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Saturday, August 28, 2021

26 सूरह अश शुअरा

सूरह अश शुअरा मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 287 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. ता सीन मीम.
2. ये वाज़ेह किताब की आयतें हैं.
3. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! शायद तुम इस ग़म में ख़ुद को हलाक कर लोगे कि वे लोग ईमान क्यों नहीं लाते.
4. अगर हम चाहें, तो उन लोगों पर आसमान से कोई ऐसी निशानी नाज़िल कर दें कि फिर उनकी गर्दनें उसके सामने झुक जाएं. 
5. और जब उनके पास मेहरबान अल्लाह की तरफ़ से कोई ज़िक्र आता है, तो वे लोग उससे मुंह फेर लेते हैं.
6. फिर बेशक उन्होंने हक़ को झुठला दिया. फिर अनक़रीब ही वे लोग उसकी हक़ीक़त जान लेंगे, जिसका वे मज़ाक़ उड़ाया करते थे.
7. क्या उन लोगों ने ज़मीन की तरफ़ नहीं देखा कि हमने उसमें हर क़िस्म की कितनी ही उम्दा चीजे़ं उगाई हैं. 
8. बेशक इसमें अल्लाह की क़ुदरत बड़ी निशानी है, लेकिन उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं.
9. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
10. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उस वक़्त को याद करो कि जब तुम्हारे परवरदिगार ने मूसा अलैहिस्सलाम को आवाज़ दी कि तुम ज़ालिमों की क़ौम के पास जाओ. 
11. यह क़ौमे फ़िरऔन है. क्या वे लोग अल्लाह के अज़ाब से नहीं डरते.
12. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मुझे ख़ौफ़ है कि वे लोग मुझे झुठला देंगे.
13. और ऐसे में मेरा दम घुटने लगता है और मेरी ज़बान में भी रवानगी नहीं है. इसलिए हारून के पास पैग़ाम भेज दे कि वह मेरा साथ दे.
14. और उनका मुझ पर एक शख़्स को क़त्ल करने का इल्ज़ाम भी है. इसलिए मुझे ख़ौफ़ है कि वे मुझे क़त्ल कर देंगे. 
15. उनसे कहा गया कि फिर तुम दोनों हमारी निशानियां लेकर जाओ. बेशक हम तुम्हारे साथ सब सुन रहे हैं. 
16. फिर तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और उससे कहो कि हम तमाम आलमों के परवरदिगार के भेजे हुए रसूल हैं. 
17. कि तू बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे. 
18. फ़िरऔन ने कहा कि क्या हमने बचपन में तुम्हारी परवरिश नहीं की थी और क्या तुमने अपनी उम्र के कई बरस हमारे साथ नहीं गुज़ारे. 
19. और तुमने अपना वह काम कर दिया, ख़ैर जो तुमने किया. और तुम नाशुक्रे लोगों में से हो.
20. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैंने उस वक़्त वह काम किया था, जब मैं राह से अनजान था. 
21. फिर जब मैं तुमसे ख़ौफ़ज़दा हुआ, तो तुम्हारी पहुंच से निकल गया. फिर मेरे परवरदिगार ने मुझे नबुवत  अता की और मुझे भी रसूलों में शामिल कर लिया. 
22. और यह भी कोई नेअमत है, जिसका तुम मुझ पर अहसान जता रहे हो कि तुमने मेरी पूरी क़ौम बनी इस्राईल को ग़ुलाम बना रखा है.
23. फ़िरऔन ने कहा कि तमाम आलमों का परवरदिगार क्या शय है.
24. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि आसमानों और ज़मीन और जो कुछ इन दोनों के दरम्यिान है, वह सबका परवरदिगार है. अगर तुम यक़ीन करने वाले हो. 
25. फ़िरऔन ने अपने इर्द गिर्द बैठे लोगों से कहा कि क्या तुम सुन नहीं रहे हो.
26. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि वही अल्लाह है, जो तुम्हारा परवरदिगार और तुम्हारे बाप दादाओं का भी परवरदिगार है.
27. फ़िरऔन ने कहा कि ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारा ये रसूल, जो तुम्हारे पास भेजा गया है ज़रूर दीवाना है.
28. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मग़रिब और मशरिक़ और जो कुछ इनके दरम्यान है, वह सबका परवरदिगार है. अगर तुम समझते हो.
29. फ़िरऔन ने कहा कि अगर तुमने मेरे सिवा किसी और को अपना सरपरस्त माबूद बनाया, तो मैं ज़रूर तुम्हें गिरफ़्तार करके क़ैदियों में शामिल करूंगा.
30. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगरचे मैं तुम्हारे सामने कोई वाजे़ह चीज़ बतौर मौजिज़ा भी ले आऊं. 
31. फ़िरऔन ने कहा कि तुम उसे पेश करो. अगर तुम सच्चे हो.
32. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया. फिर वह अचानक एक सरीह अज़दहा बन गया.
33. और जब मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना हाथ गिरेबान में डालकर बाहर निकाला, तो वह देखने वालों के लिए चमकदार सफ़ेद हो गया.
34. फ़िरऔन ने अपने इर्द गिर्द बैठे दरबारियों से कहा कि बेशक ये बड़ा जादूगर है.
35. यह चाहता है कि अपने जादू के ज़ोर से तुम्हें तुम्हारी सरज़मीन मिस्र से बाहर निकाल दे. फिर इसके बारे में तुम लोग क्या मशवरा देते हो.
36. दरबारियों ने कहा कि अभी इन्हें और इनके भाई हारून अलैहिस्सलाम को कुछ वक़्त की मोहलत दो और तमाम शहरों में जादूगरों को बुलाने के लिए हरकारे भेजो.
37. वे हरकारे तमाम बड़े माहिर जादूगरों को तुम्हारे पास लेकर आएं.
38. फिर एक दिन मुक़र्रर वक़्त पर सब जादूगर जमा किए गए.
39. और लोगों में मुनादी करा दी गई कि तुम सबको इस मौक़े पर जमा होना है.
40. ताकि हम जादूगरों की पैरवी करें, अगर वे मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम पर ग़ालिब आ गए.
41. फिर जब सब जादूगर आ गए, तो उन्होंने फ़िरऔन से कहा कि अगर हम ग़ालिब आ गए, तो हमें क्या कोई उजरत मिलेगी.
42. फ़िरऔन ने कहा कि हां, बेशक तुम उसी वक़्त मेरे मुक़र्रिबों में शामिल हो जाओगे.
43. मूसा अलैहिस्सलाम ने जादूगरों से कहा कि तुम जो कुछ फेंकना चाहते हो, फेंक दो.
44. फिर जादूगरों ने अपनी रस्सियां और अपने असा ज़मीन पर डाल दिए और कहने लगे कि फ़िरऔन की इज़्ज़त की क़सम ! बेशक हम ही ग़ालिब रहेंगे.
45. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया, तो वह फ़ौरन अज़दहा बनकर उन चीज़ों को निगलने लगा, जिसे जादूगरों ने बनाया था.
46. यह नज़ारा देखते ही सब जादूगर मूसा अलैहिस्सलाम के सामने सजदे में गिर पडे़.
47. और कहने लगे कि हम तमाम आलमों के परवरदिगार पर ईमान ले आए.
48. जो मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम का परवरदिगार है.
49. फ़िरऔन ने कहा कि तुम इन पर ईमान ले आए इससे पहले कि मैं तुम्हें इजाज़त देता. बेशक ये मूसा अलैहिस्सलाम ही तुम्हारे सबसे बड़े उस्ताद हैं, जिन्होंने तुम्हें जादू सिखाया है. तुम जल्द ही अपना अंजाम जान लोगे. मैं ज़रूर तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और तुम्हारे दूसरी तरफ़ के पांव कटवा दूंगा और तुम सबको सूली पर चढ़वा दूंगा.
