Monday, September 13, 2021

10 सूरह यूनुस

सूरह यूनुस मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 109 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. अलिफ़ लाम रा. ये हिकमत वाली किताब की आयतें हैं.
2. क्या लोगों को इस बात पर ताज्जुब हुआ कि हमने उन्हीं में से एक मर्द की तरफ़ वही भेजी कि तुम लोगों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो और ईमान लाने वालों को ख़ुशख़बरी दो कि उनके लिए उनके परवरदिगार की बारगाह में बुलंद दर्जात हैं. काफ़िर कहने लगे कि बेशक ये शख़्स सरीह जादूगर है.
3. बेशक तुम्हारा परवरदिगार अल्लाह है, जिसने आसमानों और ज़मीन की छह दिन में तख़लीक़ की. फिर उसने अर्श पर अपना इख़्तेदार क़ायम किया. वही हर काम की तदबीर करता है. उसकी इजाज़त के बग़ैर कोई किसी की सिफ़ारिश नहीं कर सकता. वही अल्लाह तुम्हारा परवरदिगार है. फिर तुम उसी की इबादत करो. क्या फिर भी तुम ग़ौर व फ़िक्र नहीं करते.
4. ऐ लोगो ! तुम सबको उसकी तरफ़ ही लौटना है. अल्लाह का वादा बरहक़ है. बेशक वही मख़लूक़ को पहली मर्तबा पैदा करता है. फिर वही मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा करेगा, ताकि जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, उन्हें इंसाफ़ के साथ जज़ा दे. और कुफ़्र करने वाले लोगों के लिए खौलता हुआ पानी और दर्दनाक अज़ाब है, क्योंकि वे अल्लाह से कुफ़्र करते थे. 
5. वह अल्लाह ही है, जिसने सूरज को रौशन और चांद को नूर बनाया और उसके लिए मंज़िलें मुक़र्रर कीं, ताकि तुम लोग बरसों का शुमार और हिसाब जान लो. अल्लाह ने सबकुछ हक़ के साथ पैदा किया है. वह उन लोगों के लिए अपनी आयतें वाज़ेह तौर पर बयान फ़रमाता है, जो इल्म वाले हैं. 
6. बेशक रात और दिन के आने जाने में और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में पैदा किया है, उन सबमें परहेज़गारों के लिए अल्लाह की क़ुदरत की बहुत सी निशानियां हैं.
7. बेशक जो लोग हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते और दुनियावी ज़िन्दगी से ख़ुश हैं और उसी से मुतमईन हैं और हमारी निशानियों से ग़ाफ़िल हैं.  
8. यही वे लोग हैं, जिनका ठिकाना दोज़ख़ है. यह उन आमाल का बदला है, जो वे करते रहे हैं. 
9. बेशक जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे, उन्हें उनका परवरदिगार उनके ईमान की वजह से जन्नत का रास्ता दिखाएगा, जिसमें नेअमतों से सराबोर बाग़ों के नीचे नहरी बहती होंगी.   
10. जन्नत में उनकी यह दुआ होगी कि ऐ अल्लाह तू पाक है और उसमें उनकी बाहमी मुलाक़ात की दुआ सलाम होगा. और उनकी आख़िरी दुआ यह होगी कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है.
11. और अगर अल्लाह उन लोगों को बुराई यानी अज़ाब पहुंचाने में जल्दी करता, जैसे वे लोग भलाई के लिए जल्दी करते हैं, तो उनकी उम्र कब की ख़त्म हो जाती. यानी वे मरने के बाद दोज़ख़ में चले जाते. बल्कि हम ऐसे लोगों को जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, उन्हें सरकशी में छोड़ देते हैं कि वे भटकते फिरें.   
12. और जब इंसान को कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो वह अपने पहलू पर लेटे हुए या बैठे हुए या खड़े होकर हमें पुकारता है. फिर जब हम उससे उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं, तो हमें भूलकर ऐसे चल देता है, गोया उसने हमें पुकारा ही नहीं था, जब उसे कोई तकलीफ़ पहुंची थी. इसी तरह हद से बढ़ जाने वाले लोगों के लिए उनके बुरे आमाल अच्छे करके दिखाए गए हैं, जो वे किया करते थे.  
13. और हमने तुमसे पहले भी कितनी ही क़ौमों को हलाक कर दिया, जब उन्होंने ज़ुल्म किया. और उनके रसूल उनके पास वाज़ेह निशानियां लेकर आए, लेकिन वे लोग ऐसे नहीं थे कि ईमान लाते. इसी तरह हम गुनाहगार क़ौम को सज़ा बदला दिया करते हैं.  
