उन तमाम बातों से ख़ूब वाक़िफ़ है, जो वे लोग अपने दिलों में पोशीदा रखते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं.
70. और वह अल्लाह ही है, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं. दुनिया और आख़िरत में वही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. और उसी का हुक्म व फ़रमानरवाई है. और तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है.
71. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि भला देखो कि अगर अल्लाह तुम पर क़यामत के दिन तक हमेशा रात ही तारी रखे, तो अल्लाह के सिवा कौन माबूद है, जो तुम्हारे लिए दिन की रौशनी लाए. क्या तुम सुनते नहीं हो.
72. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि भला देखो कि अगर अल्लाह तुम पर क़यामत के दिन तक दिन ही तारी रखे, तो अल्लाह के सिवा कौन माबूद है, जो तुम्हारे लिए रात लाए कि तुम उसमें आराम करो, तो क्या तुम देखते नहीं हो.
73. और अल्लाह ने अपनी रहमत से तुम्हारे लिए रात और दिन बनाए, ताकि तुम रात में आराम करो और दिन में उसका फ़ज़ल यानी रिज़्क़ तलाश करो और तुम उसका शुक्र अदा करते रहो.
74. और जिस दिन अल्लाह उन्हें पुकारकर फ़रमाएगा कि वे कहां हैं, जिन्हें तुम हमारा शरीक गुमान करते थे.
75. और हम हर एक उम्मत से एक गवाह यानी पैग़म्बर सामने लाएंगे. फिर हम मुशरिकों और काफ़िरों से कहेंगे कि तुम अपनी दलील पेश करो. उस वक़्त वे जान लेंगे कि हक़ अल्लाह ही की तरफ़ है और वह सब उनसे ग़ायब हो जाएगा, जो कुछ वे लोग गढ़ा करते थे. 
76. बेशक क़ारून मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम से था. फिर उसने लोगों पर ज़्यादती की. और हमने उसे इस क़दर ख़ज़ाने अता किए थे कि उसकी चाबियां उठाना एक ताक़तवर जमात के लिए दुश्वार होता था. जब एक बार उसकी क़ौम ने उससे कहा कि तू अपनी दौलत पर इतराया मत कर, क्योंकि अल्लाह इतराने वाले लोगों को पसंद नहीं करता.
77. और अल्लाह ने जो कुछ तुझे अता किया है, उसमें आख़िरत के घर की भी जुस्तजू कर. और अपने दुनियावी हिस्से को भी मत भूल. और जिस तरह अल्लाह ने तुझ पर अहसान किया है, उसी तरह तू भी दूसरों पर अहसान कर. और ज़मीन में फ़साद करने की कोशिश मत कर. बेशक अल्लाह मुफ़सिदों को पसंद नहीं करता.
78. क़ारून कहने लगा कि बेशक यह सब मुझे अपने इल्म की वजह से अता किया गया है. क्या वह नहीं जानता कि बेशक अल्लाह ने इससे पहले कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया, जो क़ू़वत उससे कहीं बढ़ चढ़कर थीं और माल व दौलत जमा करने में उससे आगे थीं. और गुनाहगारों से सज़ा के वक़्त उनके गुनाहों के बारे में पूछताछ नहीं हुआ करती.
79. फिर एक दिन क़ारून अपनी क़ौम के सामने बड़ी आराइश के साथ निकला, तो जो लोग दुनियावी ज़िन्दगी के तलबगार थे, वे कहने लगे कि काश ! हमारे पास भी इतना माल व दौलत होती, जितनी क़ारून को अता हुई है. बेशक क़ारून बड़ा नसीब वाला था. 
80. और जिन लोगों को अल्लाह की बारगाह से इल्म अता किया गया था, वे कहने लगे कि तुम पर अफ़सोस है. जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, उनके लिए अल्लाह का सवाब इससे कहीं बेहतर है. और यह सवाब सब्र करने वाले लोगों के सिवा किसी को अता नहीं किया जाएगा.
81. फिर हमने क़ारून और उसके घर को ज़मीन में धंसा दिया. फिर अल्लाह के सिवा कोई जमात ऐसी नहीं थी, जो उसकी मदद करती और न वह ख़ुद को अज़ाब से बचा सका.