50. जादूगरों ने कहा कि कोई हर्ज नहीं है. बेशक हमें अपने परवरदिगार की तरफ़ ही लौटना है.
51. बेशक हमें उम्मीद है कि हमारा परवरदिगार हमारी ख़तायें बख़्श देगा. इसलिए कि अब हम ही सबसे पहले ईमान लाए हैं.
52. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि तुम मेरे बन्दों को लेकर रातों रात यहां से निकल जाओ. बेशक तुम्हारा पीछा किया जाएगा.
53. तब फ़िरऔन ने लश्कर जमा करने के लिए मुख़्तलिफ़ शहरों में हरकारे रवाना कर दिए.
54. फ़िरऔन ने कहा कि बेशक मूसा अलैहिस्सलाम के साथ ये बनी इसराइल थोड़ी सी जमात है.
55. और बेशक वे लोग मुझे सख़्त ग़ुस्सा दिला रहे हैं.
56. और बेशक हम बड़ी व मुस्तैद जमात हैं.
57. फिर हमने उन्हें मिस्र के बाग़ों और चश्मों से निकालकर बाहर कर दिया.
58. और ख़ज़ानों और उम्दा क़यामगाहों से भी निकाल दिया.  
59. हमने ऐसा ही किया और बनी इस्राईल को उस सरज़मीन का वारिस बना दिया. 
60. फिर सूरज निकलते ही फ़िरऔन के लोगों ने उनका पीछा किया.
61. फिर जब दोनों जमातें इतनी क़रीब हुईं कि एक दूसरे को देखने लगीं, तो मूसा अलैहिस्सलाम के साथी कहने लगे कि बेशक अब हम पकड़े जाएंगे. 
62. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि हरगिज़ नहीं. बेशक मेरा परवरदिगार मेरे साथ है. वह मुझे राह दिखा देगा.
63. फिर हमने मूसा अलैहिस्सलाम के पास वही भेजी कि अपना असा दरिया पर मारो. फिर दरिया बीच में से फट गया. और हर हिस्सा एक बड़े पहाड़ की तरह नज़र आने लगा.
64. और हमने दूसरों यानी फ़िरऔन के साथियों को उस जगह के क़रीब कर दिया.
65. और हमने मूसा अलैहिस्लाम और उनके साथियों को निजात दी.
66. फिर हमने दूसरों यानी फ़िरऔन और उसके साथियों को ग़र्क़ कर दिया.
67. बेशक इसमें अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
68. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
69. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उन लोगों से इब्राहीम अलैहिस्सलाम का क़िस्सा बयान करो. 
70. जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने मुंह बोले वालिद यानी अपनी परवरिश करने वाले अपने चाचा आज़र और अपनी क़ौम से कहा कि तुम लोग किसे पुकारते हो.
71.  वे लोग कहने लगे कि हम बुतों को पुकारते हैं और उन्हीं के लिए जमे रहने वाले हैं.
72. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या वे बुत तुम्हें सुनते हैं, जब तुम उन्हें पुकारते हो. 
73. या वे तम्हें कुछ नफ़ा पहुंचाते हैं या नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
74. वे लोग कहने लगे कि मालूम नहीं, बल्कि हमने अपने बाप दादाओं को ऐसा ही करते हुए पाया है.
75. इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या तुमने कभी उन्हें देखा है, जिन्हें तुम पुकारते हो. 
76. या तुम और तुम्हारे पिछले बाप दादाओं ने देखा है. 
77. फिर बेशक सब बुत मेरे दुश्मन हैं, सिवाय तमाम आलमों के परवरदिगार के, जो मेरा माबूद है. 
78. उसी अल्लाह ने मुझे पैदा किया और वही मुझे हिदायत देता है.
