Monday, September 6, 2021

17 सूरह बनी इस्राईल

सूरह बनी इस्राईल मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 111 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. वह अल्लाह पाक ज़ात है, जो अपने मुक़र्रिब बन्दे को रात में मस्जिदुल हराम यानी ख़ाना ए काबा से मस्जिदुल अक़सा तक ले गया, जिसके अतराफ़ हमने बरकतें नाज़िल की हैं, ताकि हम उसे अपनी क़ुदरत की निशानियां दिखाएं. बेशक वह अल्लाह ख़ूब सुनने वाला ख़ूब देखने वाला है.
2. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम को किताब यानी तौरात अता की और हमने उसे बनी इस्राईल के लिए हिदायत बनाया और उन्हें हुक्म दिया कि तुम हमारे सिवा किसी को अपना वकील मत बनाओ. 
3. ऐ उन लोगों की औलाद, जिन्हें हमने नूह अलैहिस्सलाम के साथ कश्ती में सवार किया था. बेशक नूह अलैहिस्सलाम हमारे बड़े शुक्रगुज़ार बन्दे थे.
4. और हमने किताब यानी तौरात में बनी इस्राईल को इत्तला दे दी थी कि तुम लोग ज़मीन में ज़रूर दो मर्तबा फ़साद फैलाओगे और बड़ी सरकशी करोगे.
5. फिर जब उन दो फ़सादों में पहले का वक़्त आ गया, तो हमने तुम पर अपने ऐसे बन्दे मुसल्लत कर दिए, जो बड़े लड़ने वाले थे. फिर वे लोग तुम्हारी तलाश में तुम्हारे घरों तक में दाख़िल हो गए. और अल्लाह के अज़ाब का यह वादा पूरा होकर रहा.
6. फिर हमने तुम्हें दोबारा उन पर ग़लबा देकर तुम्हारे दिन फेर दिए और माल व औलाद से तुम्हारी मदद की और हमने तुम्हें बड़े लश्कर वाला बना दिया.
7. अगर तुम अच्छे काम करोगे, तो अपने ही हक़ में अच्छा करोगे और अगर तुम बुरे काम करोगे, तो भी अपने लिए ही बुरा करोगे. फिर जब दूसरे वादे का वक़्त आ गया, तो हमने ज़ालिमों को तुम पर मुसल्लत कर दिया, ताकि वे लोग मार-मारकर तुम्हारे चेहरे बिगाड़ दें. और मस्जिदुल अक़सा में उसी तरह दाख़िल हों, जिस तरह   उसमें हमलावर पहली मर्तबा दाख़िल हुए थे. और जिस पर ग़लबा पाएं, उसे तबाह व बर्बाद कर दें.
8. उम्मीद है कि तुम्हारा परवरदिगार तुम पर रहम करे और अगर तुमने फिर वही सरकशी की, तो हम तुम्हें फिर गिरफ़्त में लेंगे और हमने दोज़ख़ को काफ़िरों के लिए ज़िन्दान बना ही रखा है.
9. बेशक यह क़ुरआन उस रास्ते की हिदायत करता है, जो सबसे सीधा है. और जो मोमिन नेक अमल करते हैं, तो यह उन्हें ख़ुशख़बरी देता है कि उनके लिए बहुत बड़ा अज्र है.
10. और यह कि बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते हैं, तो हमने उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है.
11. और इंसान कभी आजिज़ होकर अपने लिए बुराई की दुआ मांगने लगता है, जिस तरह वह अपने लिए भलाई की दुआ मांगता है. और इंसान बड़ा ही जल्दबाज़ है.
12. और हमने रात और दिन को अपनी क़ुदरत की दो निशानियां बनाया है. फिर हमने रात की निशानी को तारीक बनाया और दिन की निशानी को रौशन बनाया, ताकि तुम लोग अपने परवरदिगार का फ़ज़ल यानी रिज़्क़ तलाश कर सको और तुम बरसों का शुमार और हिसाब जान सको. और हमने हर चीज़ को ख़ूब तफ़सील से बयान कर दिया है.
13. और हमने हर इंसान के आमालनामे को उसकी गर्दन में लटका दिया है. और हम उसके लिए क़यामत के दिन यह आमालनामा निकालेंगे, जिसे वह अपने सामने खुली किताब की तरह पाएगा.
