Thursday, September 16, 2021

07 सूरह अल आराफ़

सूरह अल आराफ़ मक्का में नाज़िल हुई और इसकी 206 आयतें हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू, जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
1. अलिफ़ लाम मीम सुआद.
2. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! यह किताब तुम्हारी तरफ़ नाज़िल की गई है, ताकि तुम्हारा दिल तंग न हो और तुम इसके ज़रिये लोगों को अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करो और यह मोमिनों के लिए ज़िक्र यानी नसीहत है.
3. ऐ लोगो ! तुम इस क़ुरआन की पैरवी करो, जो तुम्हारे परवरदिगार की जानिब से तुम्हारी तरफ़ नाज़िल किया गया है और अल्लाह के सिवा दूसरे बातिल सरपरस्तों के पीछे मत चलो. तुम लोग बहुत ही कम ग़ौर व फ़िक्र करते हो. 
4. और कितनी ही बस्तियां ऐसी हैं, जिन्हें हमने हलाक कर दिया. फिर उन पर हमारा अज़ाब उस वक़्त आया जब वे लोग रात में सो रहे थे या दोपहर में आराम कर रहे थे. 
5. फिर जब उन लोगों पर हमारा अज़ाब आ गया, तो उनकी फ़रियाद सिवाय इसके कुछ नहीं थी कि वे कहने लगे कि बेशक हम ज़ालिम थे.
6. फिर हम उन लोगों से ज़रूर पूछेंगे, जिनकी तरफ़ रसूल भेजे गए और हम रसूलों से भी ज़रूर दरयाफ़्त करेंगे. 
7. फिर हम अपने इल्म से उनके सब हालात बयान कर देंगे और हम ग़ायब नहीं थे. 
8. और उस दिन आमाल का तौला जाना हक़ है. फिर जिनकी नेकियों के पलड़े भारी होंगे, तो वही लोग कामयाब होंगे. 
9. और जिनके नेकियों के पलड़े हल्के होंगे, तो यही वे लोग हैं, जिन्होंने ख़ुद को नुक़सान पहुंचाया, क्योंकि वे हमारी आयतों के साथ ज़ुल्म क्या करते थे.   
10. और बेशक हमने तुम्हें ज़मीन में रहने की जगह दी और उसमें तुम्हारे लिए ज़िन्दगी के असबाब पैदा किए. फिर भी तुम लोग बहुत ही कम शुक्र अदा करते हो.
11. और बेशक हमने तुम्हें यानी आदम अलैहिस्सलाम को पैदा किया. फिर तुम्हारी सूरत बनाई. फिर हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करो, तो सबने सजदा किया, सिवाय इबलीस के. वह सजदा करने वालों में से नहीं था. 
12. अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐ इबलीस ! तुझे किस चीज़ ने रोका था कि तूने आदम अलैहिस्सलाम को सजदा नहीं किया, जबकि हमने तुझे हुक्म दिया था. उसने कहा कि मैं इससे बेहतर हूं. तूने मुझे आग से पैदा किया है और तूने इसे मिट्टी से बनाया है.   
13. अल्लाह ने फ़रमाया कि फिर तू यहां से नीचे उतर जा. यानी जन्नत से ज़मीन पर उतर जा. तुझे यह हक़ नहीं कि तू यहां रहकर तकब्बुर करे, तो यहां से निकल जा. बेशक तू ज़लील लोगों में से है. 
14. वह कहने लगा कि मुझे उस दिन तक की मोहलत दे, जिस दिन लोग क़ब्रों से ज़िन्दा करके उठाए जाएंगे.
15. अल्लाह ने फ़रमाया कि बेशक तू मोहलत दिए जाने वालों में से है.
16. वह कहने लगा कि जैसे तूने मुझे गुमराह किया है, तो मैं भी आदम अलैहिस्सलाम की औलाद को गुमराह करने के लिए तेरे सीधे रास्ते पर बैठूंगा.  
17. फिर मैं ज़रूर उन लोगों के आगे से और उनके पीछे से और उनके दायें से और उनके बायें से यानी हर तरफ़ से उनके पास आऊंगा. और तू उनमें से बहुत से लोगों को शुक्रग़ुज़ार नहीं पाएगा. 
18. अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐ इबलीस ! तू यहां से ज़लील और मरदूद होकर निकल जा. उन लोगों में से जो तेरे पीछे चलेगा, तो हम ज़रूर तुम सबसे जहन्नुम को भर देंगे. 
19. अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐ आदम अलैहिस्सलाम ! तुम और तुम्हारी बीवी हव्वा दोनों जन्नत में सुकून से रहो और जहां से चाहो खाओ व पियो. और उस शजर के क़रीब मत जाना, वरना तुम ज़ालिमों में से हो जाओगे. 
20. फिर शैतान ने आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा के दिलों में वसवसा डाल दिया, ताकि उनकी शर्मगाहें जो उनसे पोशीदा थीं, उन पर ज़ाहिर हो जाएं. वह कहने लगा कि ऐ आदम अलैहिस्स्स्लाम और हव्वा ! तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें इस शजर के फल खाने से सिर्फ़ इसलिए मना किया है कि इसे खाने से तुम दोनों फ़रिश्ते बन जाओगे या हमेशा ज़िन्दा रहने वालों में से हो जाओगे.  
21. और शैतान ने उन दोनों से क़समें खाकर कहा कि बेशक मैं तुम्हारे ख़ैरख़्वाहों में से हूं.
22. फिर शैतान ने धोखे से उन्हें माइल कर लिया. फिर जब उन दोनों ने शजर के फल का ज़ायक़ा चख लिया, तो उनकी शर्मगाहें ज़ाहिर हो गईं और वे अपने जिस्म को जन्नत के दरख़्तों के पत्तों से ढकने लगे. तब उनके परवरदिगार ने उन्हें आवाज़ दी कि क्या हमने तुम्हें इस शजर के क़रीब जाने से मना नहीं किया था और क्या तुमसे यह नहीं कहा था कि बेशक शैतान तुम्हारा सरीह दुश्मन है.
23. आदम अलैहिस्सलाम और हव्वा ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया है और अगर तूने हमें नहीं बख़्शा और हम पर रहम नहीं किया, तो हम ज़रूर नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएंगे.
24. अल्लाह ने हुक्म दिया कि तुम सब नीचे उतर जाओ यानी जन्नत से ज़मीन पर उतर जाओ. तुम सब एक दूसरे के दुश्मन हो और तुम्हारे लिए ज़मीन में एक मुक़र्रर वक़्त तक ठिकाना और ज़िन्दगी के असबाब हैं.
25. अल्लाह ने फ़रमाया कि तुम ज़मीन में ही जिन्दगी गुज़ारोगे और इसी में मरोगे और क़यामत के दिन इसी में से ज़िन्दा करके निकाले जाओगे.
26. ऐ आदम अलैहिस्सलाम की औलाद ! बेशक हमने तुम्हारे लिए ऐसा लिबास नाज़िल किया है, जो तुम्हारी शर्मगाहों को ढकेगा और तुम्हें ज़ीनत बख़्शेगा. और परहेज़गारी का लिबास सबसे अच्छा है. यह लिबास भी अल्लाह की क़ुदरत की निशानियों में से है, ताकि वे लोग ग़ौर व फ़िक्र करें.
27. ऐ आदम अलैहिस्सलाम की औलाद ! कहीं शैतान तुम्हें भी फ़ितने में मुब्तिला न कर दे जिस तरह उसने तुम्हारे मां बाप को जन्नत से निकलवा दिया था. उसने उनका लिबास उतरवा दिया, ताकि उनकी शर्मगाहें ज़ाहिर कर दे. बेशक वह और उसका क़बीला तुम्हें ऐसी जगहों से देखता रहता है, जहां से तुम उन्हें नहीं देख सकते. बेशक हमने शैतानों को उन लोगों का दोस्त बना दिया है, जो ईमान नहीं लाते.
28. और जब वे लोग कोई बेहयाई का काम करते हैं, तो कहते हैं कि हमने अपने बाप दादाओं को इसी तरीक़े पर पाया और अल्लाह ने हमें यही हुक्म दिया है. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह बेहयाई के कामों का हुक्म नहीं देता. क्या तुम लोग अल्लाह के बारे में वे बातें कहते हो, जो तुम ख़ुद भी नहीं जानते.
29. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने इंसाफ़ का हुक्म दिया है और तुम हर नमाज़ के वक़्त व मस्जिद में अपने रुख़ क़िबले की तरफ़ सीधे कर लिया करो और दीन को ख़ालिस करके उसी से दुआ मांगो, जिस तरह उसने तुम्हें शुरू में पैदा किया था. उसी तरह तुम सब दोबारा ज़िन्दा किए जाओगे.