79. और अल्लाह ही मुझे खाना खिलाता है और पानी पिलाता है.
80. और जब मैं बीमार होता हूं, तो अल्लाह ही मुझे शिफ़ा देता है.
81. और वह अल्लाह ही है, जो मुझे मौत देगा. फिर उसके बाद मुझे दोबारा ज़िन्दगी बख़्शेगा.
82. और वह अल्लाह ही है, जिससे मैं उम्मीद रखता हूं कि वह जज़ा के दिन मेरी ख़ताओं को बख़्श देगा.
83. ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे इल्म और हिकमत अता फ़रमा और मुझे स्वालिहीन में शामिल कर दे.
84. और बाद में आने वाली नस्लों में मेरा ज़िक्रे ख़ैर क़ायम रख. 
85. और मुझे भी नेअमतों वाली जन्नत के वारिसों में से बना दे.
86. और मेरी परवरिश करने वाले मेरे चाचा आज़र को बख़्श दे. बेशक वह गुमराहों में से है.
87. और मुझे उस दिन रुसवा न करना, जिस दिन लोग क़ब्रों से उठाए जाएंगे.
88. जिस दिन न माल ही कुछ नफ़ा देगा और न औलाद ही कुछ काम आएगी.
89. लेकिन जो पाक दिल लेकर अल्लाह की बारगाह में आएगा, वही फ़ायदे में रहेगा.
90. और उस दिन जन्नत परहेज़गारों के क़रीब कर दी जाएगी.
91. और जहन्नुम गुमराहों के सामने ज़ाहिर कर दी जाएगी.
92. और जहन्नुम वालों से कहा जाएगा कि वे कहां हैं, जिन्हें तुम पुकारते थे.
93. अल्लाह के सिवा. क्या वे तुम्हारी कुछ मदद कर सकते हैं या वे ख़ुद अपनी मदद कर सकते हैं.
94. फिर वे सरपरस्त और गुमराह लोग दोज़ख़ में औंधे मुंह डाल दिए जाएंगे.
95. और इबलीस के सारे लश्कर भी दोज़ख़ में डाले जाएंगे.
96. और वे सब लोग दोज़ख़ में आपस में झगड़ते हुए अपने सरपस्तों से कहेंगे. 
97. अल्लाह की क़सम ! बेशक हम सरीह गुमराही में मुब्तिला थे.
98. जब हम तुम्हें तमाम आलमों के परवरदिगार के बराबर ठहराते थे.
99. और हमें उन गुनाहगारों के सिवा किसी ने गुमराह किया नहीं किया. 
100. तो अब हमारी शफ़ाअत करने वाला कोई नहीं है.
101. और न कोई गर्म जोश दोस्त है.
102. फिर काश ! हमें दुनिया में दोबारा लौटने का मौक़ा मिल जाता, तो हम भी मोमिन हो जाते. 
103. बेशक इब्राहीम अलैहिस्सलाम के इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
104. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
105. नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था.
106. जब उनके क़ौमी भाई नूह अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते. 
107. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
108. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
109. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
110. लिहाज़ा तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो. 
111. वे लोग कहने लगे कि क्या हम तुम पर ईमान ले आएं, जबकि तुम्हारी पैरवी पस्त तबक़े के लोग ही कर रहे हैं. 
112. नूह अलैहिस्सलाम ने कहा कि मुझे इसका इल्म नहीं की कि वे लोग पहले क्या करते थे. 
113. उन लोगों का हिसाब तो मेरे परवरदिगार के ज़िम्मे है. काश ! तुम्हें इसका शऊर होता.
114. और मैं मोमिनों को ख़ुद से दूर नहीं करूंगा. 
115. मैं तो सिर्फ़ वाज़ेह तौर पर अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर हूं.
116. वे लोग कहने लगे कि ऐ नूह अलैहिस्सलाम ! अगर तुम बाज़ नहीं आए, तो ज़रूर संगसार कर दिए जाओगे.