14. उस वक़्त उससे कहा जाएगा कि अपने आमालनामे को पढ़ ले. आज अपने हिसाब के लिए तू ख़ुद ही काफ़ी है.
15. जो शख़्स हिदायत हासिल करता है, तो बेशक वह अपने भले के लिए सीधे रास्ते पर चलता है और जो शख़्स गुमराह होता है, तो वह भटक कर अपना ही बुरा करता है. और कोई भी शख़्स किसी दूसरे के गुनाह का बोझ नहीं उठाएगा. और हम उस वक़्त तक किसी को अज़ाब नहीं देते, जब तक उसके पास रसूल भेजकर उसे ख़बरदार नहीं कर देते. 
16. और जब हम किसी बस्ती को हलाक करने का इरादा करते हैं, तो वहां के ख़ुशहाल लोगों को इताअत का हुक्म देते हैं. फिर वे लोग उसकी नाफ़रमानी करते हैं, तो हमारा अज़ाब का क़ौल वाजिब हो जाता है. फिर हम उस बस्ती को पूरी तरह तबाह व बर्बाद कर देते हैं. 
17. और नूह अलैहिस्सलाम के बाद हमने कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम्हारा परवरदिगार काफ़ी है. वह अपने बन्दों के गुनाहों से बड़ा बाख़बर ख़ूब देखने वाला है.
18. और जो शख़्स सिर्फ़ दुनिया की ख़ुशहाली चाहता है, तो हम इसी दुनिया में जिसे चाहते हैं, जितना चाहते हैं, जल्दी दे देते हैं. फिर हमने उसके लिए दोज़ख़ बना दी है, जिसमें वह मज़म्मत व रुसवाई के साथ डाला जाएगा. 
19. और जो शख़्स आख़िरत की ख़ुशहाली चाहता है और उसने इसके लिए कोशिश की और वह मोमिन भी है, तो ऐसे ही लोगों की कोशिशें मशकूर व मक़बूल होंगी.
20. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! हम हर किसी की मदद करते हैं. इस दुनिया को चाहने वाले की भी और आख़िरत चाहने वाले की भी. यह सब तुम्हारे परवरदिगार की अता है और तुम्हारे परवरदिगार की अता किसी के लिए बंद नहीं है.
21. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! देखो कि हमने किस तरह कुछ लोगों को दूसरे लोगों पर फ़ज़ीलत दी है और यक़ीनन आख़िरत के दर्जात और फ़ज़ीलत तो इससे कहीं बढ़कर है.
22. ऐ बन्दे ! अल्लाह के साथ किसी दूसरे को सरपरस्त मत बनाना, वरना तू मलामतज़दा होकर बेबस बैठा रह जाएगा.
23. और तुम्हारे परवरदिगार ने हुक्म दिया है कि तुम अल्लाह के सिवा किसी दूसरे को मत पुकारो और वालिदैन के साथ हुस्ने सुलूक करो. अगर तुम्हारे सामने दोनों में से कोई एक या दोनों ज़ईफ़ हो जाएं, तो उन्हें उफ़्फ़ भी न कहना और न उन्हें झिड़कना और उनके साथ अदब और नरमी से बात करना.
24. और उन दोनों के सामने ख़ाकसारी से पहलू झुकाए रखो और उनके हक़ में दुआ मांगो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! इन दोनों पर रहम कर, जिस तरह इन्होंने बचपन में मुहब्बत व शफ़क़त से मेरी परवरिश की है.
25. तुम्हारा परवरदिगार उन बातों से ख़ूब वाक़िफ़ है, जो तुम्हारे दिलों में है. अगर तुम नेकसीरत हो जाओ, तो बेशक अल्लाह रुजू करने वालों के लिए बड़ा बख़्शने वाला है.
26. और तुम रिश्तेदारों और मिस्कीनों और मुसाफ़िरों को भी उनका हक़ दे दो और फ़ुज़ूल ख़र्च मत किया करो.
27. बेशक फ़ुज़ूल ख़र्च करने वाले शैतान के भाई हैं और शैतान अपने परवरदिगार से बड़ा कुफ़्र करने वाला है.