14. फिर हमने उनके बाद तुम्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया, ताकि हम देखें कि तुम कैसे अमल करते हो.
15. और जब उन लोगों के सामने हमारी रौशन आयतें पढ़ीं जाती हैं, तो जो लोग हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, वे कहते हैं कि इस क़ुरआन के अलावा कोई दूसरा क़ुरआन ले आओ या इसे बदल दो. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मुझे इख़्तियार नहीं है कि मैं इसे अपनी तरफ़ से बदल दूं. मैं तो सिर्फ़ उसी की पैरवी करता हूं, जो वही मेरे पास आती है. अगर मैं अपने परवरदिगार की नाफ़रमानी करूं, तो बेशक मुझे बड़े सख़्त दिन के अज़ाब का ख़ौफ़ है.
16. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह चाहता तो न मैं इस क़ुरआन को तुम्हारे सामने पढ़ता और न वह तुम्हें इससे आगाह करता. बेशक मैं इससे पहले उम्र का एक हिस्सा तुम्हारे दरम्यान गुज़ार चुका हूं. क्या फिर भी तुम नहीं समझते.
17. फिर उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधे या उसकी आयतों को झुठला दे. 
बेशक गुनाहगार कभी कामयाब नहीं होते. 
18. और वे लोग अल्लाह के सिवा उन्हें पुकारते हैं, जो न उन्हें नुक़सान पहुंचा सकते हैं और न नफ़ा दे सकते हैं. और वे कहते हैं कि ये सब अल्लाह की बारगाह में हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि तुम अल्लाह को उन मनगढ़ंत चीज़ों से आगाह कर रहे हो, जिसके वजूद को वह न आसमानों में जानता है औ न ज़मीन में. अल्लाह पाक है और आला है उन सब चीज़ों से, जिन्हें तुम उसका शरीक ठहराते हो.     
19. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और सब लोग पहले एक ही उम्मत थे. फिर इख़्तिलाफ़ करके जुदा हो गए. और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से क़यामत की बात पहले से तय न होती, तो उनके दरम्यान उन बातों के बारे में फ़ैसला कर जाता, जिनमें वे लोग इख़्तिलाफ़ किया करते हैं.
20. और वे लोग कहते हैं कि इन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर उनके परवरदिगार की तरफ़ से कोई निशानी नाज़िल क्यों नहीं की गई. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ग़ैब तो सिर्फ़ अल्लाह ही के इख़्तियार में है. फिर तुम इंतज़ार करो और मैं भी तुम्हारे साथ इंतज़ार करने वालों में से हूं.
21. और जब हम लोगों को तकलीफ़ पहुंचने के बाद अपनी रहमत का ज़ायक़ा चखाते हैं, तो वे फ़ौरन हमारा अहसान भूलकर में हमारी आयतों के बारे में मक्कारियां करने लगते हैं. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह तुमसे ज़्यादा तदबीर करने वाला है. बेशक हमारे फ़रिश्ते वे सब लिखते जाते हैं, जो फ़रेब तुम किया करते हो. 
22. वह अल्लाह ही है, जो तुम्हें ख़ुश्क ज़मीन और समन्दर व दरिया में चलाता फिराता है, यहां तक कि जब तुम कश्तियों में सवार होते हो और वे कश्तियां लोगों को लेकर मुवाफ़िक़ हवा के झोंकों से चलती हैं और वे उससे ख़ुश होते हैं, तो अचानक उन्हें तेज़ हवा का झोंका घेर लेता है और हर तरफ़ से मौजें भी घेर लेती हैं. और वे लोग जान लेते हैं कि अब वे घिर चुके हैं और वे अपने ख़ालिस अक़ीदे से अल्लाह को पुकारने लगते हैं कि ऐ अल्लाह ! अगर तूने हमें इससे निजात दी, तो हम ज़रूर तेरे शुक्रगुज़ार बन्दों में से हो जाएंगे. 
23. फिर जब अल्लाह ने उन्हें निजात दे दी, तो वे लोग ज़मीन पर क़दम रखते ही फ़ौरन नाहक़ सरकशी करने लगते हैं. ऐ लोगो ! तुम्हारी सरकशी का वबाल तुम्हारी ख़ुद की जानों पर है. तुम दुनियावी ज़िन्दगी का फ़ायदा उठा लो. फिर तुम्हें हमारी तरफ़ ही लौटना है. फिर हम तुम्हें उससे आगाह कर देंगे, जो कुछ तुम किया करते थे. 