30. अल्लाह ने एक फ़रीक़ को हिदायत दी और एक फ़रीक़ पर गुमराही मुसल्लत हो गई. बेशक उन लोगों ने अल्लाह के सिवा शैतानों को अपना सरपरस्त बना लिया और यह गुमान करते रहे कि वे हिदायत याफ़्ता हैं.
31. ऐ आदम अलैहिस्सलाम की औलाद ! तुम हर नमाज़ के वक़्त और मस्जिद के क़रीब ज़ीनत इख़्तियार कर लिया करो और खाओ और पियो और फ़ुज़ूल ख़र्च मत करो. बेशक अल्लाह फ़ुज़ूल ख़र्च करने वालों को पसंद नहीं करता.
32. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि अल्लाह की उस ज़ीनत व आराइश को किसने हराम किया है, जो उसने अपने बन्दों के लिए पैदा की है और पाक रिज़्क़ को भी. तुम कह दो कि ये सब चीज़ें ईमान लाने वाले लोगों के लिए दुनिया में भी हैं और क़यामत के दिन तो ख़ालिस उन्हीं के लिए होंगी. इस तरह हम उस क़ौम के लिए अपनी आयतें तफ़सील से बयान करते हैं, जो इल्म रखती है. 
33. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने तो सिर्फ़ ज़ाहिरी और पोशीदा बेहयाई और गुनाह और नाहक़ सरकशी को हराम किया है और इसे भी कि तुम किसी को अल्लाह का शरीक ठहराओ, जिसकी उसने कोई सनद नाज़िल नहीं की और यह कि तुम अल्लाह के बारे में ऐसी बातें कहो, जो तुम ख़ुद भी नहीं जानते.
34. और हर उम्मत के लिए एक वक़्त मुक़र्रर है. फिर जब उनका मुक़र्रर वक़्त आ जाता है, तो वह न एक घड़ी पीछे हट सकता है और न आगे बढ़ सकता है. 
35. ऐ आदम अलैहिस्सलाम की औलाद ! अगर तुम्हारे पास तुम ही में से रसूल आएं, जो तुम्हें हमारी आयतें पढ़कर सुनाते हैं, फिर जो शख़्स परहेज़गारी इख़्तियार करे और अपनी इस्लाह कर ले, तो ऐसे लोगों को न कोई ख़ौफ़ होगा और न वे ग़मगीन होंगे.
36. और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और तकब्बुर किया, तो वही असहाबे दोज़ख़ हैं. वे उसमें हमेशा रहेंगे. 
37. फिर उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा, जो अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधे या उसकी आयतों को झुठलाए. यही वे लोग हैं, जिन्हें उनका वह हिस्सा मिल जाएगा, जो किताब यानी उनके नसीब में लिखा होगा, यहां तक कि जब उनके पास हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते उनकी रूह क़ब्ज़ करने के लिए आएंगे, तो उनसे कहेंगे कि अब वे बातिल सरपरस्त कहां हैं, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारा करते थे. वे जवाब देंगे कि वे सब हमसे गुम हो गए और वे अपने ख़िलाफ़ ख़ुद गवाही देंगे कि बेशक वे काफ़िर थे.
38. अल्लाह फ़रमाएगा कि तुम दोज़ख़ में दाख़िल हो जाओ. तुम जिन्नों और इंसानों की उन उम्मतों में से हो, जो तुमसे पहले गुज़र चुकी हैं. जब भी कोई उम्मत दोज़ख में डाली जाएगी, तो वह अपने जैसी दूसरी उम्मतों पर लानत भेजेगी, यहां तक कि जब उसमें सारी उम्मतें डाल दी जाएंगी, तो उनमें की बाद वाली उम्मत पिछली उम्मत के लिए कहेगी कि ऐ हमारे परवरदिगार ! उन्हीं लोगों ने हमें गुमराह किया था, तो तू उन्हें दोज़ख़ का दोगुना अज़ाब दे. अल्लाह फ़रमाएगा कि हर एक के लिए दोगुना अज़ाब है, लेकिन तुम नहीं जानते. 
39. और पिछली उम्मत बाद वाली उम्मत से कहेगी कि फिर तुम्हें हम पर कोई फ़ज़ीलत नहीं है. तुम भी अज़ाब का ज़ायक़ा चखो, उसके बदले जो कुछ तुम किया करते थे. 
40. बेशक जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे तकब्बुर करते हुए सरकशी की, उनके लिए  
आसमान के दरवाज़े नहीं खोले जाएंगे और न वे जन्नत में दाख़िल हो सकेंगे, यहां तक कि सुई के सुराख़ में ऊंट दाख़िल हो जाए. यानी जिस तरह यह नामुमकिन है, उसी उसी तरह उनका जन्नत में दाख़िल होना भी नामुमकिन है. और हम गुनाहगारों को इसी तरह सज़ा दिया करते हैं.
 41. उन लोगों के लिए जहन्नुम की आग का बिछौना और उनके ऊपर भी उसी का ओढ़ना होगा. और हम ज़ालिमों को इसी तरह सज़ा दिया करते हैं.
42. और जो लोग ईमान लाए और नेक अमल करते रहे. और हम किसी शख़्स को उसकी वुसअत से ज़्यादा तकलीफ़ नहीं देते. यही असहाबे जन्नत हैं. वे उसमें हमेशा रहेंगे.
43. और हम वह कीना व बुग़्ज़ निकाल देंगे, जो उन लोगों के दिलों में है. उनके महलों के नीचे नहरें बहती होंगी और वे कहेंगे कि अल्लाह ही सज़ावारे हम्दो सना है यानी तमाम तारीफ़ें अल्लाह ही के लिए हैं, जिसने हमारी रहनुमाई की. और हम यहां तक नहीं पहुंच सकते थे, अगर अल्लाह हमें हिदायत न देता. बेशक हमारे परवरदिगार के रसूल हक़ के साथ आए थे और तुम लोग उस जन्नत के वारिस बना दिए गये, जो उन नेक आमाल का सिला है, जो तुम किया करते थे.
44. और अहले जन्नत दोज़ख़ वालों से पुकार कर कहेंगे कि बेशक हमने उसे सच्चा पाया, जो वादा हमारे परवरदिगार ने हमसे किया था. फिर क्या तुमने भी उसे सच्चा पाया, जो वादा तम्हारे परवरदिगार ने तुमसे किया था. वे कहेंगे कि हां. फिर उनके दरम्यान एक मुनादी करने वाला आवाज़ देगा कि ज़ालिमों पर अल्लाह की लानत है.
45. यही वे लोग हैं, जो लोगों को अल्लाह के रास्ते से रोकते थे और उसमें कजी यानी ख़ामियां तलाश करते थे और वे आख़िरत से कुफ़्र यानी इनकार करते थे.
46. और उन दोनों यानी जन्नत और दोज़ख़ के दरम्यान एक पर्दा होगा और आराफ़ पर कुछ आदमी होंगे, जो सबको उनकी निशानियों से पहचान लेंगे. और वे अहले जन्नत को आवाज़ देकर कहेंगे कि सलाम हो तुम पर. आराफ़ वाले अभी ख़ुद जन्नत में दाख़िल नहीं हुए होंगे, लेकिन वे इसमें दाख़िल होने की तमन्ना रखते हैं.
47. और जब उन लोगों की निगाहें दोज़ख़ वालों की तरफ़ फिरेंगी, तो वे कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार ! हमें ज़ालिमों की क़ौम के साथ न रखना.
48. और आराफ़ वाले उन दोज़ख़ी मर्दों को आवाज़ देकर कहेंगे, जिन्हें वे उनकी निशानियों से पहचान रहे होंगे कि न तुम्हारी जमातें तुम्हारे कुछ काम आईं और न तुम्हारा तकब्बुर ही काम आया, जो तुम किया करते थे.
49. क्या यही वे लोग हैं जिनके बारे में तुम क़समें खाया करते थे कि अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से कभी नहीं नवाज़ेगा. देखो कि अब उनसे कहा जा रहा है कि तुम जन्नत में दाख़िल हो जाओ. अब तुम्हें न कोई ख़ौफ़ होगा और न तुम ग़मगीन होगे. 
50. और दोज़ख़ वाले अहले जन्नत से आवाज़ देकर कहेंगे कि हमें भी उस पानी से फ़ैज़याब कर दो या उसमें से कुछ दे दो, जो रिज़्क़ अल्लाह ने तुम्हें दिया है. वे कहेंगे कि बेशक अल्लाह ने ये नेअमतें काफ़िरों पर हराम कर दी हैं. 