28. और अगर तुम्हें अपनी तंगदस्ती की वजह से मिस्कीनों से मुंह फेरना पड़े और तुम्हें अपने परवरदिगार की रहमत का इंतज़ार हो, तो उनसे नरमी से अपनी बात कह दिया करो.
29. और न अपने हाथ अपनी गर्दन से बंधे हुए रखो कि किसी को कुछ दो ही नहीं और न बिल्कुल खोल दो कि सब कुछ दे दो कि फिर तुम ख़ुद मलामतज़दा होकर ख़ाली हाथ बैठे रह जाओ.
30. बेशक तुम्हारा परवरदिगार जिसके लिए चाहता है रिज़्क़ कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है तंग कर देता है. बेशक वह अपने बन्दों से बड़ा बाख़बर ख़ूब देखने वाला है.
31. और तुम अपनी औलाद को ग़रीबी के ख़ौफ़ से क़त्ल न करो. हम उन्हें भी रिज़्क़ देते हैं और तुम्हें भी रिज़्क़ देते हैं. बेशक उन्हें क़त्ल करना बहुत सख़्त गुनाह है.
32. और तुम ज़िना के पास भी मत जाना. बेशक यह बड़ी बेहयाई का काम है और बहुत बुरा रास्ता है.
33. और तुम किसी जान को क़त्ल मत करना. अल्लाह ने इसे हराम क़रार दिया है, सिवाय उसके जिसका क़त्ल करना क़ानून के लिहाज़ से जायज़ हो. और जो शख़्स नाहक़ क़त्ल कर दिया गया, तो बेशक हमने उसके वारिस को क़सास यानी ख़ून का बदला लेने का हक़ दिया है. फिर वह क़त्ल करने यानी बदला लेने में ज़्यादती न करे. बेशक उसकी मदद की जाएगी.   
34. और तुम यतीम के माल व दौलत के पास भी न जाओ, सिवाय उस तरीक़े के, जो उसके हक़ में बेहतर हो, यहां तक कि वह जवान हो जाए. और बेशक इस अहद की पूछगछ होगी.
35. और जब कुछ नाप कर देना हो, तो पैमाने को पूरा भर दिया करो और जब तौल कर देना हो, तो बिल्कुल ठीक तराज़ू से तौला करो. यह अच्छा तरीक़ा है और अंजाम के लिहाज़ से भी बेहतर है.
36. ऐ बन्दे ! और तू उस बात की पैरवी न किया कर, जिसका तुझे सही इल्म नहीं है. बेशक क़यामत के दिन कान और आंखें और दिल इनमें से हर एक से पूछगछ होगी. 
37. और तू ज़मीन में अकड़ कर मत चला कर. बेशक तू न ज़मीन को चीर सकता और न बुलंदी में पहाड़ों के बराबर हो सकता है. 
38. इन सब बातों की बुराई तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक नापसंदीदा है.
39. यह हिकमत की उन बातों में से है, जो तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हारे पास वही के ज़रिये भेजी हैं. ऐ बन्दे ! और अल्लाह के साथ कोई दूसरा सरपरस्त न बनाना, वरना तू मलामतज़दा व ज़लील होकर जहन्नुम में डाल दिया जाएगा.
40. ऐ मुशरिको ! क्या तुम्हारे परवरदिगार ने बेटों के लिए तुम्हें चुन लिया है और अपने लिए उसने फ़रिश्तों को बेटियां बना लिया है. बेशक तुम बड़ी सख़्त बात कहते हो.
41. और बेशक हमने इस क़ुरआन में सबकुछ अंदाज़ बदल-बदल कर बयान किया है, ताकि लोग नसीहत हासिल करें. लेकिन इससे उनकी नफ़रत ही मज़ीद बढ़ती जाती है.
42. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अगर अल्लाह के साथ कुछ और भी सरपरस्त होते, जैसा वे लोग कहते हैं, तो वे मिलकर मालिके अर्श तक पहुंचने की कोई राह ज़रूर तलाश लेते. 
43. अल्लाह पाक और आला है, उन बातों से जो वे कहते हैं. वह बहुत ही बुलंद व बालातर है. 