24. बस दुनियावी ज़िन्दगी की मिसाल उस पानी की मानिन्द है, जिसे हमने आसमान से बरसाया. फिर उससे ज़मीन ख़ूब सब्ज़ व घनी हो गई, जिसमें से इंसान और चौपाये खाते हैं. यहां तक कि जब ज़मीन की रौनक़ और हुस्न अपने शबाब पर आ गया और वह ख़ूब आरास्ता हो गई और उसके बाशिन्दों ने गुमान कर लिया कि अब हम उस पर पूरी क़ुदरत रखते हैं. फिर रात या दिन में हमारा अज़ाब का हुक्म आ गया, तो हमने उसे यूं जड़ से कटा हुआ बना दिया, गोया वह कल यहां तक थी ही नहीं. इसी तरह हम उन लोगों के लिए अपनी निशानियां वाज़ेह तौर पर बयान करते हैं, जो ग़ौर व फ़िक्र किया करते हैं. 
25. और अल्लाह सलामती के घर यानी जन्नत की तरफ़ बुलाता है और जिसे चाहता है सीधे रास्ते की हिदायत दे देता है.
26. जो लोग दुनिया में अच्छे काम करते हैं, उनके लिए आख़िरत में भी अच्छा अज्र है, बल्कि बहुत ज़्यादा है. और न उनके चेहरों पर स्याही छाई होगी और न ज़िल्लत व रुसवाई होगी. यही असहाबे जन्नत हैं, जो उसमें हमेशा रहेंगे. 
27. और जो लोग बुराई कमाते हैं, उनके लिए बुराई का बदला भी वैसा ही होगा. और उन पर रुसवाई छाई होगी. उनके लिए अल्लाह के अज़ाब से कोई भी बचाने वाला नहीं होगा. गोया उनके चेहरे अंधेरी रात के टुकड़ों से ढक दिए गए हैं. यही असहाबे दोज़ख़ हैं, जो उसमें हमेशा रहेंगे.
28. जिस दिन हम सबको जमा करेंगे. फिर हम शिर्क करने वाले लोगों से कहेंगे कि तुम और तुम्हारे शरीक अपनी जगह ठहरो. फिर हम उनके दरम्यान फूट डाल देंगे और उनके शरीक उनसे कहेंगे कि तुम हमें तो नहीं पुकारते थे.
29. फिर हमारे और तुम्हारे दरम्यान अल्लाह ही गवाह काफ़ी है कि हम तुम्हारे पुकारने से बेख़बर थे. 
30. क़यामत के दिन हर शख़्स उन आमाल की हक़ीक़त को जान लेगा, जो उसने आगे भेजे थे. और वे सब अल्लाह की तरफ़ लौटाए जाएंगे, जो उनका हक़ीक़ी मौला है. और उनसे वह सब गुम हो जाएगा, जो झूठे बोहतान बांधा वे करते थे. 
31. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनसे कह दो कि तुम्हें आसमान और ज़मीन से रिज़्क़ कौन देता है या तुम्हारे कान और तुम्हारी आंखों का कौन मालिक है और ज़िन्दा को मुर्दे से कौन निकालता है और मुर्दे को ज़िन्दा से कौन निकालता है. और हर काम की तदबीर कौन करता है, तो वे लोग फ़ौरन कह देंगे कि अल्लाह. फिर तुम कह दो कि तो क्या तुम फिर भी अल्लाह से नहीं डरते. 
32. फिर वही अल्लाह तुम्हारा सच्चा परवरदिगार है. फिर हक़ के बाद सिवाय गुमराही के क्या रह जाता है. फिर तुम कहां भटक रहे हो.
33. इसी तरह तुम्हारे परवरदिगार का कलाम नाफ़रमानी करने वाले लोगों पर साबित होकर रहा कि वे हरगिज़ ईमान नहीं लाएंगे. 
34. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उनसे दरयाफ़्त करो कि तुम्हारे बनाए हुए शरीकों में कोई ऐसा भी है, जो मख़लूक़ को पहली बार पैदा करे. फिर मरने के बाद उसे दोबारा ज़िन्दा करके लौटाए. तुम कह दो कि अल्लाह ही पहली बार पैदा करता है. फिर वही दोबारा ज़िन्दा करेगा. फिर तुम कहां भटक रहे हो. 
35. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उनसे दरयाफ़्त करो कि क्या तुम्हारे बनाए हुए शरीकों में कोई ऐसा भी है, जो हक़ की तरफ़ रहनुमाई कर सके. तुम कह दो कि अल्लाह ही दीने हक़ की राह दिखाता है. तो क्या जो हक़ की राह दिखाए, वह ज़्यादा मुस्तहक़ है कि उसकी पैरवी की जाए या वह जो ख़ुद ही रास्ता नहीं पा सकता, जबकि उसे रास्ता दिखाया जाए. फिर तुम्हें क्या हो गया है कि तुम कैसे फ़ैसले करते हो.  