51. जिन लोगों ने अपने दीन को खेल और तमाशा बना लिया था और जिन्हें दुनियावी ज़िन्दगी ने धोखे में डाल दिया था, तो आज हम भी उन्हें इस तरह भूल जाएंगे, जिस तरह उन्होंने आज के दिन के मिलने को भुला दिया था और जैसे वे हमारी आयतों से इनकार किया करते थे.  
52. और बेशक हम उनके पास ऐसी किताब यानी क़ुरआन लाए, जिसे हमने अपने इल्म से तफ़सील से बयान किया है. यह उस क़ौम के लिए हिदायत और रहमत है, जो ईमान रखती है.  
53. क्या वे लोग सिर्फ़ उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं, जिस दिन क़यामत का वादा पूरा हो जाएगा. जो लोग इससे पहले उसे भूले बैठे थे, वे कहेंगे कि बेशक हमारे परवरदिगार के रसूल हक़ लेकर आए थे, तो क्या आज हमारी सिफ़ारिश करने वाले हैं, जो हमारी सिफ़ारिश करें या हम फिर दुनिया में लौटा दिए जाएं, ताकि हम उनसे मुख़्तलिफ़ काम करें, जो हम पहले किया करते थे. बेशक उन्होंने ने ख़ुद अपना ही नुक़सान किया और वह सब उनसे गुम हो गया, जो झूठे बोहतान वे बांधा करते थे. 
54. बेशक तुम्हारा परवरदिगार अल्लाह ही है, जिसने सिर्फ़ छह दिन में आसमानों और ज़मीन यानी कुल कायनात की तख़लीक़ की. फिर उसने अर्श पर अपना इख़्तेदार क़ायम किया. वही रात को दिन से ढक देता है और दिन रात के पीछे दौड़ता हुआ आता है और सूरज और चांद और सितारे सब उसी के हुक्म के पाबंद हैं. जान लो कि उसी ने हर चीज़ की तख़लीक़ की है और हुक्म भी उसी का है. अल्लाह बड़ा बरकत वाला है, जो तमाम आलमों का परवरदिगार है. 
55. तुम अपने परवरदिगार से आजिज़ी से और आहिस्ता-आहिस्ता दुआ मांगा करो. बेशक वह हद से तजावुज़ करने वालों को पसंद नहीं करता.
56. और ज़मीन में इस्लाह के बाद फ़साद फैलाते न फिरो और अज़ाब के ख़ौफ़ से और रहमत की उम्मीद में अल्लाह से दुआ मांगो करो. बेशक अल्लाह की रहमत मोहसिनों के क़रीब है. 
57. और अल्लाह ही है, जो अपनी रहमत से हवाओं को ख़ुशख़बरी बनाकर भेजता है, यहां तक कि जब वे पानी से भरे हुए भारी बादलों को उड़ाए फिरती हैं, तो हम उन्हें बंजर ज़मीन वाले शहर की तरफ़ ले जाते हैं. फिर हम उससे पानी बरसाते हैं. फिर हम उस पानी के ज़रिये ज़मीन से हर क़िस्म के फल उगाते हैं. इसी तरह हम क़यामत के दिन मुर्दों को क़ब्रों से निकालेंगे, ताकि तुम ग़ौर व फ़िक्र करो.   
58. और उम्दा ज़मीन अपने परवरदिगार के हुक्म से ख़ूब सब्ज़ा उगाती है और ख़राब ज़मीन से थोड़ी सी बेफ़ायदा चीज़ों के सिवा कुछ नहीं निकलता. इसी तरह हम अपनी आयतों को उस क़ौम के लिए बदल-बदल कर बयान करते हैं, जो शुक्रगुज़ार है. 
59. बेशक हमने नूह अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम की तरफ़ पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! तुम अल्लाह की इबादत किया करो. उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. बेशक मैं तुम्हारे लिए एक बड़े सख़्त दिन के अज़ाब से ख़ौफ़ज़दा हूं.
60. उनकी क़ौम के सरदारों ने कहा कि ऐ नूह अलैहिस्सलाम ! बेशक हम तुम्हें सरीह गुमराही में मुब्तिला देखते हैं. 
61. नूह अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! मुझमें कोई गुमराही नहीं है, लेकिन मैं तमाम आलमों के  परवरदिगार की तरफ़ से भेजा हुआ रसूल हूं.
62. मैं तुम्हें अपने परवरदिगार के पैग़ाम पहुंचा रहा हूं और तुम्हें नसीहत कर रहा हूं और अल्लाह की तरफ़ से वह सब जानता हूं, जो तुम नहीं जानते.
63. क्या तुम्हें इस बात पर ताज्जुब है कि तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम ही में से एक आदमी के ज़रिये नसीहत आई है, ताकि वह तुम्हें अज़ाब से ख़बरदार करे और तुम परहेज़गार बन जाओ और यह कि तुम पर रहम किया जाए.
64. फिर उन लोगों ने रसूलों को झुठला दिया, तो हमने उन्हें और जो कश्ती में उनके साथ थे, उन्हें निजात दे दी और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था, उन्हें ग़र्क़ कर दिया. बेशक वह क़ौम अंधी थी. 
65. और हमने क़ौमे आद की तरफ़ उनके भाई हूद अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अल्लाह की इबादत किया करो. उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. क्या तुम अल्लाह से नहीं डरते.
66. उनकी क़ौम के कुफ़्र करने वाले सरदार कहने लगे कि ऐ हूद अलैहिस्सलाम ! बेशक हम तुम्हें हिमाक़त में मुब्तिला देख रहे हैं और बेशक हम तुम्हें झूठे लोगों में गुमान करते हैं.
67. हूद अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! मुझमें में कोई हिमाक़त नहीं है, लेकिन मैं तमाम आलमों के  परवरदिगार की तरफ़ से भेजा हुआ रसूल हूं.
68. मैं तुम्हें अपने परवरदिगार के पैग़ाम पहुंचा रहा हूं और मैं तुम्हारा सच्चा ख़ैरख़्वाह हूं.
69. क्या तुम्हें इस पर ताअज्जुब है कि तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम ही में से एक आदमी के ज़रिये नसीहत आई है, ताकि वह तुम्हें अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करे. और तुम वह वक़्त याद करो कि जब उसने तुम्हें नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के बाद ख़लीफ़ा बनाया और तुम्हारी ख़िलक़त में क़ूवत को मज़ीद बढ़ा दिया. फिर तुम अल्लाह की नेअमतों का ज़िक्र करो, ताकि तुम कामयाबी पाओ. 
70. वे लोग कहने लगे कि क्या तुम हमारे पास इसलिए आए हो कि हम सिर्फ़ वाहिद अल्लाह की इबादत करें और उन्हें छोड़ दें, जिन्हें हमारे बाप दादा पुकारा करते थे. फिर तुम हमारे पास वह अज़ाब ले आओ, जिसका तुम हमसे वादा करते हो. अगर तुम सच्चे लोगों में से हो. 
71. हूद अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक तुम पर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से अज़ाब और ग़ज़ब नाज़िल हो गया है. क्या तुम मुझसे उन बातिल सरपरस्तों के नामों के बारे में झगड़ रहे हो, जो तुमने और तुम्हारे बाप दादाओं ने ख़ुद गढ़ लिए हैं, जिनकी अल्लाह ने कोई सनद नाज़िल नहीं की. फिर तुम इंतज़ार करो. बेशक मैं भी तुम्हारे साथ मुंतज़िर हूं.
72. फिर हमने उन लोगों और उनके साथियों को अपनी रहमत से निजात दी और उनकी जड़ें काट दीं, जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था और वे ईमान लाने वाले नहीं थे.
73. और हमने क़ौमे समूद की तरफ़ उनके भाई सालेह अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अल्लाह की इबादत किया करो और उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से वाज़ेह दलील आ गई है. यह अल्लाह की ऊंटनी तुम्हारे लिए निशानी है. फिर तुम लोग इसे आज़ाद छोड़ दो कि वह अल्लाह की ज़मीन में जहां चाहे चरती फिरे और उसे बुराई के इरादे से हाथ मत लगाना, वरना दर्दनाक अज़ाब तुम्हें अपनी गिरफ़्त में ले लेगा. 
74. और वह वक़्त याद करो कि जब अल्लाह ने तुम्हें हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम आद के बाद ख़लीफ़ा बनाया और तुम्हें ज़मीन में बसाया कि तुम उसके नर्म हमवार इलाक़ों में महल तामीर करते हो और पहाड़ों को तराश कर उनमें घर बनाते हो. फिर तुम अल्लाह की इन नेअमतों का ज़िक्र करो और ज़मीन में फ़साद फैलाते न फिरो. 