44. सातों आसमान और ज़मीन और जो कुछ इनके दरम्यान है, सब अल्लाह की तस्बीह करते हैं. और कोई शय ऐसी नहीं है, जो उसकी हम्दो सना की तस्बीह न करती हो. लेकिन तुम उनकी तस्बीह को नहीं समझ सकते. बेशक वह बड़ा हलीम बड़ा बख़्शने वाला है.
45. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और जब तुम क़ुरआन पढ़ते हो, तो हम तुम्हारे और उन लोगों के दरम्यान जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते, एक पोशीदा पर्दा डाल देते हैं.
46. और हम उनके कानों पर भी पर्दे डाल देते हैं कि वे उसे समझ न सकें और उनके कानों में बहरापन पैदा कर देते हैं, ताकि वे उसे सुन न सकें. और जब तुम क़ुरआन में अपने परवरदिगार का तन्हा ज़िक्र करते हो, तो वे नफ़रत करते हुए पीठ फेरकर भाग खड़े होते हैं.
47. हम ख़ूब जानते हैं कि वे लोग किस ग़र्ज़ के लिए तुम्हारी तरफ़ कान लगाकर तवज्जो से बातें सुनते हैं और सरगोशियां करते हैं. जब वे ज़ालिम लोग मुसलमानों से कहते हैं कि तुम तो महज़ एक ऐसे बशर की पैरवी करते हो, जिस पर जादू कर दिया गया है.
48. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! देखो कि वे लोग तुम्हारे बारे में कैसी-कैसी मिसालें देते हैं. फिर वे लोग इस तरह गुमराह हुए हैं कि अब वे सीधा रास्ता पा ही नहीं सकते.
49. और वे लोग कहते हैं कि जब हम मरने के बाद बोसीदा हड्डियां और रेज़ा-रेज़ा हो जाएंगे, तो क्या हमें नये सिरे से पैदा करके उठाया जाएगा ? 
50. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि तुम मरने के बाद चाहे पत्थर बन जाओ या लोहा.
51. या कोई और मख़लूक़, जो तुम्हारे गुमान में बड़ी सख़्त हो. फिर वे कहेंगे कि हमें कौन दोबारा ज़िन्दा करेगा. तुम कह दो कि वही अल्लाह, जिसने तुम्हें पहली मर्तबा पैदा किया था. फिर वे लोग तुम्हारे सामने अपने सर हिला देंगे और कहेंगे कि यह कब होगा? तुम कह दो कि शायद क़रीब ही हो जाए.
52. जिस दिन अल्लाह तुम्हें बुलाएगा, तो तुम उसकी हम्दो सना के साथ उसकी तामील करोगे और गुमान करोगे कि तुम दुनिया में बहुत ही कम ठहरे थे.
53. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम मेरे बन्दों से कह दो कि वे अच्छी बातें ही किया करें. बेशक शैतान बुरी बातों से लोगों के दरम्यान फ़साद पैदा कर देता है. बेशक शैतान इंसान का सरीह दुश्मन है.
54. तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे हाल को ख़ूब जानता है. अगर वह चाहे तो तुम पर रहम करे या अगर वह चाहे तो तुम पर अज़ाब नाज़िल कर दे. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और हमने तुम्हें उन लोगों के आमाल का ज़िम्मेदार बनाकर नहीं भेजा है.
55. और तुम्हारा परवरदिगार उन्हें ख़ूब जानता है, जो आसमानों और ज़मीन में आबाद हैं. और बेशक हमने कुछ नबियों को दूसरे नबियों पर फ़ज़ीलत बख़्शी है और हमने दाऊद अलैहिस्सलाम को ज़ुबूर अता की.
56. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि तुम उन सबको बुला लो, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा सरपरस्त गुमान करते हो. फिर वे न तुम्हारी तकलीफ़ दूर नहीं कर सकते हैं और न उसे फेर ही सकते हैं.
57. वे लोग जिन्हें पुकारते हैं, वे ख़ुद अपने परवरदिगार की तरफ़ वसीला तलाश करते हैं कि उनमें से कौन ज़्यादा मुक़र्रिब हैं और वे ख़ुद उसकी रहमत की उम्मीद रखते हैं और वे उसके अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा रहते हैं. बेशक तुम्हारे परवरदिगार का अज़ाब डरने की चीज़ है.