117. नूह अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! बेशक मेरी क़ौम ने मुझे झुठला दिया है.
118. फिर तू मेरे और उनके दरम्यान फ़ैसला कर दे और मुझे और मेरे मोमिन साथियों को निजात दे दे. 
119. फिर हमने कश्ती में सवार नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथियों को निजात दी.
120. फिर उसके बाद हमने बाक़ी लोगों को ग़र्क़ कर दिया.
121. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
122. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
123. हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद ने भी रसूलों को झुठलाया था.
124. जब उनके क़ौमी भाई हूद अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
125. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
126. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
127. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है.
128. क्या तुम ऊंची जगह पर फ़ुज़ूल में बुलंद निशानियां यानी यादगारें तामीर करते हो.
129. और तुम बड़े शानदार महल तामीर करते हो, गोया तुम हमेशा यहीं रहोगे.
130. और जब तुम किसी को गिरफ़्त में लेते हो, तो गिरफ़्तार करते वक़्त जबर बन जाते हो. 
131. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
132. और उस अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हारी उन चीज़ों से मदद की, जिन्हें तुम ख़ूब जानते हो.
133. उसने तुम्हारी चौपायों और औलाद से मदद की.
134. और बाग़ों और चश्मों से भी मदद की. 
135. बेशक मैं तुम्हारे लिए एक बड़े सख़्त दिन के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हूं.
136. वे लोग कहने लगे कि हमारे हक़ में सब बराबर है, अगरचे तुम नसीहत करो या नसीहत करने वालों में से न हो.
137. यह डराना-धमकाना, तो बस पहले के लोगों की आदत है.
138. और हम पर कोई अज़ाब नहीं किया जाएगा.
139. फिर उन लोगों ने हूद अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो हमने भी उन्हें हलाक कर दिया. बेशक इस क़िस्से में बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे. 
140. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
141. सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद ने भी रसूलों को झुठलाया था.
142. जब उनके क़ौमी भाई सालेह अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
143. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
144. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
145. और मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है.
146. क्या तुम यहां की नेअमतों में अमन व इत्मीनान से छोड़ दिए जाओगे.
147. बाग़ों और चश्मों में. 
148. और खेतियों और खजूरों में, जिनके ख़ोशे नर्म व नाज़ुक होते हैं.
149. और तुम ख़ुशी-ख़ुशी पहाड़ों को तराशकर घर बनाते हो.
150. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
151. और हद से तजावुज़ करने वाले लोगों का कहना मत मानो.
152. जो लोग ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं और इस्लाह नहीं करते.
153. वे लोग कहने लगे कि तुम उन लोगों में से हो, जिन पर जादू कर दिया गया है.
154. तुम तो सिर्फ़ हमारे ही जैसे बशर हो. फिर तुम कोई निशानी ले आओ. अगर तुम सच्चे हो. 
155. सालेह अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह ऊंटनी है. एक दिन पानी पीने की इसकी बारी है और एक दिन तुम्हारे लिए मुक़र्रर है. 
156. और बुराई के इरादे से इसे हाथ मत लगाना, वरना एक बड़े सख़्त दिन का अज़ाब तुम्हें अपनी गिरफ़्त में ले लेगा.
157. फिर उन लोगों ने उस ऊंटनी की कूंचें काट दीं. फिर वे ख़ुद पर नादिम हुए.
158. फिर उन्हें अज़ाब ने गिरफ़्त में ले लिया. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
159. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
160. लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था. 
161. जब उनके क़ौमी भाई लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम लोग अल्लाह से नहीं डरते.
162. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं. 
163. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
164. और मै तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
165. क्या तुम लोग तमाम आलम वालों में से सिर्फ़ मर्दों ही के पास अपनी शहवत पूरी करने के लिए जाते हो.
166. और अपनी बीवियों को छोड़ देते हो, जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे लिए पैदा की हैं, बल्कि तुम हद से गुज़र जाने वाली क़ौम हो.