75. उनकी क़ौम के तकब्बुर करने वाले सरदार उनमें से ईमान लाने वाले कमज़ोर लोगों से कहने लगे कि क्या तुम्हें यक़ीन है कि वाक़ई सालेह अलैहिस्सलाम अपने परवरदिगार की तरफ़ से रसूल बनाकर भेजे गए हैं. उन लोगों ने कहा कि जो कुछ देकर उन्हें भेजा गया है, बेशक हम उस पर ईमान रखते हैं.
76. तकब्बुर करने वाले लोग कहने लगे कि बेशक जिस चीज़ पर तुम ईमान लाए हो, हम उससे कुफ़्र करते हैं. 
77. उन लोगों ने ऊंटनी की कूचें काटकर उसे मार दिया और अपने परवरदिगार के हुक्म से सरकशी की और कहने लगे कि ऐ सालेह अलैहिस्सलाम ! तुम वह अज़ाब हमारे पास ले आओ, जिसका तुम वादा करते थे. अगर तुम सच्चे रसूलों में से हो. 
78. फिर उन लोगों को ज़लज़ले ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. फिर वे सुबह अपने घरों में औंधे पड़े रह गए. 
79. फिर सालेह अलैहिस्सलाम ने उन लोगों से मुंह फेर लिया और कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! बेशक मैंने तुम्हें अपने परवरदिगार का पैग़ाम पहुंचा दिया था और नसीहत भी कर दी थी, लेकिन तुम नसीहत करने वालों को पसंद नहीं करते.
80. और हमने लूत अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि क्या तुम ऐसी बेहयाई के काम करते हो, जो तुमसे पहले तमाम आलाम में किसी ने नहीं किए. 
81. बेशक तुम शहवत पूरी करने के लिए औरतों को छोड़कर मर्दों के पास जाते हो, बेशक तुम हद से तजावुज़ करने वाली क़ौम हो.
82. और उनकी क़ौम का इसके सिवाय कोई जवाब नहीं था कि वे लोग कहने लगे कि इन्हें यानी लूत अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों को बस्ती से निकाल दो. बेशक ये लोग पाकीज़गी चाहते हैं. 
83. हमने लूत अलैहिस्सलाम और उनके घरवालों को निजात दे दी, सिवाय उनकी बीवी के. वह पीछे रह जाने वालों में थी.
84. और हमने उन लोगों पर पत्थरों की बारिश बरसाई. फिर तुम देखो कि गुनाहगारों का क्या अंजाम हुआ.
85. और हमने मदयन की तरफ़ उनके भाई शुऐब अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाकर भेजा, तो उन्होंने कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! अल्लाह की इबादत किया करो. उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं. बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक वाजे़ह दलील आ चुकी है. फिर तुम नाप और तौल पूरे किया करो और लोगों को उनकी चीज़ें कम करके न दिया करो और ज़मीन में उसकी इस्लाह के बाद फ़साद फैलाते न फिरो. यह तुम्हारे लिए बेहतर है. अगर तुम ईमान वाले हो. 
86. और तुम हर रास्ते पर इसलिए न बैठा करो कि तुम उस शख़्स को डराओ और तुम अल्लाह के रास्ते से रोको, जो उस पर ईमान लाया है और उसमें कजी यानी ख़ामियां तलाश करो. और अल्लाह का अहसान याद करो कि जब तुम कम थे, तो उसने तुम्हें ज़्यादा कर दिया. और देखो कि फ़साद फैलाने वालों का क्या अंजाम हुआ.
87. और अगर तुम में से कोई एक तबक़ा उस दीन पर जिसके साथ मैं भेजा गया हूं ईमान लाया और एक तबक़ा ईमान नहीं लाया तो तुम सब्र करो, यहां तक कि अल्लाह हमारे दरम्यान फ़ैसला कर दे. और वह बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है.
88. उनकी क़ौम के तकब्बुर करने वाले सरदार कहने लगे कि ऐ शुऐब अलैहिस्सलाम ! हम तुम्हें और तुम्हारे साथ ईमान लाने वाले लोगों को अपनी बस्ती से निकाल देंगे या तुम्हें ज़रूर हमारी मिल्लत यानी मज़हब में लौटना होगा. शुऐब अलैहिस्सलाम ने कहा कि अगरचे हम तुम्हारे मज़हब से बेज़ार ही हों.
89. बेशक हम अल्लाह पर झूठे बोहतान बांधेंगे, अगर हम तुम्हारे मज़हब में इसके बाद लौट जाएं कि अल्लाह ने हमें निजात दी. और हमारे लिए हरगिज़ मुनासिब नहीं है कि हम उस मज़हब में लौट जाएं, लेकिन यह कि अल्लाह चाहे, जो हमारा परवरदिगार है. हमारा परवरदिगार अपने इल्म से हर चीज़ को अपने अहाते में लिए हुए है. हमने अल्लाह पर भरोसा किया है. ऐ हमारे परवरदिगार ! हमारे और हमारी मुख़ालिफ़ क़ौम के दरम्यान हक़ के साथ फ़ैसला कर दे और तू बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है.       
90. और उनकी क़ौम के तकब्बुर करने वाले सरदार लोगों से कहने लगे कि अगर तुमने शुऐब अलैहिस्सलाम की पैरवी की, तो उस वक़्त तुम ज़रूर नुक़सान उठाने वाले हो जाओगे. 
91. फिर उन लोगों को ज़लज़ले ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया. फिर सुबह वे अपने घरों में औंधे पड़े रह गए. 
92. जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया था, वे ऐसे नाबूद हुए गोया वे उन बस्तियों में कभी बसे ही नहीं थे. जिन लोगों ने शुऐब अलैहिस्सलाम को झुठलाया, हक़ीक़त में वही नुक़सान उठाने वाले थे. 
93. फिर शुऐब अलैहिस्सलाम ने उन लोगों से मुंह फेर लिया और कहा कि ऐ मेरी क़ौम ! बेशक मैंने तुम्हें अपने परवरदिगार के पैग़ाम पहुंचा दिए और तुम्हें नसीहत कर दी. फिर अब मैं काफ़िर क़ौम की तबाही पर अफ़सोस क्यों करूं.
94. और हमने जब भी किसी बस्ती में कोई नबी भेजा, तो नाफ़रमानी की वजह से हमने उसमें रहने वाले लोगों को सख़्ती और तकलीफ़ में मुब्तिला कर दिया, ताकि वे आजिज़ी करें. 
95. फिर हमने उन लोगों की बदहाली को ख़ुशहाली में बदल दिया, यहां तक कि वे ख़ुशहाली में आगे बढ़ गए और कहने लगे कि हमारे बाप दादाओं को भी इसी तरह तकलीफ़ और राहत मिलती रही है. फिर हमने उन्हें अचानक अज़ाब की गिरफ़्त में ले लिया और उन्हें इसका शऊर तक नहीं था.  
96. और अगर उन बस्तियों के रहने वाले लोग ईमान ले आते और परहेज़गारी इख़्तियार करते, तो हम उन पर आसमान और ज़मीन से बरकतों के दरवाजे़ खोल देते, लेकिन उन्होंने हक़ को झुठलाया. फिर हमने उन्हें उसकी वजह से गिरफ़्त में ले लिया, जो कुछ वे किया करते थे.
97. क्या उन बस्तियों के रहने वाले लोग इससे बेख़ौफ़ हो गए हैं कि उन पर हमारा अज़ाब रात को आ जाए और वे सो रहे हों. 
98. या उन बस्तियों के रहने वाले लोग इससे बेख़ौफ़ हो गए हैं कि उन पर हमारा अज़ाब दिन चढ़े आ जाए और वे खेल रहे हों.
99. क्या वे लोग अल्लाह की तदबीर से बेख़ौफ़ हो गए हैं. फिर अल्लाह की तदबीर से कोई बेख़ौफ़ नहीं हुआ करता, सिवाय नुक़सान उठाने वाली क़ौम के.
100. क्या उन लोगों को हिदायत नहीं मिलती कि जो ज़मीन में रहने वालों के बाद ख़ुद ज़मीन के वारिस बनते हैं कि अगर हम चाहें तो उनके गुनाहों की वजह से उन्हें मुसीबत में मुब्तिला कर दें और हम उनके दिलों पर मुहर लगा दें. फिर वे कुछ भी न सुन सकें.
101. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! ये वे बस्तियां हैं, जिनके वाक़ियात हम तुमसे बयान कर रहे हैं. और बेशक उनके पास उनके रसूल वाजे़ह निशानियां लेकर आए, तो वे ऐसे न थे कि उस पर ईमान ले आते, जिसे वे पहले झुठला चुके थे. इस तरह अल्लाह काफ़िरों के दिलों पर मुहर लगा देता है.
102. और हमने उनमें से बहुत से लोगों को अहद के मामले में सही नहीं पाया और हमने उनमें से बहुत से लोगों को नाफ़रमान ही पाया.