58. और ज़ुल्म करने वाले लोगों की कोई बस्ती ऐसी नहीं है, जिसे क़यामत से पहले हम हलाक नहीं करेंगे या उस पर सख़्त अज़ाब नाज़िल नहीं करेंगे. यह बात किताब यानी लौहे महफ़ूज़ में लिखी हुई है.
59. और हमें निशानियां भेजने से किसी चीज़ ने नहीं रोका, सिवाय इसके कि उन्हें पहले के लोगों ने झुठला दिया था. और हमने सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम समूद को ऊंटनी की खुली निशानी दी थी, तो उन्होंने उस पर ज़ुल्म किया. और हम सिर्फ़ अज़ाब से ख़बरदार करने के लिए ही निशानियां भेजा करते हैं. 
60. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब हमने तुमसे कहा कि बेशक तुम्हारे परवरदिगार ने सब लोगों को अपने अहाते में ले रखा है. और हमने शबे मेराज के उस मंज़र को जो हमने तुम्हें दिखाया, लोगों के लिए आज़माइश बनाया है. और ज़क़्क़ूम के उस शजर को भी, जिस पर क़ुरआन में लानत की गई है. और हम उन्हें ख़बरदार करते हैं, लेकिन इससे उनकी सरकशी मज़ीद बढ़ती ही जाती है.
61. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त याद करो कि जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि तुम आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करो, तो इबलीस के सिवा सबने सजदा किया. उसने कहा कि क्या मैं उसे सजदा करूं, जिसे तूने मिट्टी से बनाया है.  
62. उसने यह भी कहा कि भला देखो तो सही कि यह वह शख़्स है, जिसे तूने मुझ पर फ़ज़ीलत दी है. अगर तू मुझे क़यामत के दिन तक की मोहलत दे, तो मैं कुछ लोगों के सिवा इसकी औलाद को हक़ से काटकर अलग कर दूंगा.
63. अल्लाह ने फ़रमाया कि जा तुझे मोहलत दी. फिर उनमें से जो भी तेरी पैरवी करेगा, तो बेशक जहन्नुम ही तुम सबकी मुकम्मल सज़ा है.
64. और जिस पर भी तेरा बस चले, तो उसे अपनी बातों से बहका ले और उन पर अपने लश्कर के सवार और पैदल दस्तों से हमला कर दे और उनके माल और औलाद में शरीक हो जा और उनसे झूठे वादे कर. और उनसे शैतान फ़रेब के सिवा कोई वादा नहीं कर सकता. 
65. बेशक जो मेरे बन्दे हैं, उन पर तेरा ज़ोर नहीं चल सकेगा और ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम !
तुम्हारा परवरदिगार अपने बन्दों की कारसाज़ी के लिए काफ़ी है.
66. तुम्हारा परवरदिगार वह है, जो तुम्हारे लिए समन्दर और दरिया में जहाज़ और कश्तियां चलाता है, ताकि तुम उसका फ़ज़ल यानी रिज़्क़ तलाश करो. बेशक वह तुम पर बड़ा मेहरबान है.
67. और जब समन्दर व दरिया में तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो वे ग़ायब हो जाते हैं, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो. फिर जब अल्लाह तुम्हें बचाकर ख़ुश्क जगह तक पहुंचा देता है, तो तुम फिर उससे मूंह फेर लेते हो. और इंसान बड़ा ही नाशुक्रा है.
68. फिर क्या तुम इससे बेख़ौफ़ हो गए हो कि वह तुम्हें ख़ुश्की के किनारे यानी ज़मीन में धंसा दे या तुम पर पत्थर बरसाने वाली आंधी भेज दे. फिर तुम अपने लिए कोई कारसाज़ नहीं पाओगे.
69. या तुम इससे बेख़ौफ़ हो गए हो कि वह तुम्हें दोबारा उसी समन्दर व दरिया में ले जाए और तुम पर जहाज़ व कश्तियां तोड़ देने वाली आंधी भेज दे. फिर तुम्हें तुम्हारे कुफ़्र की वजह से ग़र्क़ कर दे. फिर तुम अपने लिए 
ग़र्क़ होने पर ऐसा कोई हिमायती नहीं पाओगे, जो हमारा पीछा करे और तुम्हें छुड़ा ले. 