167. उन लोगों ने कहा कि ऐ लूत अलैहिस्सलाम ! अगर तुम बाज़ नहीं आए, तो तुम ज़रूर शहर बदर कर किए जाने वालों में से हो जाओगे.
168. लूत अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक मैं तुम्हारी हरकतों से बेज़ार हूं.
169. उन्होंने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! तू मुझे और मेरे घरवालों को उससे निजात दे, जो कुछ वे लोग कर रहे हैं. 
170. फिर हमने लूत अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों को निजात दी.
171. सिवाय उनकी ज़ईफ़ बीवी के, जो पीछे रह जाने वालों में थी.
172. फिर हमने उन लोगों को तबाह व बर्बाद कर दिया.
173. और हमने उन लोगों पर पत्थरों की बारिश की. फिर वह उन लोगों पर बहुत बुरी बारिश थी, जिन्हें ख़बरदार किया गया था. 
174. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान वाले नहीं थे.
175. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
176. जंगल में रहने वालों यानी शुएब अलैहिस्सलाम की क़ौम ने भी रसूलों को झुठलाया था.
177. जब शुऐब अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते.
178. बेशक मैं तुम्हारा अमानतदार रसूल हूं.
179. फिर तुम अल्लाह से डरो और मेरी इताअत करो.
180. मैं तुमसे इस पर कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो तमाम आलमों के परवरदिगार के ज़िम्मे है. 
181. और तुम नाप तौल में पैमाना पूरा भरा करो और लोगों को नुक़सान पहुंचाने वाले न बनो.
182. और वज़न को सही तराज़ू से ठीक से तौलो.
183. और लोगों को उनकी चीज़ें कम करके न दिया करो और ज़मीन में फ़साद अंगेज़ी करते न फिरो.
184. और उस अल्लाह से डरो, जिसने तुम्हें और तुमसे पहले की उम्मतों को पैदा किया है.
185. वे लोग कहने लगे कि तुम उन लोगों में से हो, जिन पर जादू कर दिया गया है.
186. तुम तो सिर्फ़ हमारे ही जैसे बशर हो और हम गुमान करते हैं कि तुम झूठे लोगों में से हो. 
187. फिर तुम हमारे ऊपर आसमान का एक टुकड़ा नाज़िल कर दो. अगर तुम सच्चे हो.
188. और शुएब अलैहिस्सलाम ने कहा कि मेरा परवरदिगार उन आमाल से ख़ूब वाक़िफ़ है, जो तुम किया करते हो.
189. फिर उन लोगों ने शुएब अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो उन्हें सायेबान यानी बादलों वाले दिन के अज़ाब ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. बेशक वे बड़े सख़्त दिन का अज़ाब था.
190. बेशक इस क़िस्से में अल्लाह की क़ुदरत की बड़ी निशानी है और उनमें से बहुत से लोग ईमान लाने वाले नहीं थे.
191. और बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा ग़ालिब बड़ा मेहरबान है.
192. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और बेशक यह क़़ुरआन तमाम आलमों के परवरदिगार ने नाज़िल किया है.
193. जिसे रूहुल अमीन यानी जिब्रईल अलैहिस्सलाम लेकर आए हैं. 
194. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! यह क़ुरआन तुम्हारे क़ल्बे अनवार पर नाज़िल हुआ है, ताकि तुम लोगों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो. 
195. यह वाज़ेह अरबी ज़बान में नाज़िल हुआ है.
196. और बेशक इसका ज़िक्र ज़ुबूर और पहले की दीगर आसमानी किताबों व सहीफ़ों में भी किया गया है.
197. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! क्या उनके लिए क़ुरआन की सदाक़त और तुम्हारी नबुवत की यह निशानी काफ़ी नहीं है कि इसे बनी इस्राईल के उलेमा भी जानते हैं.
