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Saturday, August 7, 2021

47 सूरह मुहम्मद

सूरह मुहम्मद मदीना में नाज़िल हुई और इसकी 38 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. जिन लोगों ने कुफ़्र किया और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका, तो अल्लाह ने उनके आमाल ज़ाया कर दिए. 
2. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे और उस किताब पर भी ईमान लाए, जिसे मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल किया गया और जो उनके परवरदिगार की तरफ़ से बरहक़ है, तो अल्लाह ने उनके गुनाह उनके आमालनामे से मिटा दिए और उनकी हालत संवार दी.
3. यह इसलिए कि कुफ़्र करने वाले लोग बातिल के पीछे चले और ईमान लाने वाले लोगों ने अपने परवरदिगार की तरफ़ से नाज़िल हक़ की पैरवी की. इसी तरह अल्लाह ने लोगों को समझाने के लिए उनकी मिसालें बयान की हैं.
4. फिर जब जंग के मैदान में तुम्हारा मुक़ाबला काफ़िरों से हो, तो उनकी गर्दनें उड़ा दो, यहां तक कि उन्हें अच्छी तरह क़त्ल कर चुको, तो बचे हुए दुश्मनों को मज़बूती से बांध लो. फिर इसके बाद उन्हें अहसान रखकर छोड़ दो या उनसे फ़िदया ले लो, यहां तक कि दुश्मन अपने हथियार रख दे या सुलह व अमन का ऐलान कर दे. यही हुक्म है. और अगर अल्लाह चाहता तो उनसे बग़ैर जंग के इंतक़ाम ले लेता, लेकिन उसने एक दूसरे के ज़रिये तुम्हारी आज़माइश लेनी चाही. और जो लोग अल्लाह की राह में क़त्ल कर दिए गए, वह उनके आमाल ज़ाया नहीं करेगा. 
5. अनक़रीब अल्लाह उन्हें सीधे रास्ते पर चलाएगा और उनकी हालत संवार देगा.
6. और उन्हें जन्नत में दाख़िल करेगा, जिसकी उन्हें पहले से ही पहचान करा दी गई है.
7. ऐ ईमान वालो ! अगर तुम अल्लाह के दीन की मदद करोगे, तो वह भी तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें साबित क़दम रखेगा.
8. और जिन लोगों ने कुफ़्र किया, तो उन पर तबाही आई और अल्लाह ने उनके आमाल ज़ाया कर दिए.
9. यह इसलिए कि उन्होंने उस किताब को नापसंद किया, जिसे अल्लाह ने नाज़िल किया था. फिर अल्लाह ने उनके आमाल बर्बाद कर दिए.
10. क्या उन्होंने ज़मीन में चल फिरकर नहीं देखा कि उनसे पहले के लोगों का कैसा अंजाम हुआ. अल्लाह ने उन्हें तबाह कर दिया. और काफ़िरों के लिए भी ऐसी ही तबाही है.
11. यह इसलिए कि अल्लाह उन लोगों का मौला है, जो ईमान लाए हैं और बेशक काफ़िरों का कोई सरपरस्त नहीं है. 
12. बेशक अल्लाह ईमान लाने वाले और नेक अमल करने वाले लोगों को जन्नत के बाग़ों में दाख़िल करेगा, जिनके नीचे नहरें बहती हैं. और कुफ़्र करने वाले और दुनियावी फ़ायदा उठाने वाले और चौपायों की तरह बेफ़िक्री से खाने पीने वाले लोगों का ठिकाना दोज़ख़ है.
13. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और कितनी ही बस्तियां ऐसी थीं, जिनके बाशिन्दे क़ूवत में तुम्हारे शहर मक्का के बाशिन्दों से कहीं बढ़-चढ़कर थे. उनके बाशिन्दों ने तुम्हें वहां से निकाल दिया, तो हमने उन्हें हलाक कर दिया. फिर उनका कोई मददगार न हुआ.