103. फिर हमने उनके बाद मूसा अलैहिस्सलाम को अपनी निशानियों के साथ फ़िरऔन और उसके दरबार के सरदारों के पास भेजा, तो उन्होंने उनके साथ ज़ुल्म किया. फिर तुम देखो कि मुफ़सिदों क्या अंजाम हुआ. 
104. और मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ फ़िरऔन ! बेशक मैं तमाम आलमों के परवरदिगार की तरफ़ से भेजा हुआ रसूल हूं. 
105. मेरे शायान यही है कि अल्लाह के बारे में हक़ बात के सिवा कुछ न कहूं. बेशक मैं तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम्हारे पास वाज़ेह निशानियां लेकर आया हूं. फिर तू बनी इस्राईल को मेरे साथ भेज दे. 
106. फ़िरऔन कहने लगा कि अगर तुम कोई निशानी लाए हो, तो उसे सामने लाओ. अगर तुम सच्चे हो.
107. फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना असा ज़मीन पर डाल दिया, तो उसी वक़्त वह सरीह अज़दहा बन गया.
108. और मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना हाथ गिरेबान में डालकर बाहर निकाला, तो वह देखने वालों के लिए चमकदार सफ़ेद हो गया. 
109. फ़िरऔन की क़ौम के सरदार कहने लगे कि बेशक यह बड़ा माहिर जादूगर है.
110. यह तुम्हें तुम्हारी सरज़मीन से निकालना चाहता है. फिर अब तुम क्या कहते हो.
111. वे लोग कहने लगे कि मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हारून अलैहिस्सलाम को रोक लो और मुख़्तलिफ़ शहरों में हरकारों को भेज दो. 
112. ताकि वे तमाम माहिर जादूगरों को लेकर तुम्हारे पास आएं. 
113. और जादूगर फ़िरऔन के पास आए, तो कहने लगे कि बेशक हमारे लिए कुछ उजरत होनी चाहिए बशर्ते हम ग़ालिब आ जाएं.
114. फ़िरऔन ने कहा कि और बेशक तुम मेरे मुक़र्रिबों में से हो जाओगे. 
115. जादूगर कहने लगे कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! या तुम अपनी चीज़ें डाल दो या हम पहले डालने वाले हैं.
116. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि तुम ही पहले डाल दो. फिर जब उन जादूगरों ने अपनी छड़ियां ज़मीन पर डालीं, तो लोगों की नज़र बंद कर दी और उन्हें डरा दिया और उन्होंने बड़ा ज़बरदस्त जादू दिखाया.
117. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम की तरफ़ वही भेजी कि तुम अपना असा ज़मीन पर डाल दो, तो वह फ़ौरन उन चीज़ों को निगलने लगा, जो उन्होंने फ़रेब से बनाई थीं. 
118. फिर हक़ साबित हो गया और वह बातिल हो गया, जो कुछ वे जादूगर कर रहे थे.
119. फिर वे जादूगर मग़लूब हो गए और ज़लील होकर लौट गए.
120. और तमाम जादूगर मूसा अलैहिस्सलाम के सामने सजदे में गिर पड़े.
121. और वे कहने लगे कि हम तमाम आलमों के परवरदिगार पर ईमान ले आए हैं.
122. जो मूसा अलैहिस्सलाम और हारून अलैहिस्सलाम का परवरदिगार है.
123. फ़िरऔन कहने लगा कि क्या तुम इस पर ईमान ले आए, इससे पहले कि मैं तुम्हें इजाज़त देता.
बेशक यह मक्कारी है, जो तुमने मिलकर इस शहर में की है, ताकि तुम इसमें रहने वालों को यहां से निकाल दो. फिर तुम अनक़रीब इसका अंजाम जान लोगे.
124. मैं ज़रूर तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और तुम्हारे दूसरी तरफ़ के पांव कटवा दूंगा और तुम सबको सूली पर चढ़वा दूंगा.
125. जादूगर कहने लगे कि बेशक हमें अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटना है.
126. और तुझे इसके सिवा हमारी कौन सी बात बुरी लगी कि हम अपने परवरदिगार की निशानियों पर ईमान ले आए हैं, जब वे हमारे पास आईं. ऐ हमारे परवरदिगार ! तू हम पर सब्र के दहाने खोल दे और हमें उस हाल में मौत देना कि हम मुसलमान हों.  
127. और फ़िरऔन की क़ौम के सरदार उससे कहने लगे कि क्या तुम मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम को छोड़ दोगे कि वे सरज़मीन मिस्र में फ़साद फैलाते फिरें और वे तुम्हें और तुम्हारे सरपरस्तों को छोड़ दें. फ़िरऔन कहने लगा कि नहीं. हम अनक़रीब उनके बेटों को क़त्ल कर देंगे और उनकी औरतों को ज़िन्दा रखेंगे. और बेशक हम उन पर ग़ालिब हैं.
128. मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम से कहा कि तुम अल्लाह से मदद मांगो और सब्र करो. बेशक ज़मीन अल्लाह की है. वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है, उसका वारिस बना देता है. और अंजाम ख़ैर परहेज़गारों के लिए है.
129. वे लोग कहने लगे कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! हमें तो आपके पास आने से पहले भी अज़ीयतें दी गईं और आपके हमारे पास आने के बाद भी दी जा रही हैं. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि मुमकिन है कि तुम्हारा परवरदिगार तुम्हारे दुश्मन को हलाक कर दे और तुम्हें उस ज़मीन का ख़लीफ़ा बना दे. फिर वह देखे कि तुम कैसे आमाल करते हो.
130. और बेशक हमने फ़िरऔन के लोगों को बरसों के क़हत और फल व मेवों के नुक़सान से अज़ाब की गिरफ़्त में ले लिया, ताकि वह ग़ौर व फ़िक्र करें. 
131. फिर जब उन लोगों को कोई राहत मिलती है, तो कहते हैं कि यह हमारी अपनी वजह से है और जब उन्हें कोई तकलीफ़ पहुंचती है, तो उसे मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की बदशुगनी गुमान करते हैं. जान लो कि यह उनका शगुन तो अल्लाह के सिवा किसी के पास नहीं है, लेकिन उनमें से बहुत से लोग नहीं जानते.
132. और फ़िरऔन के लोग कहने लगे कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम हम पर जादू करने के लिए कैसी भी निशानी ले लाओ, हम तुम पर ईमान लाने वाले नहीं हैं.
133. फिर हमने उन लोगों पर तूफ़ान और टिड्डियां और घुन और मेंढक और ख़ून जैसी अपनी क़ुदरत की मुख़्तलिफ़ निशानियां बतौर अज़ाब भेजीं. फिर भी उन्होंने तकब्बुर किया. और वह क़ौम गुनाहगार थी.
134. और जब उन लोगों पर कोई मुसीबात आन पड़ती है, तो वे कहते हैं कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! तुम हमारे लिए अपने परवरदिगार से दुआ करो, जिसका तुमने अहद किया है. अगर तुम इस मुसीबत को दूर कर दोगे, तो हम ज़रूर तुम पर ईमान ले आएंगे और बनी इस्राईल को तुम्हारे साथ भेज देंगे.
135. फिर जब हम उन लोगों से उस मुद्दत तक के लिए अज़ाब हटा देते हैं, जिस तक उन्हें पहुंचना है, तो वे फ़ौरन अहद तोड़ देते हैं. 
136. फिर हमने उन लोगों से इंतक़ाम लिया और हमने उन्हें दरिया में ग़र्क़ कर दिया, क्योंकि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया था और वे उनसे ग़ाफ़िल थे.
137. और हमने कमज़ोर समझी जाने वाली उस क़ौम यानी बनी इस्राईल को उस सरज़मीन के मशरिक़ और मग़रिब यानी मिस्र और शाम का वारिस बना दिया, जिसमें हमने बरकत रखी थी. और बनी इस्राईल के हक़ में तुम्हारे परवरदिगार का नेक वादा पूरा हो गया. इस वजह से कि उन्होंने सब्र किया था. और हमने उन सबको तबाह व बर्बाद कर दिया, जो महल और अंगूर के बाग़ फ़िरऔन और उसकी क़ौम ने बनाए थे, जिसकी बेलें छतरियों पर चढ़ाई जाती थीं.
138. और हमने बनी इस्राईल को दरिया के उस पार उतार दिया, तो वे लोग एक ऐसी क़ौम के पास पहुंच गए,
जो अपने बुतों के पास भीड़ लगाए बैठी थी. बनी इस्राईल ने कहा कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! हमारे लिए भी ऐसा ही सरपरस्त बना दो, जैसे उनके सरपरस्त हैं. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि बेशक तुम जाहिल क़ौम हो. 
