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Sunday, July 11, 2021

74 सूरह अल मुदस्सिर

सूरह अल मुदस्सिर मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 56 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ऐ चादर ओढ़ने वाले महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !
2. उठो और लोगों को अज़ाब से ख़बरदार करो.
3. और अपने परवरदिगार की बड़ाई बयान करो.
4. और अपने लिबास को पाक रखो.
5. और नापाकी से दूर रहो. 
6. और इस नीयत से अहसान न करो कि तुम्हें उससे ज़्यादा की चाह हो.
7. और अपने परवरदिगार के लिए सब्र किया करो.
8. और जब दोबारा सूर फूंका जाएगा.
9. तो वह दिन बहुत सख़्त होगा,
10. काफ़िरों के लिए आसान नहीं होगा.
11. तुम हमें और उसे छोड़ दो, जिसे हमने अकेला पैदा किया,
12. और हमने उसे बहुत सा माल दिया.
13. और उसके सामने हाज़िर रहने वाले बेटे दिए,
14. और हमने उसे ऐशो इशरत में ख़ूब कुशादगी दी. 
15. फिर भी वह चाहता है कि हम उसे और ज़्यादा दें.
16. ऐसा हरगिज़ नहीं होगा. बेशक वह हमारी आयतों का दुश्मन रहा है.
17. हम उसे सऊद पर चढ़ाएंगे. यानी सख़्त अज़ाब देंगे.
18. बेशक उसने सोचा और तजवीज़ की,
19. फिर उस पर अल्लाह की मार. उसने कैसी तजवीज़ की.
20. फिर उस पर अल्लाह मार. उसने कैसी तजवीज़ की. 
21. फिर उसने देखा.
22. फिर उसने त्योरी चढ़ाई और मुंह बना लिया.
23. फिर उसने हक़ से पीठ फेर ली और तकब्बुर किया.
24. फिर वह कहने लगा कि यह क़ुरआन जादू के सिवा कुछ नहीं है, जो पहले के जादूगरों से नक़ल होता चला आ रहा है.
25. यह क़ुरआन बशर के कलाम के सिवा और कुछ नहीं है.
26. हम अनक़रीब उसे सक़र में डाल देंगे.
27. और क्या तुम जानते हो कि सक़र क्या है?
28. वह ऐसी आग है, जो न बाक़ी रखती है और न छोड़ती है. 
29. और जिस्म की खाल को जलाकर स्याह कर देती है.
30. उस पर उन्नीस फ़रिश्ते मुक़र्रर हैं.
31. और हमने दोज़ख़ का निगेहबान फ़रिश्तों को बनाया है और उनका यह शुमार भी कुफ़्र करने वालों की आज़माइश के लिए है, ताकि अहले किताब यक़ीन कर लें कि क़ुरआन और नबुवते मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हक़ है, क्योंकि उनकी किताब में भी दोज़ख़ के फ़रिश्तों की तादाद उन्नीस ही बयान की गई है. और ईमान वालों का ईमान मज़ीद बढ़ जाए. अहले किताब और मोमिन किसी तरह का शक न करें. जिन लोगों के दिल में निफ़ाक़ का मर्ज़ है, वे और काफ़िर ये कहें कि इनकी तादाद की मिसाल से अल्लाह की क्या मुराद है? इसी तरह अल्लाह जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसे चाहता है हिदायत देता है. और तुम्हारे परवरदिगार के लश्करों को उसके सिवा कोई नहीं जानता. और दोज़ख़ का यह बयान बशर की नसीहत के लिए ही है.
32. हां, क़सम है चांद की, जिसका घटना बढ़ना और ग़ायब हो जाना गवाह है. 
33. और क़सम है रात की, जब वह रुख़सत होने लगे.
34. और क़सम है सुबह की, जब वह रौशन हो जाए.
35. बेशक यह दोज़ख़ बहुत बड़ी आफ़तों में से एक है.
36. यह लोगों को डराने वाली है.
37. उसके लिए जो तुममें से नेकी में आगे बढ़ना चाहे या गुनाहों में मुब्तिला होकर पीछे रहना चाहे.
38. हर शख़्स उन आमाल के बदले में गिरवी है, जो उसने कमा रखे हैं.
39. सिवाय दायीं तरफ़ वालों के,
40. वे जन्नत के बाग़ों में होंगे और आपस में पूछ रहे होंगे.
41. गुनाहगारों के बारे में 
42. और कहेंगे कि तुम्हें क्या चीज़ दोज़ख़ में ले आई?
43. वे जवाब देंगे कि हम नमाज़ पढ़ने वालों में से नहीं थे,
44. और हम मिस्कीनों यानी ग़रीबों और मोहताजों को खाना नहीं खिलाते थे,
45. और हम बेहूदा मशग़ले करने वालों के साथ मिलकर बेहूदा मशग़लों में मुब्तिला रहते थे,
46. और हम जज़ा और सज़ा के दिन को झुठलाया करते थे,
47. यहां तक कि हम पर जिस का आना यक़ीनी था वह मौत आ गई.
48. फिर उस वक़्त शफ़ाअत करने वालों की शफ़ाअत भी उन्हें कोई नफ़ा नहीं देगी.
49. फिर उन्हें क्या हुआ है कि वे नसीहत से मुंह फेरे हुए हैं.
50. गोया वे बिदके हुए वहशी गधे हैं,
51. जो शेर से डरकर भागते हैं.
52. बल्कि उनमें से हर शख़्स यह चाहता है कि उसे खुले हुए आसमानी सहीफ़ें दिए जाएं.
53. ऐसा हरगिज़ नहीं होगा. हक़ीक़त यह है कि उन्हें आख़िरत का ख़ौफ़ ही नहीं है.
54. जान लो कि बेशक यह क़ुरआन नसीहत है.
55. फिर जो चाहे इसे याद रखे.
56. और ये लोग उसे तब तक याद नहीं रख सकते, जब तक अल्लाह न चाहे. अल्लाह ही तक़वे का मुस्तहक़ है और वही मग़फ़िरत का मालिक है.