14. फिर जो शख़्स अपने परवरदिगार की तरफ़ से वाज़ेह दलील पर क़ायम हो, तो क्या वह उस शख़्स के बराबर हो सकता है, जिसे उसके बुरे अमल आरास्ता करके दिखाए गए और वह अपनी ख़्वाहिशों की पैरवी कर रहा हो. 
15. जिस जन्नत का परहेज़गारों से वादा किया गया है, उसमें ऐसे पानी की नहरें होंगी, जिनका पानी कभी ख़राब नहीं होगा. और ऐसे दूध की नहरें होंगी, जिनका ज़ायक़ा कभी नहीं बदलेगा. ऐसे पाकीज़ा शर्बत की नहरें होंगी, जो पीने वालों को लज़्ज़त देगा. और साफ़ शफ़्फ़ाफ़ शहद की नहरें होंगी. और उनके लिए उसमें हर क़िस्म के फल व मेवे होंगे. और उनके परवरदिगार की तरफ़ से मग़फ़िरत होगी. क्या ये परहेज़गार लोग उन लोगों की तरह हो सकते हैं, जो हमेशा दोज़ख़ में रहेंगे और जिन्हें खौलता हुआ पानी पिलाया जाएगा, जो उनकी आंतों के टुकड़े-टुकड़े कर देगा. 
16. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो तुम्हारी तरफ़ कान लगाए रहते हैं, यहां तक कि सबकुछ सुनकर जब तुम्हारे पास से जाते हैं, तो जिन लोगों को इल्म दिया गया है, उनसे कहते हैं कि अभी उन्होंने क्या कहा था. यही वे लोग हैं, जिनके दिलों पर अल्लाह ने मुहर लगा दी है और वे अपनी ख़्वाहिशों पैरवी कर रहे हैं.
17. और जिन लोगों ने हिदायत पा ली है, अल्लाह उनकी हिदायत को मज़ीद कर देता है और उन्हें तक़वा अता करता है.
18. फिर अब वे लोग सिर्फ़ क़यामत का इंतज़ार कर रहे हैं कि उन पर अचानक आ जाए. क़यामत की निशानियां आ चुकी हैं. जिस वक़्त क़यामत आ जाएगी, तो फिर उन्हें उनकी नसीहत कहां फ़ायदा देगी. 
19. फिर जान लो कि उस अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं. और तुम अपने और मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों के गुनाहों के लिए अल्लाह से बख़्शीश मांगते रहा करो. और अल्लाह तुम लोगों के चलने फिरने और ठहरने के मक़ाम को ख़ूब जानता है. 
20. और ईमान वाले लोग कहते हैं कि जिहाद के बारे में कोई सूरत नाज़िल क्यों नहीं होती ? फिर जब कोई मुस्तहकम सूरत नाज़िल की जाती है और उसमें जिहाद का ज़िक्र किया जाता है, तो जिनके दिल में निफ़ाक़ का मर्ज़ हैं वे तुम्हारी तरफ़ इस तरह देखते हैं जैसे उन पर मौत की बेहोशी तारी हो रही हो. फिर ऐसे लोगों के लिए तबाही है. 
21. फ़रमाबरदारी और अच्छा क़ौल उनके लिए बेहतर है. फिर जब जिहाद का हुक्म पुख़्ता हो गया, तो अगर वे लोग अल्लाह से सच्चे रहते, तो उनके लिए बेहतर होता.
22. ऐ मुनाफ़िक़ो ! मुमकिन है कि अगर तुम हाकिम बन जाओ, तो ज़मीन में फ़साद फैलाओ और अपने रिश्ते नातों को तोड़ दो. 
23. यही वे लोग हैं, जिन पर अल्लाह ने लानत की है और उनके कानों को बहरा कर दिया है और उनकी आंखों को अंधा कर दिया है.
24. क्या फिर वे लोग क़़ुरआन पर ज़रा भी ग़ौर नहीं करते या उनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं.