139. बेशक वे लोग जिस शग़ल में मुब्तिला हैं, वह तबाह व बर्बाद होने वाला है. और वह बातिल है, जो कुछ वे कर रहे हैं.
140. मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा कि क्या मैं तुम्हारे लिए अल्लाह के सिवा कोई और सरपरस्त तलाश करूं. हालांकि उसी अल्लाह ने तुम्हें तमाम आलमों में फ़ज़ीलत बख़्शी है.
141. और वह वक़्त याद करो कि जब हमने तुम्हें फ़िरऔन के लोगों से निजात दी, जो तुम्हें बहुत सख़्त अज़ाब देते थे. वे तुम्हारे बेटों को क़त्ल कर देते थे और तुम्हारी औरतों को ज़िन्दा छोड़ देते थे और इसमें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से बड़ी आज़माइश थी.
142. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम से तीस रातों का वादा किया और हमने उसे मज़ीद दस रातें मिलाकर पूरा कर लिया. फिर उनके परवरदिगार की मियाद चालीस रातों में पूरी हो गई. और मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने भाई हारून अलैहिस्सलाम से कहा कि तुम मेरी क़ौम में मेरे ख़लीफ़ा रहना और उसकी इस्लाह करना और मुफ़सिदों के रास्ते पर मत चलना.
143. और जब मूसा अलैहिस्सलाम हमारे मुक़र्रर किए वक़्त पर कोहे तूर पर आ गए और उनके परवरदिगार ने उनसे कलाम किया, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे अपना जलवा दिखा कि मैं तेरा दीदार कर लूं. अल्लाह ने फ़रमाया कि तुम मुझे हरगिज़ नहीं देख सकते. अलबत्ता तुम उस पहाड़ की तरफ़ देखो. फिर अगर वह अपनी जगह पर क़ायम रहा, तो तुम अनक़रीब हमारा दीदार कर लोगे. फिर जब उनके परवरदिगार ने पहाड़ पर तजल्ली डाली, तो वह रेज़ा-रेज़ा हो गया और मूसा अलैहिस्सलाम बेहोश होकर गिर पड़े. फिर जब उन्हें होश आया, तो वे अर्ज़ करने लगे कि तेरी ज़ात पाक है. मैं तेरी बारगाह में तौबा करता हूं और मैं सबसे पहला ईमान लाने वाला हूं.
144. अल्लाह ने फ़रमाया कि ऐ मूसा अलैहिस्सलाम ! बेशक हमने तुम्हें तमाम लोगों पर अपनी रिसालत और अपने कलाम के ज़रिये बरगुज़ीदा व मुंतक़िब किया है. फिर हमने तुम्हें जो कुछ अता किया है, उसे थाम लो और शुक्रगुज़ारों में से हो जाओ. 
145. और हमने मूसा अलैहिस्सलाम के लिए तौरात की तख़्तियों पर हर चीज़ की नसीहत और हर चीज़ की तफ़सील लिख दी थी. और यह हुक्म दिया कि तुम इसे मज़बूती से थाम लो और अपनी क़ौम को भी हुक्म दो कि वह उसके बेहतरीन अहकाम पर अमल करे. हम अनक़रीब तुम्हें नाफ़रमानों का घर दिखाएंगे. 
146. हम अनक़रीब अपनी आयतों से उन लोगों को फेर देंगे, जो ज़मीन में नाहक़ तकब्बुर करते हैं और अगर वे तमाम निशानियां देख लें तब भी उस पर ईमान नहीं लाएंगे और अगर वे हिदायत का रास्ता देख लें, फिर भी उसे अपना रास्ता नहीं बनाएंगे और अगर वे गुमराही देख लें, तो उसे इख़्तियार कर लेंगे. यह इसलिए है कि उन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और उनसे ग़ाफ़िल रहे.
147. और जिन लोगों ने हमारी आयतों और आख़िरत के मिलने को झुठलाया, तो उनके सब आमाल बर्बाद हो गए. और उन्हें उसी की जज़ा दी जाएगी, जो कुछ वे किया करते थे.
148. और मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम ने उनके कोहे तूर पर जाने के बाद अपने ज़ेवरों से एक बछड़ा बना लिया, जो एक बेजान जिस्म था. उसमें से बैल जैसी आवाज़ निकलती थी. क्या उन्होंने नहीं देखा कि वह न उनसे बात करता है और न उन्हें रास्ता दिखाता है. उन्होंने उसे अपना सरपरस्त बना लिया और वे ज़ालिम थे. 
149. और जब वे लोग अपने किए पर शर्मिन्दा हुए और उन्होंने देख लिया कि वे वाक़ई गुमराह हो गए थे, तो कहने लगे कि अगर हमारे परदिगार ने हम पर रहम नहीं किया और हमें बख़्शा नहीं, तो हम ज़रूर नुक़सान उठाने वालों में से हो जाएंगे.
150. और जब मूसा अलैहिस्सलाम ग़ुस्से और ग़म से भरे हुए अपनी क़ौम की तरफ़ वापस आए, तो कहने लगे कि तुमने मेरे जाने के बाद मेरे पीछे बहुत बुरा काम किया है. क्या तुमने अपने परवरदिगार के हुक्म से पहले ही जल्दबाज़ी कर दी. और उन्होंने तौरात की तख़्तियां नीचे रख दीं और अपने भाई हारून अलैहिस्सलाम के सर को पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचने लगे, तो हारून अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरी मां के बेटे ! बेशक इस क़ौम ने मुझे कमज़ोर समझा और क़रीब था कि वे लोग मुझे क़त्ल कर देते. फिर आप दुश्मनों को मुझ पर हंसने का मौक़ा मत दो और मुझे ज़ालिमों की क़ौम में शामिल न करो.
151. मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ मेरे परवरदिगार ! मुझे और मेरे भाई को बख़्श दे और हमें अपनी रहमत में दाख़िल कर और तू सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है.
152. बेशक जिन लोगों ने बछड़े को अपना सरपरस्त बना लिया है, उन्हें उनके परवरदिगार की तरफ़ से ग़ज़ब भी पहुंचेगा और दुनियावी ज़िन्दगी में ज़िल्लत भी. और हम इसी तरह झूठे बोहतान बांधने वालों को सज़ा दिया करते हैं.
153. और जिन लोगों ने बुरे अमल किए. फिर उसके बाद तौबा कर ली और ईमान ले आए, तो बेशक तुम्हारा परवरदिगार उसके बाद बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान है.
154. और जब मूसा अलैहिस्सलाम का गु़स्सा थम गया, तो उन्होंने तौरात की तख़्तियां ज़मीन से उठा लीं और उनकी तहरीर में उन लोगों के लिए हिदायत और रहमत थी, जो अपने परवरदिगार से डरते हैं. 
155. और मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे मुक़र्रर वक़्त पर कोहे तूर पर लाने के लिए चुन लिया. फिर जब उन्हें ज़लज़ले ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया, तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया कि ऐ हमारे परवरदिगार ! अगर तू चाहता तो इससे पहले ही उन्हें और मुझे हलाक कर देता. क्या तू हमें उस ख़ता की वजह से हलाक कर देगा, जो हम में से कुछ बेवक़ूफ़ लोगों ने की है. यह सिर्फ़ तेरी आज़माइश है. इसके ज़रिये तू जिसे चाहे गुमराही में छोड़ दे और जिसे चाहे हिदायत दे. तू ही हमारा कारसाज़ है और तू ही हमें मुआफ़ करने वाला है और तू ही हम पर रहम करने वाला है और तू ही बेहतरीन बख़्शने वाला है.
156. और तू हमारे लिए इस दुनिया में भी भलाई लिख दे और आख़िरत में भी. बेशक हम तेरी तरफ़ रुजू करते हैं. अल्लाह ने फ़रमाया कि हम अपना अज़ाब जिसे चाहते हैं, उसे पहुंचाते हैं और हमारी रहमत हर चीज़ पर वसीह है. फिर हम अनक़रीब उसे उन लोगों के लिए लिख देंगे, जो परहेज़गारी इख़्तियार करते हैं और ज़कात देते हैं और जो हमारी बातों पर ईमान रखते हैं.
157. यही वे लोग हैं, जो इन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पैरवी करते हैं, जो उम्मी लक़ब नबी हैं, यानी जिन्हें दुनिया में किसी शख़्स ने नहीं पढ़ाया, बल्कि अल्लाह ही ने उन्हें इल्म सिखाया. जिनका ज़िक्र वे लोग अपने पास मौजूद तौरात और इंजील में लिखा हुआ पाते हैं. जो नबी उन्हें भलाई का हुक्म देते हैं और बुराई से रोकते हैं और उनके लिए पाकीज़ा चीज़ों को हलाल करते हैं और उन पर नापाक चीज़ें को हराम करते हैं और उनका बोझ और गर्दनों के तौक़ उतार देते हैं. जो लोग इन रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए और उनकी ताज़ीम की और उनकी मदद की और उस नूर यानी क़ुरआन की पैरवी की, जो उनके साथ नाज़िल हुआ है, तो वही लोग कामयाबी पाने वाले हैं.          
158. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ऐ लोगो ! बेशक मैं तुम सबकी तरफ़ अल्लाह का भेजा हुआ रसूल हूं, जिसके लिए तमाम आसमानों और ज़मीन की बादशाहत है. उसके सिवा कोई माबूद नहीं. वही ज़िन्दगी बख़्शता है और वही मौत देता है. फिर तुम अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ईमान लाओ, जो नबी उम्मी हैं और अल्लाह और उसके कलाम पर ईमान रखते हैं और उनकी पैरवी करो, ताकि तुम हिदायत पाओ.
159. और मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम में एक उम्मत ऐसी की भी है, जो हक़ की हिदायत देती है और उसके मुताबिक़ ही इंसाफ़ करती है.
160. और हमने बनी इस्राईल को गिरोह दर गिरोह करके बारह क़बीलों में तक़सीम कर दिया. और जब मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम ने उनसे पानी मांगा, तो हमने उनके पास वही भेजी कि तुम अपना असा पत्थर पर मारो, फिर उसमें से पानी के बारह चश्मे फूट निकले. फिर हर क़बीले ने अपना-अपना घाट जान लिया और हमने उन पर बादलों का साया कर दिया और हमने उन पर मन और सलवा नाज़िल किया. उनसे कहा गया कि जिन पाकीज़ा चीज़ों का रिज़्क़ हमने तुम्हें दिया है, उसमें से खाओ व पियो. और उन लोगों ने नाफ़रमानी करके हम पर कोई ज़ुल्म नहीं किया, बल्कि वे अपनी जानों पर ही ज़ुल्म करते रहे. 
161. और उस वक़्त को याद करो कि जब बनी इस्राईल से कहा गया कि तुम उस बस्ती यानी बैतूल मुक़द्दस में बस जाओ और तुम उसमें से जैसे चाहो खाओ व पियो और अपने परवरदिगार से कहो कि हमारे गुनाह बख़्श दे और बस्ती के दरवाज़े से सजदा करते हुए दाख़िल होना, तो हम तुम्हारी ख़तायें बख़्श देंगे. अनक़रीब हम मोहसिनों को ज़्यादा अज्र देंगे. 
162. फिर उनमें से ज़ुल्म करने वाले लोगों ने उस बात को जो उनसे कही गई थी, दूसरी बात से बदल दिया. फिर हमने उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया, क्योंकि वे ज़ुल्म किया करते थे. 
163. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और तुम उन लोगों से उस बस्ती का हाल दरयाफ़्त करो, जो समन्दर के किनारे पर वाक़े थी. जब उसके बाशिन्दे हफ़्ते के दिन हद से तजावुज़ करते थे. जब हफ़्ते के दिन उनके सामने मछलियां पानी के ऊपर आ जाती थीं और जब हफ़्ते का दिन न होता, तो वे नहीं आती थीं. इस तरह हम उनकी आज़माइश ले रहे थे, क्योंकि वे नाफ़रमानी किया करते थे.
164. और जब उनमें से एक उम्मत ने कहा कि तुम ऐसी क़ौम को क्यों नसीहत कर रहे हो, जिसे अल्लाह हलाक करने वाला है या जिसे सख़्त अज़ाब में मुब्तिला करने वाला है. वे लोग कहने लगे कि तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में माज़रत करने के लिए और शायद वे परहेज़गार बन जाएं. 
165. फिर जब वे लोग उन सब बातों को भूल गए, जिनकी उन्हें नसीहत की गई थी. फिर हमने उन लोगों को निजात दे दी, जो बुराई से मना करते थे और हमने ज़ुल्म करने वाले लोगों को अज़ाब की गिरफ़्त में ले लिया, क्योंकि वे नाफ़रमानी किया करते थे. 
166. फिर जब उन लोगों ने उससे सरकशी की, जिससे उन्हें मना किया गया था, तो हमने उन्हें हुक्म दिया कि तुम ज़लील और ख़्वार बंदर बन जाओ. 
167. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और वह वक़्त भी याद करो कि जब तुम्हारे परवरदिगार ने यहूदियों को आगाह कर दिया था कि वह उन पर रोज़े क़यामत तक ऐसे शख़्स को ज़रूर मुसल्लत करता रहेगा, जो उन्हें बुरा अज़ाब देगा. बेशक तुम्हारा परवरदिगार बहुत जल्द अज़ाब देने वाला है. और बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला बड़ा मेहरबान भी है.
168. और हमने उन लोगों को ज़मीन में गिरोह दर गिरोह तक़सीम कर दिया. उनमें के कुछ लोग नेक हैं और उनमें से कुछ लोग इसके ख़िलाफ़ यानी नाफ़रमान भी हैं और हमने उन्हें राहत और मुसीबत दोनों के ज़रिये आज़माया, ताकि वे अल्लाह की तरफ़ रुजू करें. 
169. फिर उनके बाद कुछ ऐसे लोग उनके जानशीन हुए, जो किताब यानी तौरात के वारिस बने. और वे इस अदनी दुनिया का माल व दौलत रिश्वत के तौर पर लेते हैं और कहते हैं कि अनक़रीब हमें बख़्श दिया जाएगा. और अगर उनके पास ऐसा माल व दौलत और आ जाए, तो उसे भी ले लें. क्या उनसे किताब का यह अहद नहीं लिया गया था कि वे अल्लाह के बारे में हक़ के सिवा कुछ नहीं कहेंगे. और उन्होंने वह सब पढ़ा है, जो उसमें लिखा हुआ था. और आख़िरत का घर उन लोगों के लिए बेहतर है, जो परहेज़गारी इख़्तियार करते हैं. क्या फिर भी तुम नहीं समझते.  
170. और जो लोग अल्लाह की किताब को मज़बूती से पकड़े रहते हैं और पाबंदी से नमाज़ पढ़ते हैं, तो बेशक हम इस्लाह करने वालों का अज्र ज़ाया नहीं करते.
171. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उस वक़्त को याद करो कि जब हमने उन लोगों के ऊपर पहाड़ को इस तरह उठा लिया गोया वह सायेबान हो और वे गुमान करने लगे कि वह उन पर गिरने वाला है. हमने उन्हें हुक्म दिया कि उसे मज़बूती से थाम लो, जो कुछ हमने तुम्हें अता किया है और उसे याद रखो, जो कुछ उसमें लिखा है, ताकि तुम परहेज़गार बन जाओ.
172. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और उस वक़्त को याद करो कि जब तुम्हारे परवरदिगार ने आदम अलैहिस्सलाम की औलाद की पुश्तों से उनकी नस्ल निकाली और उन्हें ख़ुद उनका गवाह बनाते हुए फ़रमाया कि क्या मैं तुम्हारा परवरदिगार नहीं हूं. वे कहने लगे कि हां. हम इसके गवाह हैं. यह इक़रार इसलिए था कि क़यामत के दिन तुम लोग यह न कहो कि बेशक हम इससे ग़ाफ़िल थे.
173. या तुम लोग यह कहो कि शिर्क तो हमसे पहले हमारे बाप दादाओं ने किया था और हम उनके बाद उन्हीं की औलाद थे. फिर क्या तू हमें उस गुनाह की सज़ा में हलाक करेगा, जो अहले बातिल ने किया था. 
174. और इसी तरह हम अपनी आयतों को तफ़सील से बयान करते हैं, ताकि वे लोग हक़ की तरफ़ रुजू करें.
175. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम उन लोगों से उस शख़्स का वाक़िया भी बयान करो, जिसे हमने अपनी आयतें दी थीं. फिर वह उनसे अलग हो गया और शैतान उसके पीछे पड़ गया, तो वह गुमराहों में से हो गया.
176. और अगर हम चाहते तो उसे उन आयतों के ज़रिये बुलंद कर देते, लेकिन वह ख़ुद ज़मीन की तरफ़ माइल हो गया और उसने अपनी ख़्वाहिशों की पैरवी की. फिर उसकी मिसाल उस कुत्ते जैसी है कि अगर उसे दुत्कार दो, तो वह ज़बान निकाल दे या उसे छोड़ दो तब भी वह ज़बान निकाले रहे. यह उस क़ौम की मिसाल है, जिसने हमारी आयतों को झुठलाया. फिर तुम ये वाक़ियात लोगों से बयान करो, ताकि वे ग़ौर व फ़िक्र करें.
177. मिसाल के लिहाज़ से वह क़ौम बहुत ही बुरी है, जिसने हमारी आयतों को झुठलाया और वह अपनी जानों पर ही ज़ुल्म करती रही. 