36. और उनमें से बहुत से लोग सिर्फ़ गुमान की पैरवी करते हैं. बेशक गुमान हक़ के मुक़ाबले में कुछ भी काम नहीं आता. बेशक अल्लाह उससे ख़ूब वाक़िफ़ है, जो कुछ वे लोग किया करते हैं. 
37. और क़ुरआन ऐसा नहीं है कि उसे अल्लाह के सिवा कोई अपनी तरफ़ गढ़ ले. लेकिन यह उन किताबों की तसदीक़ करने वाला है, जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी हैं और यह उनकी तफ़सील है. इसमें कोई शक नहीं कि यह तमाम आलमों के परवरदिगार की तरफ़ से है. 
38. क्या वे लोग ये कहते हैं कि इस क़ुरआन को रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ख़ुद ही गढ़ लिया है. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि फिर तुम इस जैसी कोई एक ही सूरत ले आओ और अपनी मदद के लिए अल्लाह के सिवा जिन्हें तुम बुला सकते हो, बुला लो. अगर तुम सच्चे हो.
39. बल्कि वे लोग उस कलाम को झुठला रहे हैं, जिसके इल्म का अहाता भी नहीं कर सके थे और अभी उसकी हक़ीक़त भी उनके सामने खुलकर नहीं आई थी. इसी तरह उन लोगों ने भी हक़ को झुठलाया था, जो उनसे पहले गुज़रे हैं. फिर तुम देखो कि ज़ालिमों का क्या अंजाम हुआ. 
40. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उनमें से कुछ लोग इस क़ुरआन पर ईमान लाएंगे हैं और उन्हीं में से कुछ ईमान नहीं लाएंगे. और तुम्हारा परवरदिगार फ़साद फैलाने वालों से ख़ूब वाक़िफ़ है.     
41. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! अगर वे लोग तुम्हें झुठलाएं, तो तुम कह दो कि मेरे अमल मेरे लिए हैं और तुम्हारे अमल तुम्हारे लिए हैं. और तुम उन आमाल से बरी ज़िम्मा हो, जो मैं करता हूं और मैं उससे बरी ज़िम्मा हूं, जो कुछ तुम करते हो.  
42. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जो ज़ाहिरी तौर पर तुम्हारी तरफ़ कान लगाए रहते हैं. तो क्या तुम बहरों को सुना दोगे, अगरचे वे कुछ भी न समझते हों.
43. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उनमें से कुछ लोग ऐसे हैं, जो आपकी तरफ़ देखते हैं. क्या तुम अंधों को राह दिखा दोगे, अगरचे वे कुछ भी न देख पाते हों.   
44. बेशक अल्लाह लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता, लेकिन लोग ख़ुद ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं. 
45. और जिस दिन अल्लाह लोगों को जमा करेगा गोया वे गुमान करेंगे कि वे दिन की एक घड़ी भर ही दुनिया में ठहरे थे. वे एक दूसरे को पहचानेंगे. बेशक वे लोग नुक़सान में हैं, जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झुठलाया था और वे हिदायत नहीं पा सके. 
46. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और अगर हम तुम्हें उस अज़ाब का कुछ हिस्सा दुनिया में ही दिखा दें, जिसका हम उन लोगों से वादा करते हैं या उससे पहले तुम्हें उठा लें, तब भी उन्हें हमारी तरफ़ ही लौटना है. फिर अल्लाह ख़ुद उसका गवाह है, जो कुछ वे लोग किया करते हैं. 
47. और हर उम्मत के लिए एक रसूल आता रहा है. फिर जब उनका रसूल वाज़ेह निशानियों के साथ आया, तब भी वे लोग नहीं माने. फिर उनके दरम्यान इंसाफ़ के साथ फ़ैसला कर दिया गया. और क़यामत के दिन भी उन पर कोई ज़ुल्म नहीं किया जाएगा.
48. और वे लोग कहते हैं कि अज़ाब का वादा कब पूरा होगा ? अगर तुम सच्चे हो.
49. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मैं ख़ुद अपने लिए न किसी नुक़सान का मालिक हूं और न नफ़े का. लेकिन वही होता है, जो अल्लाह चाहता है. हर उम्मत के लिए एक वक़्त मुक़र्रर है. जब उनका वक़्त आ जाता है, तो वे न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं.
50. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि भला देखो कि अगर तुम पर उसका अज़ाब रात में या दिन में आ जाए, तो तुम क्या कर लोगे? क्या बात है कि गुनाहगार उसके लिए जल्दी कर रहे हैं.
51. फिर क्या जब अज़ाब आ जाएगा, तब तुम ईमान लाओगे. अब तुम्हें यक़ीन आया. तुम इसके लिए ही जल्दी किया करते थे. 
52. फिर क़यामत के दिन ज़ुल्म करने वाले लोगों से कहा जाएगा कि तुम दाइमी अज़ाब का ज़ायक़ा चखो. तुम्हें उसी की जज़ा दी जा रही है, जो कुछ तुम किया करते थे. 

53. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वे लोग तुमसे दरयाफ़्त करते हैं कि क्या अज़ाब की बात सच है. तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार की क़सम बेशक वह बरहक़ है और तुम अल्लाह को आजिज़ नहीं कर सकते.
54. और अगर हर ज़ुल्म करने वाले को ज़मीन के सारे ख़जाने मिल जाएं, तो वह अपनी जान बचाने के लिए उसे अज़ाब के बदले में दे देगा. जब लोग अज़ाब को देख लेंगे, तो अपनी पशेमानी छुपाये फिरेंगे और उनके दरम्यान इंसाफ़ के साथ फ़ैसला कर दिया जाएगा और उन पर कोई ज़ुल्म नहीं होगा.  
55. जान लो कि जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, सब अल्लाह ही का है. याद रखो कि बेशक अल्लाह का वादा बरहक़ है, लेकिन उनमें से बहुत से लोग नहीं जानते. 
56. अल्लाह ही ज़िन्दगी बख़्शता है और वही मौत देता है और तुम्हें उसकी तरफ़ ही लौटना है. 
57. ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से नसीहत और उन बीमारियों की शिफ़ा आ गई है, जो दिलों में पोशीदा हैं. और यह मोमिनों के लिए हिदायत और रहमत है. 
58. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि यह सब अल्लाह के फ़ज़ल और उसकी रहमत से तुम्हें  मिला है. इसलिए उन लोगों को इस पर ख़ुश होना चाहिए, यह उससे कहीं बेहतर है, जो कुछ वे लोग जमा करते हैं. 
59. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि भला देखो कि अल्लाह ने जो रिज़्क़ तुम्हारे लिए नाज़िल किया है, तुमने उसमें में से कुछ चीज़ों को हराम और कुछ को हलाल क़रार दे दिया. तुम कह दो कि क्या अल्लाह ने तुम्हें हुक्म दिया है या तुम अल्लाह पर झूठे बोहतान बांध रहे हो.
60. और उन लोगों का क़यामत के दिन के बारे में क्या गुमान है, जो अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधते हैं. बेशक अल्लाह लोगों पर बड़ा फ़ज़ल करने वाला है, लेकिन उनमें से बहुत से लोग उसके शुक्रगुज़ार नहीं हैं.
61. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम किसी भी हाल में हो और क़ुरआन के किसी भी हिस्से की तिलावत करते हो और ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उम्मत ! तुम कोई भी अमल करते हो. हम उस वक़्त भी तुम पर गवाह होते हैं, जब तुम उसमें मशग़ूल होते हो. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम्हारे परवरदिगार से एक ज़र्रा बराबर भी कोई चीज़ न ज़मीन में पोशीदा है और न आसमान में. न उस ज़र्रे से कोई छोटी चीज़ है और न बड़ी. लेकिन हर चीज़ रौशन किताब यानी लौहे महफ़ूज़ में दर्ज है.  
62. जान लो कि बेशक अल्लाह के औलिया न ख़ौफ़ज़दा होंगे और न वे ग़मगीन होंगे.  
63. यही वे लोग हैं, जो ईमान लाए और अल्लाह से डरते रहे. 
64. उनके लिए दुनिया की ज़िन्दगी में भी इज़्ज़त और मक़बूलियत की बशारत है और आख़िरत में भी मग़फ़िरत और शफ़ाअत की ख़ुशख़बरी है. और अल्लाह के कलमात बदला नहीं करते. और यही वह अज़ीम कामयाबी है.
65. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! उन काफ़िरों की बातें तुम्हें ग़मगीन न कर दें. बेशक सब इज़्ज़त और ग़ुलबा अल्लाह ही के लिए है. वह ख़ूब सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
66. जान लो कि बेशक जो मख़लूक़ आसमानों और ज़मीन में हैं, सब अल्लाह ही की पैरवी करती है. जो लोग अल्लाह के सिवा दूसरों को पुकारते हैं, वे हक़ीक़त में अपने शरीकों के पीछे भी नहीं चलते, बल्कि वे अपने गुमान पर चलते हैं और वह सिर्फ़ ग़लत अंदाज़े लगाते हैं.
67. वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हारे लिए रात बनाई, ताकि तुम उसमें आराम करो और दिन को रौशन बनाया, ताकि तुम काम करो. बेशक इसमें उस क़ौम के लिए अल्लाह की क़ुदरत की बहुत सी निशानियां हैं, जो ग़ौर से सुनती है. 
68. वे लोग कहते हैं कि अल्लाह ने अपने लिए बेटा बना लिया है. हालांकि वह उससे पाक है. वह बेनियाज़ है. 
जो कुछ आसमानों और जो कुछ ज़मीन में है, सब उसी का है. तुम्हारे पास इसकी कोई दलील नहीं है. क्या तुम अल्लाह के बारे में वह बात कहते हो, जो तुम ख़ुद भी नहीं जानते. 
69. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि बेशक जो लोग अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधते हैं, वे कभी कामयाब नहीं होंगे. 
70. यह दुनिया का कुछ दिन का आराम है. फिर उन्हें हमारी तरफ़ ही लौटना है. फिर हम उन्हें सख़्त अज़ाब का ज़ायक़ा चखाएंगे उसके बदले में जो कुफ़्र वे लोग किया करते थे.  
71. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उनसे नूह अलैहिस्सलाम का क़िस्सा बयान करो. जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अगर तुम्हें मेरा रहना और अल्लाह की आयतों के साथ नसीहत करना नागवार गुज़र रहा है, तो जान लो कि मैंने सिर्फ़ अल्लाह ही पर भरोसा किया है. फिर तुम मेरे ख़िलाफ़ अपनी तदबीर मुक़र्रर कर लो और अपने मनगढ़ंत शरीकों को भी बुला लो. फिर तुम्हारी तदबीर की कोई बात पोशीदा न रहे. फिर मेरे साथ जो चाहे, कर गुज़रो और मुझे कोई मोहलत भी न दो.
72. फिर अगर तुमने मेरी नसीहत से मुंह फेर लिया, तो मैं तुमसे कोई उजरत नहीं चाहता. मेरा अज्र तो सिर्फ़ अल्लाह के ज़िम्मे है और मुझे यह हुक्म दिया गया है कि मैं उसके फ़रमाबरदार बन्दों में से हो जाऊं.
73. फिर उन लोगों ने नूह अलैहिस्सलाम को झुठला दिया, तो हमने उन्हें और उनके साथ कश्ती में सवार लोगों को निजात दी और हमने उन्हें ज़मीन में ख़लीफ़ा बनाया और हमने उन लोगों को ग़र्क़ कर दिया, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था. फिर तुम देखो कि उन लोगों का क्या अंजाम हुआ, जिन्हें ख़बरदार किया गया था. 
74. फिर हमने नूह अलैहिस्सलाम के बाद कई रसूलों को उनकी क़ौमों की तरफ़ भेजा. फिर वे रसूल उनके पास वाजे़ह निशानियां लेकर आए. फिर वे लोग भी ऐसे न हुए कि उस बात पर ईमान ले आते, जिसे वे पहले झुठला चुके थे. इसी तरह हम हद से गुज़र जाने वाले लोगों के दिलों पर मुहर लगा दिया करते हैं.  
75. फिर हमने उनके बाद मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन और उसकी क़ौम के सरदारों की तरफ़ अपनी निशानियों के साथ भेजा, तो उन्होंने तकब्बुर किया. और वह गुनाहगार क़ौम थी. 
76. फिर जब उन लोगों के पास हमारी तरफ़ से हक़ आया, तो वे कहने लगे कि बेशक यह तो सरीही जादू है.
77. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या तुम हक़ के बारे में ऐसी बात कह रहे हो, जबकि वह तुम्हारे पास आ चुका है. क्या यह जादू है और जादूगर कभी कामयाब नहीं होते. 
78. वे लोग कहने लगे कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि तुम हमें उस तरीक़े से फेर दो, जिस पर हमने अपने बाप दादाओं को पाया और ज़मीन में तुम दोनों की बड़ाई हो और हम तुम दोनों पर ईमान लाने वाले नहीं हैं. 
79. और फ़िरऔन ने कहा कि मेरे पास हर माहिर जादूगर को लाओ. 
80. फिर जब जादूगर आ गए, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि तुम फेंक दो, जो कुछ तुम फेंकना चाहते हो.