70. और बेशक हमने आदम अलैहिस्सलाम की औलाद को इज़्ज़त बख़्शी और हमने उन्हें ख़ुश्की और तरी यानी ज़मीन और समन्दर व दरियाओं में जानवरों व कश्तियों के ज़रिये सवारी दी. और हमने उन्हें पाकीज़ा चीज़ों से रिज़्क़ दिया. और हमने उन्हें अपनी बहुत सी मख़लूक़ पर फ़ज़ीलत अता की.
71. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उस दिन को याद करो कि जब हम लोगों के हर तबक़े को उनके इमामों के साथ बुलाएंगे. फिर जिन्हें उनके आमालनामे दायें हाथ में दिए जाएंगे, तो वे लोग ख़ुश होकर अपना आमालनामा पढ़ने लगेंगे और उन पर रेशा बराबर भी ज़ुल्म नहीं किया जाएगा.
72. और जो शख़्स इस दुनिया में हक़ से अंधा बना रहा, तो वह आख़िरत में भी अंधा और निजात की राह से भटका हुआ रहेगा. 
73. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और काफ़िर तो यही चाहते हैं कि तुम्हें क़ुरआन से फेर दें, जिसे हमने तुम्हारे पास वही के ज़रिये भेजा है, ताकि तुम इसके अलावा हम पर झूठी बातें गढ़ लो. और इस सूरत में वे लोग तुम्हें अपना दोस्त बना लें.
74. और अगर हम तुम्हें साबित क़दम न रखते, तो ज़रूर तुम भी अपनी नरम मिज़ाजी की वजह से उनके क़रीब हो जाते.
75. और अगर तुम ऐसा करते, तो उस वक़्त हम तुम्हें दोगुना ज़ायक़ा ज़िन्दगी में और दोगुना विसाल के बाद चखाते. फिर तुम अपने लिए हमारे मुक़ाबले में कोई मददगार नहीं पाते.
76. और वे लोग यह भी चाहते थे कि तुम्हें सरज़मीन मक्का से उखाड़ दें, ताकि वे तुम्हें यहां से निकाल सकें. और अगर ऐसा हो जाता, तो तुम्हारे बाद वे लोग भी वहां कुछ वक़्त से ज़्यादा नहीं ठहर पाते.
77. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उन सब रसूलों के लिए हमारा यही दस्तूर रहा है, जिन्हें हमने तुमसे पहले भेजा था. और तुम हमारे दस्तूर में कोई तबदीली नहीं पाओगे. 
78. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम सूरज ढलने के वक़्त से लेकर रात की तारीकी तक जुहर, अस्र, मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़ा करो और फ़ज्र की नमाज़ के बाद क़ुरआन की तिलावत भी किया करो. बेशक फ़ज्र के वक़्त क़ुरआन की तिलावत में रात और दिन के फ़रिश्ते हाज़िर होते हैं.
79. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और रात के कुछ हिस्से में क़ुरआन के साथ तहज्जुद की नमाज़ पढ़ा करो. यह ख़ास तुम्हारे लिए नफ़ली इबादत है. यक़ीनन तुम्हारा परवरदिगार तुम्हें मक़ामे महमूद पर फ़ाईज़ करेगा. 
80. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम यह दुआ मांगो कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे ख़ुशनूदी के साथ दाख़िल फ़रमा, जहां भी दाख़िल करना चाहे और मुझे ख़ुशनूदी के साथ बाहर ला, जहां से भी लाना चाहे और मुझे अपनी बारगाह से ग़लबा और मदद अता फ़रमा.
81. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम कह दो कि हक़ आ गया और बातिल नाबूद हो गया. बेशक बातिल को मिटना ही था.
82. और हम क़ुरआन में वह सब नाज़िल कर रहे हैं, जो मोमिनों के लिए शिफ़ा और रहमत है और ज़ालिमों के लिए तो यह सिर्फ़ नुक़सान में इज़ाफ़े का ही सबब है.  