178. जिसे अल्लाह हिदायत देता है. फिर वही हिदायत याफ़्ता है. और जिसे वह गुमराही में छोड़ दे, तो वही लोग नुक़सान उठाने वाले हैं.
179. और बेशक हमने जहन्नुम के लिए जिन्नों और इंसानों में से बहुत से लोगों को पैदा किया है. उनके पास दिल व दिमाग़ है, लेकिन वे हक़ को समझ नहीं सकते और उनकी आंखें हैं, लेकिन वे देख नहीं सकते और उनके कान हैं, लेकिन वे सुन नहीं सकते. वे लोग जानवरों की तरह हैं, बल्कि उनसे भी बदतर हैं. यही वे लोग हैं, जो हक़ से बिल्कुल ग़ाफ़िल हैं.
180. और अल्लाह ही के लिए अच्छे-अच्छे नाम हैं. फिर उसे उन्हीं नामों में पुकारा करो और उन लोगों को छोड़ दो, जो उसके नामों में कजी इख़्तियार करते हैं. अनक़रीब उन्हें उसकी जज़ा दी जाएगी, जो कुछ वे किया करते हैं. 
181. और जिन्हें हमने पैदा किया है, उनमें से एक उम्मत ऐसी भी है, जो हक़ की हिदायत देती है और हक़ के साथ फ़ैसले करती है.
182. और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया हम अनक़रीब उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता हलाकत की तरफ़ इस तरह ले जाएंगे कि उन्हें इसकी ख़बर तक नहीं होगी.
183. और हम उन्हें मोहलत दे रहे हैं. बेशक हमारी तदबीर बड़ी पुख़्ता है.
184. क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि उनके साथी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
को कोई जुनून नहीं है. वे सिर्फ़ अल्लाह के अज़ाब से ख़बरदार करने वाले पैग़म्बर हैं.
185. क्या उन लोगों ने आसमानों और ज़मीन की बादशाहत और जो कुछ अल्लाह ने पैदा किया है, उसे नहीं देखा. और यह कि शायद उनकी मौत क़रीब आ गई हो. फिर इसके बाद वे किस हदीस पर ईमान लाएंगे. 
186. जिसे अल्लाह गुमराही में छोड़ दे, तो उसे हिदायत देने वाला कोई नहीं है. और वह उन्हें उनकी सरकशी में छोड़ देता है, ताकि वे भटकते फिरें. 
187. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! वे लोग तुमसे क़यामत के बारे में सवाल करते हैं कि वह किस वक़्त बरपा होगी. तुम कह दो कि इसका इल्म तो सिर्फ़ मेरे पररवदिगार को है. क़यामत को उसके मुक़र्रर वक़्त पर उसके सिवा कोई ज़ाहिर नहीं करेगा. वह तमाम आसमानों और ज़मीन पर भारी होगी. वह तुम पर अचानक आ जाएगी. वे लोग तुमसे इस तरह सवाल करते हैं गोया तुम उसकी तलाश में लगे हो. तुम कह दो कि इसका इल्म तो सिर्फ़ अल्लाह को है, लेकिन बहुत से लोग नहीं जानते.
188. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि मैं ख़ुद अपने लिए किसी नफ़े और नुक़सान का इख़्तियार नहीं रखता, लेकिन जो अल्लाह चाहे, वही होता है. और अगर मैं ख़ुद ग़ैब का इल्म जानता, तो बहुत ज़्यादा ख़ैर अंजाम देता और कोई बुराई मुझ तक नहीं पहुंचती. मैं तो सिर्फ़ अज़ाब से ख़बरदार करने वाला और उस क़ौम को ख़ुशख़बरी देने वाला पैग़म्बर हूं, जो ईमान रखती है.
189. और वह अल्लाह ही है, जिसने तुम्हें एक शख़्स यानी आदम अलैहिस्सलाम से पैदा किया और उन्हीं में से उनका जोड़ा बनाया, ताकि वे उससे से सुकून हासिल करें. फिर जब मर्द ने औरत को ढक लिया, तो वह हल्के से बोझ से हामिला हो गई. फिर वह उनके साथ चलती फिरती रही. फिर जब बोझ बढ़ गया, तो दोनों ने अल्लाह से दुआ की कि अगर तू हमें नेक औलाद अता कर दे, तो हम ज़रूर शुक्रगुज़ारों में से होंगे.
190. फिर जब अल्लाह ने उन्हें नेक बेटा अता कर दिया, तो वे दोनों अल्लाह की दी हुई औलाद में उसके शरीक ठहराने लगे. फिर अल्लाह उससे आला है, जिसे वह उसका शरीक ठहराते हैं.
191. क्या वे लोग उन्हें अल्लाह का शरीक ठहराते हैं, जो कुछ भी पैदा नहीं कर सकते और वे ख़ुद पैदा किए हुए हैं.
192. और न वे उन लोगों की मदद कर सकते हैं और न ख़ुद अपनी ही मदद कर सकते हैं. 
193. और अगर तुम उन्हें हिदायत की तरफ़ बुलाओ, तो वे तुम्हारी पैरवी नहीं करेंगे. तुम्हारे लिए बराबर है अगरचे तुम उन्हें बुलाओ या तुम ख़ामोश रहो.
194. बेशक जिन बातिल सरपरस्तों को तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, वे भी तुम्हारी ही तरह अल्लाह के बन्दे हैं. फिर जब तुम उन्हें पुकारो, तो उन्हें चाहिए कि तुम्हें जवाब दें. अगर तुम सच्चे हो.
195. क्या उनके पांव हैं, जिनसे वे चल सकें या उनके हाथ हैं, जिनसे वे पकड़ सकें या उनकी आंखें हैं, जिनसे वे देख सकें या उनके कान हैं, जिनसे वे सुन सकें. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम कह दो कि ऐ काफ़िरो ! तुम अपने बातिल शरीकों को बुला लो. फिर मुझ पर दाव चलाओ. फिर मुझे कोई मोहलत न दो.
196. बेशक मेरा कारसाज़ अल्लाह है, जिसने किताब यानी क़ुरआन नाज़िल किया है और वही अपने नेक बन्दों की सरपरस्ती करता है.
197. और जिन बातिल सरपरस्तों को तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, वे न तुम्हारी मदद कर सकते हैं और न ख़ुद अपनी ही मदद कर सकते हैं.
198. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और अगर तुम उन्हें हिदायत की तरफ़ बुलाओ, तो वे सुन भी नहीं सकते और तुम उन बुतों को देखते हो कि वे तुम्हारी तरफ़ देख रहे हैं. हालांकि वे कुछ नहीं देख सकते. 
199. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! तुम दरगुज़र करो और भलाई का हुक्म देते रहो और जाहिलों से किनाराकशी कर लो.
200. अगर शैतान की तरफ़ से तुम्हारे दिल में कोई वसवसा पैदा हो, तो अल्लाह से पनाह मांगो. बेशक वह बड़ा सुनने वाला बड़ा साहिबे इल्म है.
201. बेशक जिन लोगों ने परहेज़गारी इख़्तियार की है, जब उन्हें शैतान की तरफ़ से कोई वसवसा छू लेता है, तो वे फ़ौरन अल्लाह का ज़िक्र करने लगते हैं और हक़ीक़त देख लेते हैं.
202. और उन शैतानों के भाई उन्हें गुमराही की तरफ़ खींचते रहते हैं. फिर उसमें कोई कोताही नहीं करते.
203. ऐ रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ! और जब तुम उनके पास कोई निशानी नहीं लाते, तो वे कहते हैं कि तुम उसे ख़ुद गढ़ कर क्यों नहीं लाए. तुम कह दो कि मैं तो सिर्फ़ उस हुक्म की पैरवी करता हूं, जो मेरे परवरदिगार की जानिब से मेरी तरफ़ वही किया जाता है. यह क़ुरआन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से बसीरत का मजमुआ है. यह उस क़ौम के लिए हिदायत और रहमत है, जो ईमान रखती है. 
204.  और जब क़ुरआन पढ़ा जाए, तो उसे तवज्जो से सुनो और ख़ामोश रहो, ताकि तुम पर रहम किया जाए.
205. और अपने परवरदिगार का अपने दिल में ज़िक्र किया करो, आजिज़ी से और ख़ौफ़ से और बुलंद आवाज़ के बग़ैर यानी धीमी आवाज़ से सुबह और शाम. और उसकी याद से ग़ाफ़िल न होना. 
206. बेशक जो लोग यानी फ़रिशते तुम्हारे परवरदिगार के हुज़ूर में हैं, वे भी उसकी इबादत से तकब्बुर नहीं करते और उसकी तस्बीह करते रहते हैं और उसी को सजदा करते हैं.

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