81. फिर जब उन जादूगरों ने अपनी रस्सियां और छड़ियां सांप बनाकर फेंक दीं, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि जो कुछ तुम लाए हो, वह जादू है. बेशक अल्लाह इसे बातिल कर देगा. बेशक अल्लाह मुफ़सिदों के काम को दुरुस्त नहीं करता. 
82. और अल्लाह अपने कलमात से हक़ का हक़ होना साबित करता है. अगरचे गुनाहगारों को कितना ही नागवार गुज़रे.
83. फिर मूसा अलैहिस्सलाम पर उनकी क़ौम के चन्द नौजवानों के सिवा कोई ईमान नहीं लाया. फ़िरऔन
और उसकी क़ौम के सरदारों के ख़ौफ़ से कि कहीं वह उन्हें किसी मुसीबत में मुब्तिला न कर दे. और बेशक  फ़िरऔन सरज़मीन मिस्र में बड़ा सरकश था. और बेशक वह हद से बढ़ जाने वाले लोगों में से था.
84. और मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाए हो, तो उसी पर भरोसा करो. अगर तुम मुसलमान यानी फ़रमाबरदार हो.
85. फिर उन लोगों ने कहा कि हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया है. ऐ हमारे परवरदिगार ! तू हमें ज़ालिम क़ौम के फ़ितनों और आज़माइश का ज़रिया न बना.
86. और तू हमें अपनी रहमत से काफ़िर क़ौम से निजात दे दे. 
87. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम की तरफ़ वही भेजी कि तुम दोनों मिस्र में अपनी क़ौम के लिए कुछ घर बनाओ और अपने घरों को क़िबला रुख़ बनाओ और फिर पाबंदी से नमाज़ पढ़ो और मोमिनों को फ़तह की खुशख़बरी दे दो.
88. और मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! बेशक तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को दुनियावी ज़िन्दगी में ज़ीनत और माल व दौलत दे रखी है. ऐ हमारे परवरदिगार ! क्या तूने उन्हें ये सामान इसलिए अता किया है कि वे दूसरों को तेरे रास्ते से भटका दें. ऐ हमारे परवरदिगार ! तू उनके माल व दौलत को बर्बाद कर दे और उनके दिलों पर मुहर लगा दे कि वे फिर भी ईमान न लाएं, यहां तक कि वे दर्दनाक अज़ाब देख लें. 
89. अल्लाह ने फ़रमाया कि बेशक तुम दोनों की दुआ क़ुबूल कर ली गई. फिर तुम दोनों साबित क़दम रहो और ऐसे लोगों की पैरवी न करना, जो हक़ से नावाक़िफ़ हैं.
90. और हमने बनी इस्राईल को दरिया पार करवा दिया. फिर फ़िरऔन और उसके लश्कर ने सरकशी और ज़ुल्म व ज़्यादती से उनका पीछा किया, यहां तक कि जब वह ग़र्क़ होने लगा, तो उसने कहा कि मैं इस पर ईमान ले आया कि कोई माबूद नहीं, सिवा उस माबूद के, जिस पर बनी इस्राईल ईमान लाए हैं और अब मैं मुसलमानों में से हूं.   
91. उससे कहा गया कि अब मरने के वक़्त ईमान लाता है. हालांकि इससे पहले तू नाफ़रमानी करता रहा है और तू मुफ़सिदों में से था.
92. ऐ फ़िरऔन ! फिर आज हम तेरे बेजान बदन को बचा लेंगे, ताकि तू अपने बाद वाले लोगों के लिए इबरत की निशानी बन जाए और बेशक बहुत से लोग हमारी निशानियों से ग़ाफ़िल हैं. 
93. और हमने बनी इस्राईल को अच्छी जगह बसाया और हमने उन्हें पाकीज़ा चीज़ों का रिज़्क़ दिया. फिर उन्होंने कोई इख़्तिलाफ़ नहीं किया, यहां तक कि उनके पास इल्म आ गया. बेशक तुम्हारा परवरदिगार उनके दरम्यान क़यामत के दिन उन बातों का फ़ैसला कर देगा, जिनमें वे इख़्तिलाफ़ किया करते हैं. 
94. ऐ बन्दे ! फिर अगर तू इस क़ुरआन के बारे में ज़रा भी शक में मुब्तिला है, तो जो हमने अपने रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़रिये तेरी तरफ़ नाज़िल किया है, तो इसकी हक़ीक़त के बारे में उन लोगों से पूछ लिया कर, जो तुझसे पहले अल्लाह की किताबें पढ़ रहे हैं. बेशक तेरी पास तेरे परवरदिगार की तरफ़ से हक़ आ गया है. फिर तू शक करने वाले लोगों में से न हो जाना. 