82. और जो लोग सुबह के वक़्त उसके मक़ाम और मरतबे की तमन्ना कर रहे थे, अब वे कहने लगे कि हाय शामत ! अल्लाह अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ तंग कर देता है. और अगर अल्लाह हम पर अहसान नहीं करता, तो उसकी तरह हमें भी ज़रूर धंसा देता. हाय शामत ! काफ़िर कभी कामयाब नहीं होंगे.
83. यह आख़िरत का वह घर है, जिसे हमने उन लोगों के लिए बनाया है, जो ज़मीन पर न बड़ाई चाहते हैं और न फ़साद चाहते हैं. और आख़िरत का अंजाम परहेज़गारों के हक़ में होगा.
84. जो अच्छाई लेकर आएगा, तो उसके लिए उससे कहीं बेहतर सिला है और जो बुराई लेकर आएगा, तो बुरे अमल करने वालों को उसी की जज़ा दी जाएगी, जो कुछ वे किया करते थे.
85. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक जिस अल्लाह ने तुम पर क़ुरआन फ़र्ज़ किया है, वही तुम्हें उस जगह लौटाएगा, जहां तुम जाना चाहते हो. तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार उससे भी ख़ूब वाक़िफ़ है, जो हिदायत पर है और उससे भी जो सरीह गुमराही में मुब्तिला है.
86. और तुम्हें यह उम्मीद नहीं थी कि अल्लाह की तरफ़ से तुम पर किताब नाज़िल की जाएगी. लेकिन यह तुम्हारे परवरदिगार की रहमत है. फिर तुम हरगि़ज़ काफ़िरों के मददगार मत बनना.
87. और जब अल्लाह की आयतें तुम पर नाज़िल कर दी गई हैं, तो इसके बाद काफ़िर तुम्हें तबलीग़े रिसालत से न रोक दें. और तुम अपने परवरदिगार की तरफ़ लोगों को दावत देते रहो और तुम मुशरिकों में से हरगिज़ न होना.
88. और तुम अल्लाह के सिवा किसी दूसरे की इबादत न करो. अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं. उसकी ज़ात के सिवा हर चीज़ फ़ानी है. उसी का हुक्म व फ़रमानरवाई है. और तुम सबको उसकी तरफ़ ही लौटना है.

Wednesday, August 25, 2021

29 सूरह अन अनक़बूत

सूरह अन अनक़बूत मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 69 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. अलिफ़ लाम मीम. 
2. क्या लोग इस गुमान में हैं कि उनके सिर्फ़ यह कह देने से कि हम ईमान ले आए, उन्हें छोड़ दिया जाएगा और उनकी आज़माइश नहीं की जाएगी.
3. और बेशक हमने उन लोगों को भी आज़माया था, जो उनसे पहले गुज़र चुके हैं. यक़ीनन अल्लाह आज़माइश के ज़रिये उन लोगों को भी ज़ाहिर कर देगा, जो ईमान के सच्चे और उन्हें भी जो झूठे हैं. 
4. जो लोग बुरे काम करते हैं, क्या वे इस गुमान में हैं कि वे हमसे बचकर निकल जाएंगे. वे लोग कितने बुरे फ़ैसले करते हैं.
5. जो शख़्स अल्लाह से मुलाक़ात की उम्मीद रखता है, तो बेशक अल्लाह का मुक़र्रर किया हुआ वक़्त आने वाला है. और वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
6. और जो शख़्स राहे हक़ में जद्दोजहद करता है, तो अपने फ़ायदे के लिए ही मेहनत करता है. बेशक अल्लाह तमाम आलमों से बेनियाज़ है.
7. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो हम उनकी सारी ख़तायें उनके आमालनामे से मिटा देंगे. और बेशक हम उन्हें उनके आमाल की अच्छी जज़ा देंगे.
8. और हमने इंसान को अपने वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करने का हुक्म दिया है. और अगर तेरे वालिदैन हमारे साथ किसी को शरीक बनाएं, जिसका तुझे इल्म न हो, तो उनका कहना मत मानना. तुम सबको हमारी तरफ़ ही लौटना है. हम तुम्हें उन आमाल से आगाह कर देंगे, जो तुम किया करते हो. 
9. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो हम उन्हें नेक लोगों में शामिल करेंगे. 
10. और कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि हम अल्लाह पर ईमान लाए. फिर जब उन्हें अल्लाह की राह में कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो वे लोगों की दी हुई अज़ीयत को अल्लाह का अज़ाब समझते हैं. और अगर तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से मदद पहुंचती है, तो यक़ीनन वे कहते हैं कि हम तो तुम्हारे साथ ही हैं. क्या अल्लाह उन उन बातों से वाक़िफ़ नहीं है, जो आलम वालों के दिलों में पोशीदा हैं.
11. और अल्लाह उन लोगों को ज़रूर ज़ाहिर कर देगा, जो दिल से ईमान लाए हैं और वह उन्हें भी ज़ाहिर कर देगा, जो मुनाफ़िक़ हैं. 
12. और कुफ़्र करने वाले लोग ईमान लाने वाले लोगों से कहते हैं कि तुम हमारी राह की पैरवी करो. हम तुम्हारी ख़ताओं का बोझ उठा लेंगे. हालांकि वे लोग उनके गुनाहों का कुछ भी बोझ नहीं उठाएंगे. बेशक वे लोग झूठे हैं.
13. और यक़ीनन वे लोग अपने गुनाह के बोझ उठाएंगे और अपने बोझों के साथ अपने ऊपर लादे दूसरों के बोझ भी उठाएंगे. और क़यामत के दिन उनसे उन बोहतानों के बारे में भी पूछगछ होगी, जो वे गढ़ा करते थे.  
14. और बेशक हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम के पास भेजा, तो वे उनमें पचास बरस कम एक हज़ार बरस रहे. फिर उन्हें तूफ़ान ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. और वे ज़ालिम थे.
15. फिर हमने नूह अलैहिस्सलाम और कश्ती वालों को बचा लिया और हमने इसे तमाम आलमों के लोगों के लिए निशानी बना दिया.
16. और इब्राहीम अलैहिस्सलाम को याद करो कि जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि अल्लाह की इबादत करो और उससे डरो. यह तुम्हारे हक़ में बेहतर है. अगर तुम जानते हो.
17. बेशक तुम अल्लाह के सिवा बुतों को पुकारते हो और झूठी बातें गढ़ते हो. बेशक तुम अल्लाह के सिवा जिन्हें पुकारते हो, वे तुम्हें रिज़्क़ देने का कुछ भी इख़्तियार नहीं रखते. फिर तुम सिर्फ़ अल्लाह की बारगाह से रिज़्क़ तलब किया करो और उसी की इबादत करो और उसका शुक्र अदा करो. तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है.
18. और अगर तुमने हक़ को झुठलाया, तो तुमसे पहले भी बहुत सी उम्मतें झुठला चुकी हैं. और रसूल की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ वाज़ेह तौर पर अहकाम पहुंचाने तक ही है.
19. क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह किस तरह मख़लूक़ को पहली मर्तबा पैदा करता है. फिर वही उसे दोबारा पैदा करेगा. बेशक अल्लाह के लिए यह बहुत आसान है.
20. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ज़मीन में चल फिर कर देखो कि अल्लाह ने किस तरह मख़लूक़ को पहली मर्तबा पैदा किया. फिर अल्लाह ही उन्हें दोबारा ज़िन्दा करके उठाएगा. बेशक अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है.
21. अल्लाह जिस पर चाहे अज़ाब नाज़िल करे और जिस पर चाहे रहम करे. और तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है.
22. और तुम अल्लाह को न ज़मीन में आजिज़ कर सकते हो और न आसमानों में. और अल्लाह के सिवा तुम्हारा न कोई कारसाज़ है और न कोई मददगार है. 
23. और जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों और उससे मिलने से कुफ़्र यानी इनकार किया. वे लोग हमारी रहमत से मायूस हो गए. और उन्हीं लोगों के लिए दर्दनाक अज़ाब है.
24. फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम की क़ौम का जवाब इसके सिवा कुछ नहीं था कि वे लोग आपस में कहने लगे कि इन्हें क़त्ल कर दो या इन्हें जला दो. फिर अल्लाह ने उन्हें आग से निजात दी. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए बहुत सी निशानियां हैं, जो ईमान वाली है. 
25. और इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा कि फिर तुमने अल्लाह के सिवा बुत बना लिए हैं, जिनसे तुम्हारी मुहब्बत दुनिया की ज़िन्दगी तक ही है. फिर क़यामत के दिन तुम एक दूसरे से इनकार करोगे और एक दूसरे पर लानत भेजोगे. और तुम्हारा ठिकाना दोज़ख़ है और तुम्हारा कोई मददगार भी नहीं होगा.
26. फिर लूत अलैहिस्सलाम उन पर यानी इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए और उन्होंने कहा कि मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ हिजरत करने वाला हूं. बेशक वह बड़ा ग़ालिब बड़ा हिकमत वाला है.
27. और हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम को इसहाक़ अलैहिस्सलाम और याक़ूब अलैहिस्सलाम अता किए. और हमने इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलादों को नबुवत और किताब अता की. और हमने उन्हें दुनिया में भी अच्छा अज्र दिया और बेशक वे आख़िरत में भी हमारे स्वाहिलीन बन्दों में से हैं.
28. और जब लूत अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा कि बेशक तुम बेहयाई के काम करते हो. तुमसे पहले तमाम आलम में किसी ने ऐसा नहीं किया.
29. क्या तुम लोग अपनी शहवत पूरी करने के लिए मर्दों के पास जाते हो और राहज़नी करते हो और अपनी महफ़िलों में नाशाइस्ता हरकतें करते हो, तो उनकी क़ौम का जवाब भी इसके सिवा कुछ नहीं था कि वे कहने लगे कि तुम हम पर अज़ाब ले आओ. अगर तुम सच्चे हो.
30. लूत अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! इन मुफ़सिद क़ौम के मुक़ाबले में मेरी मदद फ़रमा.
31. और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास ख़ुशख़बरी लेकर आए, तो वे यह भी कहने लगे कि बेशक हम बस्ती के बाशिन्दों को हलाक करने वाले हैं, क्योंकि बेशक इस बस्ती के बाशिन्दे ज़ालिम हैं. 
32. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक इस बस्ती में लूत अलैहिस्सलाम भी हैं. वे कहने लगे कि हम इस बस्ती के बाशिन्दों को ख़ूब जानते हैं. हम उन्हें और उनके घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय उनकी बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में से है.
33. और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते लूत अलैहिस्सलाम के पास आए, तो वे उनके आने से ग़मगीन और तंग दिल हो गए. फ़रिश्तों ने कहा कि तुम न ख़ौफ़ज़दा हो और न ग़मज़दा हो. बेशक हम तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय तुम्हारी बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में से है.
34. बेशक हम उस बस्ती के बाशिन्दों पर आसमान से अज़ाब नाज़िल करने वाले हैं, क्योंकि वे लोग नाफ़रमानी किया करते थे.
35. और बेशक हमने उस बस्ती के वीरान मकानों को उस क़ौम के लिए एक वाज़ेह निशानी के तौर पर बरक़रार रखा है, जो अक़्ल से काम लेती है.
36. और हमने मदीन की तरफ़ उनके क़ौमी भाई शुऐब अलैहिस्सलाम को भेजा. फिर उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अल्लाह की इबादत किया करो और रोज़े आख़िरत के दिन की उम्मीद रखो और ज़मीन में फ़साद फैलाते मत फिरो.
37. फिर उन्होंने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, तो उन्हें ज़लज़ले के अज़ाब ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया और वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए.
38. और हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद और सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद को भी हलाक कर दिया. और उनके कुछ उजड़े हुए मकान तुम्हारे सामने हैं. और शैतान ने उनके बुरे आमाल को उन्हें आरास्ता करके दिखाया था. फिर उन्हें सीधे रास्ते पर चलने से रोक दिया था. हालांकि वे लोग सूझबूझ वाले थे.