83. और जब हम इंसान को कोई नेअमत अता करते हैं, तो वह शुक्र करने की बजाय मुंह फेर कर पहलू बदल लेता है. और जब उसे कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो वह मायूस हो जाता है. 
84. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि हर कोई अपने तरीक़े पर अमल करता है. फिर तुम्हारा परवरदिगार ख़ूब जानता है कि कौन ज़्यादा सीधे रास्ते पर है. 
85. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और लोग तुमसे रूह के बारे में सवाल करते हैं, तुम कह दो कि रूह भी मेरे परदिगार के हुक्म से ही बनी है और तुम लोगों को बहुत ही थोड़ा सा इल्म दिया गया है.
86. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और अगर हम चाहें, तो जो क़ुरआन वही के ज़रिये तुम्हारी तरफ़ भेजा गया है, उसे दुनिया से उठा लें. फिर तुम इसके ले जाने पर हमारी बारगाह में कोई कारसाज़ नहीं पाओगे.
87. लेकिन यह तो तुम्हारे परवरदिगार की रहमत है कि उसने इसे क़ायम रखा. बेशक यह तुम पर अल्लाह का बहुत बड़ा फ़ज़ल है.
88. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अगर तमाम इंसान और जिन्न इस बात पर जमा हो जाएं कि वे इस क़ुरआन जैसा कोई और कलाम बनाकर ले आएं, तब भी वे इस जैसा कलाम नहीं ला सकते. अगरचे वे एक दूसरे की कितनी ही मदद करें. 
89. और बेशक हमने लोगों के समझाने के लिए हर तरह की मिसालें बदल-बदल कर बार-बार बयान की हैं, लेकिन बहुत से लोगों ने इसे क़ुबूल नहीं किया. वे कुफ़्र के अलावा कुछ नहीं करते. 
90. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! वे काफ़िर तुमसे कहते हैं कि हम तुम पर हरगिज़ ईमान नहीं लाएंगे, यहां तक कि तुम हमारे लिए ज़मीन से कोई चश्मा ही जारी कर दो. 
91. या तुम्हारे पास खजूरों और अंगूरों का कोई बाग़ हो, तो तुम उसके दरम्यान बहती हुई नहरें ही जारी कर दो. 
92. या जैसा कि तुम्हारा ख़्याल है कि हम पर आसमान के चन्द टुकड़े ही गिरा दो या तुम अल्लाह और फ़रिश्तों को हमारे सामने ले आओ.
93. या तुम्हारा कोई सोने का घर हो या तुम आसमान पर चढ़ जाओ. फिर भी हम तुम्हारे आसमान पर चढ़ जाने पर हरगिज़ ईमान नहीं लाएंगे, यहां तक कि तुम वहां से हमारे ऊपर किताब ही नाज़िल कर दो, जिसे हम ख़ुद पढ़ सकें. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरा परवरदिगार पाक है, लेकिन मैं तो सिर्फ़ एक बशर हूं और अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूं.  
94. और जब उन लोगों के पास हिदायत आ गई, तो उन्हें ईमान लाने से इसके सिवा किसी ने नहीं रोका कि वे कहने लगे कि क्या अल्लाह ने एक बशर को रसूल बनाकर भेजा है.
95. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अगर ज़मीन में इंसानों की बजाय फ़रिश्ते इत्मीनान से चलते फिरते, तो ज़रूर हम भी उन पर आसमान से किसी फ़रिश्ते को ही रसूल बनाकर उतारते.
96. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरम्यान अल्लाह ही गवाही के लिए काफ़ी है. बेशक वह अपने बन्दों से बड़ा बाख़बर ख़ूब देखने वाला है.
97. और अल्लाह जिसे हिदायत दे, तो वही हिदायत याफ़्ता है और जिसे वह गुमराही में छोड़ दे, तो वह उसके सिवा किसी को अपना मददगार नहीं पाएगा. और हम उन्हें क़यामत के दिन औंधे मुंह उठाएंगे और वे अंधे और गूंगे और बहरे होंगे. उनका ठिकाना जहन्नुम है. जब भी उसकी आग बुझने लगेगी, तो हम उन लोगों को अज़ाब देने के लिए उसे और भड़का देंगे.