95. और हरगिज़ उन लोगों में से न हो जाना, जो अल्लाह की आयतों को झुठलाते रहे हैं, वरना तू नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएगा. 
96. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! बेशक जिन लोगों के बारे में तुम्हारे परवरदिगार का फ़रमान साबित हो गया है कि वे ईमान नहीं लाएंगे. 
97. अगरचे उनके पास सब निशानियां आ जाएं, यहां तक कि वे लोग दर्दनाक अज़ाब भी देख लें. 
98. फिर यूनूस अलैहिस्सलाम की बस्ती के सिवा कोई और ऐसी बस्ती क्यों न हुई, जो ईमान लाई हो और उसे उसके ईमान लाने की वजह से नफ़ा दिया गया हो. जब यूनूस अलैहिस्सलाम की क़ौम अज़ाब से पहले निशानी देखकर ईमान लाई, तो हमने उससे दुनियावी ज़िन्दगी में रुसवाई का अज़ाब दूर कर दिया और हमने उन्हें नफ़ा पहुंचाते हुए एक मुद्दत तक चैन से रहने दिया.
99. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो ज़मीन पर रहने वाले सब लोग ईमान ले आते. फिर क्या तुम लोगों को मजबूर करोगे, यहां तक कि वे मोमिन हो जाएं.  
100. और किसी के लिए यह मुमकिन नहीं कि वह अल्लाह की इजाज़त के बगै़र ईमान ले आए. और अल्लाह कुफ़्र की ग़लाज़त उन्हीं लोगों पर डालता है, जो अक़्ल से काम नहीं लेते. 
101. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि देखो कि आसमानों और ज़मीन में अल्लाह की क़ुदरत की कितनी निशानियां हैं. और ये निशानियां और अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाले पैग़म्बर उन लोगों को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचा सकते, जो ईमान लाना ही नहीं चाहते. 
102. फिर क्या वे लोग भी उन्हीं बुरे दिनों का इंतज़ार कर रहे हैं, जो उनसे पहले के लोगों पर गुज़र चुके हैं. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि फिर तुम भी इंतज़ार करो. बेशक मैं भी तुम्हारे साथ मुंतज़िर हूं.
103. फिर हम अपने रसूलों को बचा लेते हैं और इसी तरह उन लोगों को भी, जो ईमान लाते हैं. यह हम पर लाज़िम है कि हम मोमिनों को बचा लें.
104. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ऐ लोगो ! अगर तुम मेरे दीन के बारे में शक में मुब्तिला हो, तो जान लो कि मैं उन्हें नहीं पुकार सकता, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो. लेकिन मैं तो उस अल्लाह की इबादत करता हूं, जो तुम्हें उठा लेता है. और मुझे हुक्म दिया गया है कि मैं मोमिनों में से रहूं.    
105. और मुझे यह भी हुक्म हुआ है कि तुम हर बातिल से बचकर अपना रुख़ दीन की पर क़ायम रखो और हरगिज़ मुशरिकों में से न हो जाना.
106. ऐ लोगो ! और अल्लाह के सिवा उन बातिल सरपरस्तों को न पुकारना, जो न तुम्हें नफ़ा दे सकते हैं और न तुम्हें नुक़सान पहुंचा सकते हैं. फिर अगर तुमने ऐसा किया, तो बेशक उस वक़्त तुम ज़ालिमों में से हो जाओगे. 
 107. और अगर अल्लाह तुम्हें कोई तकलीफ़ पहुंचाए, तो उसके सिवा कोई उसे दूर करने वाला नहीं है. और अगर वह तुम्हारे साथ भलाई का इरादा करे, तो कोई उसके फ़ज़ल को रोकने वाला नहीं है. वह अपने बन्दों में जिसे चाहता है अपने फ़ज़ल से नवाज़ता है और वह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है. 
108. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ऐ लोगो ! बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से हक़ आ गया है. फिर जो सीधे रास्ते पर चलता, तो वह अपने ही फ़ायदे के लिए हिदायत इख़्तियार करता है और जो गुमराह होता है, तो वह अपने ही नुक़सान के लिए गुमराह होता है. और मैं तुम्हारे आमाल का ज़िम्मेदार नहीं हूं. 
109. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उसी की पैरवी करो, जो तुम्हारी तरफ़ वही भेजी जाती है  और सब्र करते रहो, यहां तक कि अल्लाह फ़ैसला कर दे. और वह बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है.

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