198. और अगर हम इस क़़ुरआन को ग़ैर अरबी लोगों में से किसी पर नाज़िल कर देते.
199. और वह इसे उन लोगों के सामने पढ़ता, तब भी ये लोग उस पर ईमान लाने वाले नहीं थे.
200. इस तरह हमने इस इनकार को गुनाहगारों के दिलों में दाख़िल कर दिया.
201. वे लोग ईमान नहीं लाने वाले नहीं हैं, जब तक कि दर्दनाक अज़ाब को न देख लें.
202. फिर वह अज़ाब अचानक उन पर नाज़िल हो जाएगा और उन्हें इसका शऊर भी नहीं होगा.
203. फिर वे लोग कहेंगे कि क्या हमें कुछ मोहलत मिल सकती है.
204. तो क्या वे लोग हमारे अज़ाब को जल्दी तलब कर रहे हैं.
205. तो क्या तुमने देखा किया कि अगर हम उन्हें बरसों फ़ायदा पहुंचाते रहें.
206. फिर उनके पास वह अज़ाब आ जाए, जिनका उनसे वादा किया जा रहा है. 
207. तो क्या वे चीज़ें उनके कुछ काम आएंगी, जिनसे वे लोग फ़ायदा उठा रहे थे. 
208. और हमने किसी बस्ती को उस वक़्त तक हलाक नहीं किया, जब तक उसके बाशिन्दों के पास ख़बरदार करने वाला कोई पैग़म्बर नहीं भेजा.
209. और यह भी नसीहत के लिए किया और हम ज़ुल्म करने वाले हैं.
210. और शैतान इस क़़ुरआन को लेकर नाज़िल नहीं हुए. 
211. और न यह उनके लिए मुनासिब था और वे इसकी ताक़त रखते थे.
212. बेशक शैतान इस कलाम को सुनने से महरूम कर दिए गए.
213. ऐ मेरे बन्दो ! फिर तुम अल्लाह के साथ किसी दूसरे सरपरस्त को मत पुकारना, वरना तुम भी अज़ाब में मुब्तिला लोगों में से हो जाओगे.
214. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम अपने क़रीबी रिश्तेदारों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो. 
215. और तुम अपने शफ़क़त के बाज़ू उन मोमिनों के लिए बिछा दो, जो लोग तुम्हारी पैरवी करते हैं.   
216. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! फिर अगर वे लोग तुम्हारी नाफ़रमानी करें, तो तुम उनसे कह दो कि बेशक मैं उससे बेज़ार हूं, जो कुछ तुम करते हो. 
217. और तुम ग़ालिब व मेहरबान अल्लाह पर भरोसा करो. 
218. वह अल्लाह तुम्हें देखता है, जब तुम तहज्जुद की नमाज़ के लिए खड़े होते हो.
219. और अल्लाह सजदे के दरम्यान तुम्हारा उठना बैठना भी देखता है. 
220. बेशक वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
221. क्या हम तुम्हें बताएं कि शैतान किस पर उतरते हैं.
222. वे झूठे और गुनाहगार लोगों पर उतरते  हैं.
223. जो सुनी सुनाई बातें उनके कानों में डाल देते हैं और उनमें से बहुत से झूठे होते हैं.
224. और शायरों की पैरवी बहके हुए लोग ही किया करते हैं. 
225. क्या तुमने नहीं देखा कि शायर ख़्यालों की वादियों में भटकते फिरते हैं. 
226. और शायर ऐसी बातें कहते हैं, जो वे ख़ुद नहीं करते नहीं.
227. सिवाय उन शायरों के, जो ईमान लाए और नेक अमल करते रहे और कसरत से अल्लाह का ज़िक्र करते रहे. और जब उन पर ज़ुल्म हुआ, तो सिर्फ़ ज़बान से ही बदला लिया. और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया, तो वे अनक़रीब ही जान लेंगे कि वे किस जगह लौटाए जाएंगे.