39. और हमने क़ारून और फ़िरऔन और हामान को भी हलाक कर दिया. उनके पास मूसा अलैहिस्सलाम वाजे़ह निशानियां लेकर आए थे, तो उन्होंने ज़मीन में तकब्बुर किया और वे हद से तजावुज़ करने वाले थे.
40. फिर हमने उनके गुनाहों के सबब उन्हें गिरफ़्त में ले लिया. उनमें से कुछ लोगों पर पत्थर वाली आंधी चलाई और कुछ लोगों को एक सख़्त चीख़ ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया और कुछ लोगों को ज़मीन में धंसा दिया और कुछ लोगों को ग़र्क कर दिया. और हरगिज़ ऐसा नहीं था कि अल्लाह उन पर ज़ुल्म करे, बल्कि उन लोगों ने ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म किया.  
41. जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे सरपरस्त बना रखे हैं, उनकी मिसाल उस मकड़ी जैसी है जो अपने लिए जाले का घर बनाती. और बेशक तमाम घरों से ज़्यादा कमज़ोर मकड़ी का घर होता है. काश ! वे लोग जानते.
42. बेशक अल्लाह उन लोगों से ख़ूब वाक़िफ़ हैं, जो उसके सिवा दूसरों को पुकारते हैं. और वह बड़ा ग़ालिब बड़ा हिकमत वाला है.
43. और हम ये मिसालें लोगों को समझाने के लिए बयान करते हैं. और इन्हें आलिमों के सिवा कोई नहीं समझता.
44. अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन की हिकमत के साथ तख़लीक़ की है. बेशक मोमिनों के लिए इसमें बड़ी निशानी है.
45. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उस किताब की तिलावत किया करो, जो तुम्हारे पास वही की गई है. और पाबंदी से नमाज़ पढ़ो. बेशक नमाज़ बेहयाई और बुराई से रोकती है. और अल्लाह का ज़िक्र सबसे बड़ा है. और अल्लाह उन कामों को जानता है, जिन्हें तुम अंजाम देते हो.
46. और ऐ ईमान वालो ! अहले किताब से झगड़ा मत किया करो. अगर बात करो, तो अच्छे तरीक़े से करो. लेकिन उनमें से जिन लोगों ने तुम पर ज़ुल्म किया है, उनसे कह दो कि जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो किताबें तुम पर नाज़िल हुई हैं, हम उन सब पर ईमान लाए हैं और हमारा और तुम्हारा माबूद एक ही है और हम उसी के फ़रमाबरदार हैं.
47. और उसी तरह हमने तुम पर किताब यानी क़ुरआन नाज़िल किया है. हमने पहले जिन लोगों को किताबें अता की थीं, वे इस पर ईमान ले आए. और अहले मक्का में से भी कुछ लोग इस पर ईमान लाए हैं. और हमारी आयतों से काफ़िरों के सिवा कोई इनकार नहीं करता.
48. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुमने इससे पहले कोई किताब नहीं पढ़ी थी और न अपने हाथ से तुमने कुछ लिखा था. अगर ऐसा होता, तो झूठे लोग शक में मुब्तिला हो जाते.
49. बल्कि वे क़ुरआन की वाज़ेह आयतें हैं, जो उन लोगों के दिलों में महफ़ूज़ हैं, जिन्हें इल्म अता किया गया है. और हमारी आयतों से ज़ालिमों के सिवा कोई इनकार नहीं करता.. 
50. और काफ़िर कहते हैं कि उन पर यानी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के परवरदिगार की तरफ़ से निशानियां नाज़िल क्यों नहीं की गईं. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनसे कह दो कि निशानियां तो सिर्फ़ अल्लाह ही के पास हैं और मैं तो सिर्फ़ सरीह अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर हूं. 
51. क्या उन लोगों के लिए यह निशानी काफ़ी नहीं कि हमने तुम पर किताब यानी क़ुरआन नाज़िल किया है, जो उनके सामने पढ़ा जाता है. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए रहमत और ज़िक्र है, जो ईमान वाली है..
52. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरम्यान गवाही के लिए अल्लाह ही काफ़ी है. वह सब जानता है, जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है. और जिन लोगों ने बातिल को माना और अल्लाह से कुफ़्र यानी इनकार किया, वही नुक़सान उठाने वाले हैं.
53. और वे लोग तुमसे अज़ाब के लिए जल्दी कर रहे हैं. अगर अज़ाब का वक़्त मुक़र्रर नहीं होता, तो उन पर अज़ाब आ चुका होता. और वह उन पर अचानक आएगा और उन्हें इसका शऊर भी नहीं होगा.
54. वे लोग तुमसे अज़ाब के लिए जल्दी करते हैं और बेशक जहन्नुम काफ़िरों को घेरने वाली है.
55. जिस दिन अज़ाब उन्हें ऊपर और नीचे से ढक लेगा और उनसे कहा जाएगा कि अब उसका ज़ायक़ा चखो, जो कुछ तुम किया करते थे.
56. ऐ हमारे बन्दो ! अगर तुम ईमान लाए हो, तो बेशक हमारी ज़मीन वसीह है. फिर तुम हमारी ही इबादत किया करो.
57. हर शख़्स मौत का ज़ायक़ा चखने वाला है. फिर तुम्हें हमारी तरफ़ ही लौटना है.
58. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, तो उन्हें हम जन्नत के ऊंचे महलों में जगह देंगे, जिनके नीचे नहरें बहती हैं. वे हमेशा उनमें रहेंगे. यह नेक अमल करने वालों का बहुत ही अच्छा अज्र है. 
59. यही वे लोग हैं, जिन्होंने सब्र किया और वे अपने परवरदिगार पर भरोसा करते हैं.
60. और बहुत से जानवर अपना रिज़्क़ उठाये नहीं फिरते. अल्लाह उन्हें भी रिज़्क़ देता है और तुम्हें भी. और वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
61. और अगर तुम उनसे दरयाफ़्त करो कि आसमानों और ज़मीन की किसने तख़लीक़ की है और चांद और सूरज को किसने काम में लगाया है, तो वे कह देंगे कि अल्लाह ने. फिर वे लोग कहां भटक रहे हैं?
62. अल्लाह ही अपने बन्दों में से जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है. बेशक अल्लाह हर चीज़ का जानने वाला है.
63. और अगर तुम उनसे दरयाफ़्त करो कि किसने आसमान से पानी बरसाया. फिर उसके ज़रिये मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दा यानी बंजर ज़मीन को शादाब किया, तो वे कह देंगे कि अल्लाह ने. तुम कह दो कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, बल्कि उनमें से बहुत से लोग नहीं समझते.
64. और यह दुनिया की ज़िन्दगी खेल और तमाशे के सिवा कुछ नहीं है. और बेशक आख़िरत का घर ही असली ज़िन्दगी है. काश ! वे लोग जानते. 
65. फिर जब वे लोग कश्ती में सवार होते हैं, तो अल्लाह को पुकारते हैं और उसकी ख़ालिस इबादत करने लगते हैं. फिर जब वह उन्हें ख़ुश्की में पहुंचा कर निजात दे देता है, तो वे फ़ौरन शिर्क करने लगते हैं.
66. ताकि उस नेअमत की नाशुक्री करें, जो हमने उन्हें अता की है. और वे फ़ायदा उठाते रहें. फिर वे अनक़रीब ही अपना अंजाम जान लेंगे.
67. क्या उन्होंने नहीं देखा कि बेशक हमने हरम को अमन की जगह बनाया. और उसके आसपास के लोग उचक लिए जाते हैं, तो क्या वे लोग फिर भी बातिल पर यक़ीन रखते हैं और अल्लाह की नेअमतों की नाशुक्री करते हैं.
68. और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन हो सकता है, जो अल्लाह के बारे में झूठ बोहतान बांधे या जब हक़ उसके पास आए, तो उसे झुठला दे. क्या काफ़िरों का ठिकाना जहन्नुम में नहीं है?
69. और जो लोग हमारी राह में जिहाद करते हैं, तो हम यक़ीनन उन्हें अपनी राह दिखा देते हैं. और बेशक अल्लाह मोहसिनों के साथ है.