98. यह उन लोगों की सज़ा है, क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों से कुफ़्र किया और वे कहते रहे कि जब हम मरने के बाद बोसीदा हड्डियां और रेज़ा-रेज़ा हो जाएंगे, तो क्या हम नये सिरे से पैदा करके उठाए जाएंगे.
99. क्या उन लोगों ने नहीं देखा कि जिस अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन की तख़लीक़ की है, वह इस पर भी क़ादिर है कि वे उन्हें दोबारा पैदा करे और उसने उनके लिए एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया है, जिसमें कोई शक नहीं है. फिर भी ज़ालिमों ने इसे क़ुबूल नहीं किया. वे कुफ़्र के अलावा कुछ नहीं करते.
100. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अगर तुम मेरे परवरदिगार की रहमत के ख़ज़ानों के मालिक होते तब भी ख़र्च हो जाने के ख़ौफ़ से उन्हें बंद रखते. और इंसान बहुत ही तंग दिल है.
101. और बेशक हमने मूसा अलैहिस्सलाम को वाज़ेह निशानियां दीं, तो ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम बनी इस्राईल से दरयाफ़्त करो कि जब मूसा अलैहिस्सलाम उनके पास आए, तो फ़िरऔन ने उनसे कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! बेशक मैं तो यही गुमान करता हूं कि तुम पर जादू किया गया है.
102. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि तू यह जानता है कि इन निशानियों को किसी और ने नहीं उतारा, बल्कि ये आसमानों और ज़मीन के परवरदिगार ने नाज़िल की हैं. और मैं तो यही ख़्याल करता हूं कि ऐ फ़िरऔन ! तू हलाक होने वाला है. 
03. फिर फ़िरऔन ने इरादा किया कि मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम बनी इस्राईल को मिस्र की सरज़मीन से निकाल कर बाहर कर दे. फिर हमने फ़िरऔन और उसके साथियों को ग़र्क़ कर दिया. 
104. और हमने उसके बाद बनी इस्राईल से कहा कि अब तुम इस सरज़मीन में आबाद हो जाओ. फिर जब आख़िरत के वादे का वक़्त आएगा, तो हम तुम सबको जमा करके ले जाएंगे.
105. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और हक़ के साथ ही हमने इस क़ुरआन को नाज़िल किया है. और हमने तुम्हें जन्नत की ख़ुशख़बरी देने वाला और अज़ाब से ख़बरदार करने वाला रसूल बनाकर भेजा है.
106. और क़ुरआन को हमने जुदा-जुदा हिस्से में नाज़िल किया है, ताकि तुम उसे लोगों के सामने ठहर-ठहर कर पढ़ो और हमने इसे रफ़्ता-रफ़्ता हालात के हिसाब से नाज़िल किया है. 
107. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि तुम इस क़ुरआन पर ईमान लाओ या न लाओ. बेशक जिन लोगों को इससे पहले आसमानी किताबों का इल्म अता किया गया है, जब यह क़ुरआन उनके सामने पढ़ा जाता है, तो वे ठुड्डियों के बल सजदे में गिर पड़ते हैं.
108. और वे लोग कहते हैं कि हमारा परवरदिगार पाक है. बेशक हमारे परवरदिगार का वादा पूरा होना ही था.
109. और वे लोग ठुड्डियों के बल सजदे में गिर पड़ते हैं और ज़ारो क़तार रोते चले जाते हैं. और क़ुरआन उनकी आजिज़ी में मज़ीद इज़ाफ़ा करता है.
110. ऐ मेरे महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि चाहे तुम अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर पुकारो. तुम जिस नाम से भी अल्लाह को पुकारते हो, सब अच्छे नाम उसी के हैं. और न अपनी नमाज़ बहुत बुलंद आवाज़ में पढ़ो और न बहुत ही आहिस्ता से पढ़ो, बल्कि इसके दरम्यान का तरीक़ा इख़्तियार करो यानी दरमियानी आवाज़ में पढ़ो. 
111. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम कह दो कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं. जिसने न अपने लिए कोई औलाद बनाई और न उसकी सल्तनत व फ़रमानरवाई में कोई शरीक है और न कमज़ोरी की वजह से उसका कोई मददगार है. तुम उसकी बड़ाई करते रहा करो, जैसे उसका हक़ है.

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