25. बेशक जो लोग हिदायत के वाज़ेह होने के बाद भी कुफ़्र की तरफ़ पलट गए, शैतान ने उन्हें फ़रेब दिया और उन्हें दुनिया में मुद्दतों रहने की उम्मीद दिलाई. 
26. यह इसलिए कि उन लोगों ने अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल हुई किताब यानी क़ुरआन को नापसंद करने वालों से कहा कि कुछ कामों में हम तुम्हारा कहना मानेंगे. और अल्लाह उनके राज़ की बातों से ख़ूब वाक़िफ़ है.
27. फिर उस वक़्त उनका कैसा हश्र होगा, जब फ़रिश्ते उनके चेहरों और पीठ पर मारते हुए उनकी रूह क़ब्ज़ करेंगे. 
28. यह इसलिए कि वे लोग उस रविश की पैरवी करते हैं, जिससे अल्लाह नाराज़ होता है और उसकी ख़ुशनूदी को नापसंद करते हैं. फिर अल्लाह ने उनके आमाल बर्बाद कर दिए.
29. क्या वे लोग जिनके दिलों में निफ़ाक़ का मर्ज़ है, यह गुमान करते हैं कि अल्लाह उनके दिल के कीनों और अदावतों को हरगिज़ ज़ाहिर नहीं करेगा.
30. और अगर हम चाहें, तो वे मुनाफ़िक़ लोग तुम्हें दिखा दें और तुम उन्हें उनके चेहरों से ज़रूर पहचान लो. और तुम उन्हें उनके क़ौल के लहजे से भी पहचान लोगे. और अल्लाह तुम्हारे आमाल को ख़ूब जानता है.
31. और हम तुम्हें ज़रूर आज़माएंगे, यहां तक कि तुम में से जिहाद करने वाले और सब्र करने वाले लोगों को ज़ाहिर कर दें और तुम्हारी ख़बरें भी ज़ाहिर कर दें. 
32. बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका और हिदायत ज़ाहिर होने के बाद भी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुख़ालिफ़त की, तो वे अल्लाह का कुछ भी नुक़सान नहीं कर सकेंगे. और अल्लाह अनक़रीब उनके आमाल बर्बाद कर देगा.
33. ऐ ईमान वालो ! तुम अल्लाह की इताअत किया करो और रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इताअत करो और अपने आमाल को बर्बाद मत करो.
34. बेशक जिन लोगों ने कुफ़्र किया और दूसरों को अल्लाह के रास्ते से रोका. फिर वे काफ़िर ही मर गए, तो अल्लाह उन्हें हरगिज़ नहीं बख़्शेगा. 
35. ऐ ईमान वालो ! फिर तुम हिम्मत मत हारो और दुश्मनों को सुलह के लिए मत बुलाओ. और तुम ही ग़ालिब रहोगे और अल्लाह तुम्हारे साथ है. और वह हरगिज़ तुम्हारे आमाल बर्बाद नहीं करेगा.
36. बेशक दुनिया की ज़िन्दगी तो महज़ खेल और तमाशा है. और अगर तुम ईमान लाओ और परहेज़गारी इख़्तियार करो, तो वह तुम्हें अज्र देगा और तुमसे तुम्हारा माल तलब नहीं करेगा. 
37. अगर वह तुमसे तुम्हारा माल तलब करे. फिर तुम्हें तंगी दे, तो तुम बुख़्ल करोगे. और इस तरह तुम्हारी बदनीयती ज़ाहिर हो जाएगी. 
38. जान लो कि तुम वे लोग हो, जिन्हें अल्लाह की राह में ख़र्च करने के लिए बुलाया जाता है, तो तुममें से कुछ ऐसे भी हैं, जो बुख़्ल करते हैं. और जो बुख़्ल करता है, वह ख़ुद से ही बुख़्ल करता है. और अल्लाह बेनियाज़ है और तुम सब उसके मोहताज हो. और अगर तुम अल्लाह के हुक्म से मुंह मोड़ोगे, तो वह तुम्हारी जगह उस क़ौम को ले आएगा, जो तुम्हारे जैसी नहीं होगी.